मिशन 2019: चुनाव से पहले सरकार ने खेला बड़ा दांव, क्या हार-जीत की वजह बनेगा यह मुद्दा?
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एससी/एसटी एक्ट में बदलाव पर दो अप्रैल 2018 को भारत बंद के दौरान अनुसूचित जाति के लोग सड़कों पर उतरे। उनकी नाराजगी देख भाजपा ने अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदला, इससे अनुसूचित जाति के लोगों की नाराजगी तो दूर नहीं हुई, उल्टे सवर्ण नाराज हो गए। सवर्णों की नाराजगी दूर करने के लिए गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया। सियासत की बिसात पर आरक्षण बड़ा मुद्दा रहा है। जाट और गुर्जर भी आरक्षण की मांग कर रहे हैं। आरक्षण का दांव कभी चला तो कभी नहीं चला। यूपीए सरकार पिछले चुनाव जाटों के लिए आरक्षण का प्रावधान लेकर आई, लेकिन उसका यह दांव चला नहीं। हालात यह है कि एक को खुश करने का प्रयास किया जाता है तो दूसरा नाराज हो जाता है। आरक्षण का मुद्दा चुनाव में प्रभावी होगा या नहीं, अभी भी बड़ा सवाल है। मुद्दे की पड़ताल करती अमर उजाला की एक रिपोर्ट...
सरकार ने गरीब सवर्णों द्वारा 10 प्रतिशत आरक्षण की लंबे समय से की जा रही मांग को पूरा किया है। मेरठ कॉलेज में राजनीति शास्त्र विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सतीश कुमार कहते हैं कि संविधान में केवल सामाजिक पिछड़े वर्गों के लिए ही आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। लेकिन सवर्ण जातियों के गरीब लोग गरीबी के कारण शैक्षिक व सरकारी नौकरियों में पिछड़े हुए थे। जिस कारण वे समाज में भी पिछड़ते जा रहे थे। आरक्षण की इस व्यवस्था का अनुसूचित जाति, जनजाति व पिछड़े वर्ग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
सरकार ने आरक्षण के 13 बिंदु रोस्टर व्यवस्था को बदलकर 200 बिंदु रोस्टर व्यवस्था लागू की है। क्योंकि 13 बिंदु व्यवस्था से अनुसूचित जाति व जनजातियों एवं पिछड़े वर्ग के लोगों को आरक्षण नहीं मिल पा रहा था। 200 बिंदु व्यवस्था से उन्हें पूर्ववत आरक्षण मिलने का रास्ता साफ हो गया है। सरकार की उपरोक्त दोनों व्यवस्थाएं आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए मास्टर स्ट्रोक साबित होगी। एक बड़ा वोट बैंक सरकार के पक्ष में मतदान करेगा।
वहीं, इस्माइल डिग्री कॉलेज में अर्थशास्त्र विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. ममता सिंह का कहना है कि चुनाव घोषित होने से ठीक पहले सवर्णों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का फैसला सियासी तौर पर बड़ा कदम है। यह भाजपा के दलित उत्पीड़न विरोधी अधिनियम का समर्थन करने से हुए सवर्ण वोटों के नुकसान की भरपाई का कदम नजर आया है। अभी देश में अनुसूचित जाति, जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग को मिलाकर 49.5 फीसदी आरक्षण है। सुप्रीम कोर्ट 1992 के इंदिरा साहनी के अपने फैसले में साफ कर चुका है कि कुल आरक्षण 50 फीसदी से अधिक नहीं हो सकता। ऐसा करना समानता के अधिकार के खिलाफ जाता है। आरक्षण दोधारी तलवार है इसके फायदे व नुकसान दोनों ही गहरे होते हैं।
आरक्षण के बहाने होगी समीकरण साधने की कोशिश
सियासी मंचों पर आरक्षण एक मुद्दा होगा। चुनाव के दौरान भाजपा इसे उपलब्धि बताएगी तो विपक्ष उसे घेरेगा। राजनीतिक दलों को चुनाव घोषणापत्रों में भी जातियों को लुभाने की बात होगी। हालांकि बागपत जाट बहुल जिला है, जाट आरक्षण के मुद्दे पिछले चुनाव को प्रभावित नहीं किया था। जेवी कॉलेज बड़ौत के पूर्व प्राचार्य डॉ नरेंद्र सिंह कहते हैं कि एससी/एसटी एक्ट में बदलाव का मुद्दा चुनाव में उठेगा। कांग्रेस भी नए जातीय समीकरण साधने की कोशिश कर रही है, जिस कारण मैनिफेस्टो में ओसीबी बिरादरियों के लिए कोई न कोई घोषणा जरूर कर सकती है। भाजपा दलितों की नाराजगी पूरी तरह समझ रही है, इस वजह से मैनिफेस्टो में अनुसूचित जाति के लोगों का ध्यान रखा जा सकता है। अंतर 92 हजार तो मुरादाबाद में कुंवर सर्वेश सिंह की जीत का अंतर 87 हजार के पार था।
जाटों में नाराजगी तो है, मुद्दा बनेगा इस पर संशय
