लोकसभा चुनाव 2019: गठबंधन के सामने बड़ी चुनौती, न ध्रुवीकरण, न लहर, कैसे पार हो सीटों पर अंतर
- पिछले चुनाव में वेस्ट यूपी की सीटों पर 50 हजार से पांच लाख वोटों के अंतर से जीती थी भाजपा ।
- गठबंधन के सामने बड़ी चुनौती, पिछले चुनाव में हार-जीत का अंतर था बड़ा।
- कई सीटों पर अन्य मुख्य दलों के कुल योग पर भारी पड़े था भाजपाई उम्मीदवार।
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पश्चिमी उप्र में गठबंधन के सामने मैदान मारने की चुनौती है। लेकिन चिंता यह भी है कि पिछले चुनाव में भाजपा द्वारा खड़े किए मतों के पहाड़ को कैसे पार पाएं। इस बार न ध्रुवीकरण है और न कोई लहर, दबाव में भाजपा भी है...
2014 में वेस्ट यूपी की अधिकतर सीटें भाजपा पचास हजार से लेकर पांच लाख मतों के अंतर से जीती थी। कई सीटें तो ऐसी थीं, जिन पर अन्य दलों को कुल मिलाकर भी इतनी वोटें नहीं मिल पाई थीं जितनी भाजपाई उम्मीदवार को अकेले को मिल गई थी। मतों का यह पहाड़ इस चुनाव में भाजपा, गठबंधन और कांग्रेस सभी के लिए चुनौती रहेगा।
सीटों पर आकलन का खेल शुरू हो गया है। कौन, कहां से लड़ेगा इस पर मंथन चल रहा है। अब प्रत्याशियों का चयन शुरू हो गया है। भाजपा और गठबंधन दोनों ही दलों के लिए यहां चुनौती है। भाजपा के लिए पिछले प्रदर्शन को बरकरार रखना चुनौती है, तो वहीं गठबंधन के सामने उस दीवार को तोड़ने की चुनौती है जो भाजपा ने पिछले चुनाव में खड़ी कर दी थी।
लोकसभा चुनाव 2014 में मोदी लहर का असर कहा जाए या कुछ और, लेकिन भाजपा के प्रत्याशी भारी मतों से जीते थे। वेस्ट यूपी की सीटों पर उम्मीदवारों की जीत का अंतर पांच लाख वोटों के पार चला गया था।
इन सीटों पर रहा था बड़ा अंतर
सहारनपुर में भाजपा उम्मीदवार राघव लखनपाल लगभग 65 हजार वोटों से चुनाव जीते थे। कैराना से हुुकुम सिंह की जीत का अंतर दो लाख 30 हजार के पार गया था। मुजफ्फरनगर में तो भाजपा ने गजब का प्रदर्शन किया था। यहां संजीव बालियान चार लाख वोटों के अंतर से जीते थे। बिजनौर में कुंवर भारतेंद्र की जीत का अंतर दो लाख के पार गया था। मेरठ में भी राजेंद्र अग्रवाल दो लाख तीस हजार वोटों से ज्यादा के अंतर से जीते थे।
बागपत में सत्यपाल सिंह की जीत का अंतर दो लाख से ज्यादा था तो वहीं गाजियाबाद ने तो कमाल ही कर दिया था। यहां जनरल वीके सिंह पांच लाख साठ हजार मतों से ज्यादा के अंतर से जीत गए थे। गौतमबुद्घनगर से महेश शर्मा दो लाख 80 हजार से ज्यादा वोटों से जीते थे।
बुलंदशहर से डा. भोला सिंह की जीत का अंतर चार लाख 21 हजार को पार कर गया था। नगीना में यशवंत सिंह की जीत का अंतर 92 हजार तो मुरादाबाद में कुंवर सर्वेश सिंह की जीत का अंतर 87 हजार के पार था।
सबके लिए चुनौती
भाजपा के सामने बड़ी चुनौती यह है कि इतने बड़े मतों के अंतर से जीतने वाले धुरंधरों को इस बार मैदान में उतारें या नहीं। कई जगह विरोध होने के बावजूद पिछले चुनाव के मतों का अंतर सूरमाओं का दावा मजबूत कर रहा है। दूसरी चिंता यह भी है कि इस बार सपा, बसपा, रालोद एक साथ सामने खड़े हैं। कांग्रेस अलग से है। ऐसे में कहीं यह मोर्चा भारी न पड़ जाए।
यदि जरा भी चूक हुई तो मामला बिगड़ते देर नहीं लगेगी। उधर, गठबंधन भी चिंतित है। वह इसलिए कि पिछली बार के चुनाव में सपा-बसपा को कुल मिलाकर भी कई सीटों पर इतने वोट नहीं मिले थे, जितने अकेले भाजपा उम्मीदवार को। जैसे मेरठ सीट पर दोनों से ज्यादा वोट राजेंद्र अग्रवाल को मिले थे।
गाजियाबाद में तो वीके सिंह को इतने वोट मिल गए थे कि सारे प्रतिद्वंद्वी मिलकर भी इतना वोट नहीं ले पाए थे। कैराना में भी यही हुआ था। बुलंदशहर, अलीगढ़ आदि में यही स्थिति थी। इसी आधार पर टिकटों के मंथन से लेकर आगे की रणनीति तय करना सभी के लिए अहम होगा।
2014 में कौन कहां से कितने अंतर से जीता
सीट प्रत्याशी मतों का अंतर
मेरठ राजेंद्र अग्रवाल 232326
सहारनपुर राघव लखनपाल 65090
कैराना हुकुम सिंह 236828
मुजफ्फरनगर डॉ. संजीव बालियान 401150
बिजनौर कुंवर भारतेंद्र सिंह 205774
बागपत सत्यपाल सिंह 209866
गाजियाबाद वीके सिंह 567260
गौतमबुद्ध नगर महेश शर्मा 280212
नगीना यशवंत सिंह 92390
-वेस्ट के नौ जिलों में सबसे कम मतों में सहारनपुर और सबसे अधिक मतों का गाजियाबाद में रहा अंतर।
-कई सीटों पर सपा-बसपा को मिलकर भी नहीं मिले थे इतने वोट जितने भाजपा उम्मीदवार को मिले थे।