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खालिस्तान समर्थक आतंकवाद की आहट से पश्चिम में अलर्ट, गिरोह खेलते आए है खून की होली

Wed, 17 Oct 2018 03:52 PM IST
एम. रियाज़ हाशमी, अमर उजाला, मेरठ
एम. रियाज़ हाशमी, अमर उजाला, मेरठ Updated Wed, 17 Oct 2018 03:52 PM IST
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Khalistan supporter terrorism entry in western UP and intelligence department alert
शामली न्यूज - फोटो : अमर उजाला

शामली में पुलिस से राइफल लूट के खुलासे के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के यमुना खादर और तराई इलाकों में दो दशक बाद फिर से खालिस्तान समर्थक आतंकवाद की आहट सुनाई दी है। खालिस्तान कमांडो फोर्स (केसीएफ) के दस बरस तक आतंक के दो दशक बाद खालसा ग्रुप की दस्तक यकायक नहीं है। इसे केसीएफ का ही साइलेंट संस्करण माना जा रहा है, जिसे कनाडा से फंडिंग की खबरें हैं। केसीएफ चीफ जरनैल सिंह सतराना की मौत के 17 साल बाद शामली में तीन खालिस्तान समर्थकों की गिरफ्तारी के बाद पैदा हुई आशंकाएं यूपी पुलिस की चिंता बढ़ाने वाली हैं।

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1990 में पंजाब में आतंकवाद से प्रभावित सिखों ने यमुना खादर के अलावा तराई के इलाकों में डेरे बसाए और बड़े कृषि फार्म विकसित किए थे। पुलिस दबाव से आतंकियों ने पंजाब से यहां का रुख किया और डेरों की आपसी रंजिश का फायदा उठाकर शरण ली। सहारनपुर के सरसावा, नकुड़, गंगोह, शामली के कैराना, झिंझाना के यमुना खादर और पीलीभीत, रुद्रपुर व ऊधमसिंह नगर के तराई इलाके में जरनैल सिंह सतराना गिरोह सक्रिय रहा था। 1994 में इस गिरोह ने सहारनपुर के अंबाला रोड से ढाबा मालिक टिंकू का अपहरण किया था तो मौके पर मिले एके-47 के खोखों से पहली बार आतंकी आहट का पता चला। यह गिरोह यहां खुलकर खून की होली खेलता रहा और 50 से अधिक लोगों को मौत के घाट उतारा।
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यूपी पुलिस तब इससे मुकाबले में कभी नहीं टिकी और न मुखबिर तंत्र खड़ा कर पाई। 2 नवंबर 1996 को सहारनपुर के अपलाना में एक सिख ने ही अपने डेरे पर आतंकियों की सूचना पुलिस को दी थी। मुठभेड़ हुई और तत्कालीन सरसावा थानाध्यक्ष इस्लामुलहक शहीद हो गए थे। फोर्स मैदान छोड़ गई थी। इसके बाद पुलिस को सूचनाएं देने से लोग बचने लगे। 96 में ही सहारनपुर के घंटाघर पर चंडीगढ़ से आई एक बस में आरडीएक्स विस्फोट में 16 लोग मारे गए थे।
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पंजाब में पकड़े गए सतराना गिरोह के दिलबाग सिंह बग्गा ने बताया था कि यह विस्फोटक जालंधर-दिल्ली सुपरफास्ट ट्रेन में रखा जाना था, जो उतारने से पहले ही फट गया था। बाद में सतराना गिरोह के कुछ लोग आपस में मारे गए तो कुछ को पंजाब पुलिस ने पकड़ा। 2001 में पीलीभीत में एनएसजी कमांडो ने सतराना को मारा और तब से खालिस्तान समर्थन की चिंगारी दबी थी जो अब शामली में तीन समर्थकों की गिरफ्तारी से सामने आई है।

पुराने अफसरों से ली जा सकती है मदद
पुलिस के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक तब आतंकवाद ग्रस्त क्षेत्रों में तैनात रहे कई आईपीएस अधिकारियों की मदद लेने पर विचार हो सकता है। इनमें से सीडी त्रिपाठी, स. हरभजन सिंह, सुलखान सिंह, और बीएस सिद्धू सेवानिवृत्त हो चुके हैं। विवेचना टीमों में शामिल रहे इंस्पेक्टर और सीओ भी रिटायर हो चुके हैं या उत्तराखंड में हैं।

स्थानीय सिखों ने ही किया हमेशा विरोध
आतंकियों का स्थानीय सिखों ने ही हमेशा विरोध और मुकाबला किया। 1997 में सहारनपुर के गंगोह थानांतर्गत गांधीनगर में स. हरभजन सिंह के डेरे पर सतराना गिरोह ने हमला किया था। वह सिखों को आतंकियों का विरोध करने के लिए कहते थे। हमले में हरभजन, उनका कमांडो बेटा, पत्नी और पौत्री मारे गए थे। मौके पर पहुंची पुलिस की बुलेट प्रूफ टाटा 407 को भी माइन्स विस्फोट से उड़ा दिया था, जिसमें तत्कालीन एसओ कुलदीप असवाल की दोनों टांगें उड़ गई थीं।

रिमांड पर लिए जाएंगे आरोपी
हमारी पुलिस ने ही गिरफ्तारी और राइफलों की बरामदगी की है। फरार बाकी दोनों आरोपियों की भी तलाश की जा रही है। तीनों बदमाशों का कोर्ट से रिमांड पर लेकर इनके नेटवर्क की जानकारी की जाएगी। खुफिया विभाग और पुलिस पूरी तरह सतर्क है। -प्रशांत कुमार, एडीजी, पुलिस जोन मेरठ

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