बिजनौर। गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण दिए जाने से सवर्ण समाज की नाराजगी काफी हद तक दूर हुई है। लेकिन जाटों का आरक्षण खत्म होने की टीस जाट समाज के लोगों के अंदर है। संयुक्त जाट आरक्षण संघर्ष समिति प्रदेश अध्यक्ष शूरवीर सिंह के अनुसार आरक्षण न मिलने से जाट समाज नाराज है। हालांकि यह चुनाव में मुद्दा बनता नहीं दिख रहा है। अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा जिलाध्यक्ष संजय शर्मा और क्षत्रिय राजपूत सभा के पूर्व जिलाध्यक्ष वीरेश बल का कहना है कि कहीं न कहीं आरक्षण इस चुनाव में मुद्दा होगा।
खास बातें
- साल 2014 के चुनाव से पहले यूपीए ने खेला था जाट आरक्षण का दांव
- इस बार चुनाव से पहले एनडीए ने दिया गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण
- एससीएसटी-पिछड़ा वर्ग आरक्षण के भीतर भी आरक्षण की उठ रही मांग
- यूपी की भाजपा सरकार ने इसके लिए कमेटी बनाने की घोषणा भी की
- सियासी मंचों पर आरक्षण होगा लोकसभा चुनाव के दौरान एक बड़ा मुद्दा
मुद्दे को भुनाने की कोशिश तो होगी
वीवी पीजी कालेज की रिटायर्ड प्राचार्या और राजनीति शास्त्र की प्रवक्ता डॉ. वेद कुमारी की मानें तो आरक्षण इस बार भी मुद्दा नहीं होगा, लेकिन कुछ राजनीतिक इसे भुनाने की कोशिश करेंगे। एससीएसटी एक्ट में बदलाव कोर्ट के दिशा निर्देशों के अनुरूप किया गया था, लेकिन इसे इस तरह प्रचारित किया गया कि ये सरकार ने किया है। गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला सरकार का था, लेकिन इससे पहले से आरक्षित वर्ग को कोई नुकसान नहीं है। जिले में कुल 16 लाख मतदाताओं में करीब पौने तीन लाख अनुसूचित जाति के हैं, ऐसे में संभावना है कि बसपा इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश भी करेगी लेकिन यह सीट सपा के खाते में हैं इसलिए ये मुद्दा गर्माने के ज्यादा आसार नहीं हैं।
राजनीतिक फायदे के लिए खेला गया दांव
राजनीतिक शास्त्र के प्रोफेसर डॉ. पीके वार्ष्णेय का कहना है कि ऐसे फैसले राजनीतिक फायदे और नुकसान को देखकर ही लिए जाते हैं। पहले अनुसूचित वर्ग को खुश करने के लिए एससी-एसटी एक्ट पर अध्यादेश लाया गया और फिर सवर्णों को आरक्षण दिया गया। समाजशास्त्र प्रोफेसर डाक्टर डीके सिंघल का कहना है कि गरीब सवर्णों को आरक्षण का लाभ मिलेगा, गरीबी किसी का धर्म या जाति देखकर नहीं होती है। एससी-एसटी एक्ट को लेकर लाए अध्यादेश की भरपाई गरीब सवर्णों को आरक्षण से नहीं हो सकेगी। संविधान बचाओ समिति के पदाधिकारी राजकुमार कहते हैं कि एससी-एसटी एक्ट के लिए केंद्र सरकार अध्यादेश लाई और लोकसभा में पास कराकर पुराना स्वरूप में दिलाया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर केंद्र सरकार की पैरवी कमजोर होने से सरकार की मंशा पर सवाल उठा है। अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष केके शर्मा के अनुसार सवर्णों को आरक्षण देने का फायदा भाजपा को मिलेगा।
अनुसूचित जाति के लोग अभी भी नाराज
आरक्षण समर्थक सुरेंद्र सिंह मैनवाल बताते हैं कि आरक्षण पर भाजपा सरकार के निर्णयों से अनुसूचित जाति वर्ग नाराज है, उन्हें ऐसा लगता है कि सरकार आरक्षण को खत्म करना चाहती है। मुजफ्फरनगर में पाल, बघेल जाति को धनगर बताकर अनुसूचित जाति के प्रमाणपत्र जारी किए जा रहे हैं। विश्वविद्यालयों में आरक्षण का रोस्टर 200 प्रतिशत से कम कर 13 प्रतिशत कर दिया गया था। इसके खिलाफ भी आवाज उठी तो निर्णय वापस लेना पड़ा। डीएवी कॉलेज के राजनीति विज्ञान के विभागाध्यक्ष रहे डॉक्टर एनएन पंत का कहना है कि केंद्र सरकार के सवर्ण जातियों को आरक्षण दिए जाने का चुनाव पर फर्क तो पड़ेगा ही, संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान नहीं है। जाट आरक्षण से लंबे समय से जुडे़ देवी सिंह का कहना है कि जाट समाज गरीब सवर्णों को आरक्षण से संतुष्ट नहीं है। समाज चाहता है कि जिस तरह प्रदेश में ओबीसी में आरक्षण दिया जा रहा है, इसी तरह केंद्र में आरक्षण देना चाहिए। लोकसभा चुनाव में यह मुद्दा तो रहेगा ही, देखना है कि अब राजनीतिक दल क्या आश्वासन देते हैं।
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