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43 घंटे का फ्लॉप शो   

Thu, 14 Apr 2016 02:37 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ
अमर उजाला ब्यूरो/मेरठ Updated Thu, 14 Apr 2016 02:37 AM IST
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leopard attack meerut city
तेंदुआ पकड़ने के लिए जाल बिछाते लोग। - फोटो : अमर उजाला
मंगलवार सुबह के साढ़े सात बजे से लेकर बुधवार देर रात ढाई बजे तक लगभग 43 घंटे तक तेंदुए को पकड़ने का अभियान फ्लॉप शो साबित हुआ। तेंदुए को पकड़ने के लिए वैसे तो वन विभाग, वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया, प्रशासन और सेना की टीमें तो लगीं रहीं, लेकिन किसी को एक-दूसरे की योजना के बारे में नहीं पता था। सेना बस अपने क्षेत्र की रखवाली कर रही थी तो प्रशासन के अधिकारी जैसे प्रशासनिक ड्यूटी को निभाने में लगे रहे।
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मुख्य काम संभाल रही वन विभाग की टीम के पास जैसे कोई योजना ही नहीं थी। दिल्ली से आई टीम दो साल पहले तेंदुए को पकड़ने में नाकाम रही थी तो कुछ लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि इस बार भी कुछ होने वाला नहीं है। तेंदुए को ट्रेंक्लुाइज करना तो दूर,
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बुधवार को शॉट मारने की नौबत ही नहीं आई। 

पूरे दिन खाली क्यों बैठे रहे
वन विभाग की टीम ने दोपहर करीब 12 बजे जाल लगाना आरंभ किया तो धीरे-धीरे जाल लगाने की प्रक्रिया कई घंटे चली। जब डीआईजी मौके पर पहुंचीं तो लगा कि कुछ ही देर में मिशन तेंदुआ पूरा हो जाएगा। जाल लगाने की प्रक्रिया कई स्तर पर पूरी करने के बाद दोपहर लगभग ढाई बजे के आसपास प्रशासनिक अधिकारी और दूसरी भीड़ एकदम छंट गई। कहा गया कि मीट मंगाया जा रहा है और उसके बाद प्रक्रिया आरंभ होगी। लगभग दो घंटे का समय इसी में लग गया।
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इसके बाद भी ढील देते हुए समय को गंवाया गया। ऐसा लगा कि जैसे वन विभाग शाम होने का इंतजार कर रहा है। उसके बाद लगभग साढ़े पांच बजे कार्रवाई तेज होती दिखाई दी। उसके बाद धुआं आदि किया गया और शाम होते-होते अभियान कमजोर पड़ गया। 

इतने लचर रहे इंतजाम 
- वन विभाग के पास अपने जाल भी नहीं थे और सेना से जाल मांगे गए 
- जब महज लाठी डंडे पीटकर ही तेंदुए को बाहर लाना था तो दोपहर से ही ऐसा क्यों नहीं किया गया
- शाम के समय उपलों से धुआं किया गया, ऐसा शाम होने से पहले किया जा सकता था
- दोपहर में दो घंटे तक शांत बैठकर किस बात कर इंतजार किया गया 
- शाम के समय बिजली जाने पर दस मिनट तक लगभग अंधेरा रहा
- जनरेटर मंगाया गया तो उसके कनेक्शन भी नहीं किए गए 
- मंगलवार रात जब तेंदुआ भागा था तो फाजलपुर और कासमपुर क्षेत्र में स्पेशल अलर्ट होना चाहिए था। 
- पहले एक पेड़ पर बैठा तेंदुआ कई बार शॉट मारने के बाद ट्रंक्लुाइज नहीं हुआ तो फिर बंद कमरों में नहीं पकड़ा गया
- सेना की स्मॉक कैंडल पहले मंगाई गई और फिर बाद में काफी देर तक सैनिक उसे लेकर ही खड़े रहे 
- जाल को छत से पहले सुतली से बांधा गया और फिर बाद में तारों का इस्तेमाल किया गया


ऐसा है तेंदुआ   
उम्र  : तीन साल 
अवस्था : बालिग 
वजन : 40 किलो
लंबाई : छह से सात फुट
ऊंचाई : डेढ़ से दो फुट

मादा है तेंदुआ 
वन विभाग के अधिकारियों की मानें तो जिस तेंदुए को लेकर ऑपरेशन चल रहा है, वह मादा है। ऐसे लक्षण मिले हैं। पेड़ पर घंटों तक चढ़कर बैठना और हावभाव से मादा लग रही है।
वह गर्भवती भी हो सकती है। पैर में चोट लगी है। अगर वह गहरी नहीं है तो विभाग का काम आसान होगा। वैसे तेंदुआ चोट को अपनी जीभ से चाटकर सही कर लेता है। नर अपनी मां से डेढ़ साल में और मादा दो साल में अलग होती है। तीन साल में वह प्रजनन के लिए तैयार हो जाती हैं। 



तेंदुए को सुरक्षित पकड़ने की हर मुमकिन कोशिश की जा रही है। कई टीम इस काम में लगी हैं। वन विभाग में मेरठ, हापुड़, बुलंदशहर और गाजियाबाद से भी टीम लगाई गई है। चारों तरफ से कवर कर पिंजरा लगा दिया गया है। उसमें मुर्गा, गोश्त और पानी रखा है। उम्मीद है कि अभियान सफल होगा।- मुकेश कुमार, मुख्य वन संरक्षक, मेरठ जोन 
  
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