लोकसभा चुनाव परिणाम: ये है पश्चिमी यूपी की सबसे हॉट सीट, जिस पर टिकी हैं देशभर कि निगाहें
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देशभर की निगाहें मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट के परिणाम पर टिकी है। रालोद मुखिया चौधरी अजित सिंह गठबंधन प्रत्याशी के तौर पर जीत हासिल कर पाएंगे या नहीं, सियासी हल्के में यही सबसे बड़ा सवाल है। पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री एवं सांसद डॉ संजीव बालियान यदि लगातार दूसरी बार जीतने में कामयाब हुए तो उनको भाजपा में ऊंचाइयां मिल सकती है। पश्चिमी में जाट राजनीति का सिरमौर कौन बनेगा, यह भी नतीजे से साफ हो जाएगा।
पश्चिमी यूपी की इस सबसे हॉट सीट पर चुनाव परिणाम को लेकर सबसे ज्यादा हलचल मची है। किसकी होगी जीत, किसकी होगी हार, इन्हीं सवालों को लेकर कई मिथक टूटने तय हैं। सियासी वजूद को रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी अजित सिंह बचा पाएंगे या नहीं। छोटे चौधरी का बागपत छोड़कर मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़ने का फैसला कितना सही साबित होगा।
रालोद सुप्रीमो के लिए उस इतिहास को बदलने का भी मौका है, जब वर्ष 1971 के संसदीय चुनाव में इस सीट से पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह को शिकस्त मिली थी। चुनाव में गठबंधन प्रत्याशी चौधरी अजित सिंह और भाजपा प्रत्याशी डॉ. संजीव बालियान के बीच चुनाव में सीधा मुकाबला हुआ। बीते लोकसभा चुनाव में डॉ. संजीव बालियान ने 4,01150 के रिकॉर्ड मतों से यह सीट जीती थी, मगर अबकी बार परिस्थितियां और समीकरण बिल्कुल जुदा थे। चौधरी अजित सिंह के गठबंधन प्रत्याशी बनने से चुनाव दिलचस्प हुआ। पहली मर्तबा चुनाव में केवल दो प्रत्याशियों में आमने-सामने का मुकाबला रहा। खास पहलू यह भी रहा कि दोनों ही जाट बिरादरी से हैं। सपा-बसपा के गठबंधन से छोटे चौधरी को जो ताकत मिली, उन्हें कांग्रेस ने भी अपना उम्मीदवार नहीं उतारकर मजबूत किया।
पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री एवं सांसद डॉ संजीव बालियान की किस्मत क्या फिर से चमकेगी, क्योंकि पिछले चुनाव में दंगे के ध्रुवीकरण और मोदी लहर ने उन्हें राजनीति के नए मुकाम पर पहुंचाया था। पहली बार टिकट मिलने पर सांसद ही नहीं बनें, बल्कि मोदी मंत्रिमंडल में भी जगह पाई। रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह की चुनौती को उन्होंने बखूबी समझा और चुनावी मुकाबला किया। डॉ. बालियान यदि जीतने में सफल हुए तो वह जिले से लगातार दूसरी बार चुने जाने वाले तीसरे सांसद होंगे। कांग्रेस के सुमत प्रसाद जैन वर्ष 1957, 1962 और भाजपा के सोहनवीर सिंह वर्ष 1996, 1998 में इस सीट से लगातार दो बार चुनाव जीते थे। चुनावी परिणाम पश्चिमी यूपी में जाट राजनीति की दिशा भी मुकर्रर करेगा। चौधरी अजित सिंह और डॉ. संजीव बालियान में से कौन जाट राजनीति का सिरमौर बनेगा ? वैसे भी रालोद की अग्नि परीक्षा की घड़ी है। वर्ष 2014 में रालोद का लोकसभा में खाता भी नहीं खुला था। गठबंधन के सहारे मुजफ्फरनगर, बागपत और मथुरा सीटों पर क्या रालोद कामयाब हो पाएगी? ऐसे ही तमाम सवालों पर अवाम का फैसला सामने आएगा।
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