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विवाद के सौ बहाने, लड़ते-लड़ते पहुंच गए थाने

Sat, 09 Sep 2017 03:23 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मनु चौधरी, मेरठ
अमर उजाला ब्यूरो/ मनु चौधरी, मेरठ Updated Sat, 09 Sep 2017 03:23 PM IST
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Hundreds of excuses for the dispute, the police station that reached the fights
घरेलू विवाद पहुंचे रहे थाने

मेरठ में मामला कुछ भी हो, महिलाओं की तरफ से सबसे पहले दहेज उत्पीड़न की शिकायत होती है। परिवार परामर्श केंद्र में प्रतिदिन सात मामले दहेज उत्पीड़न के पहुंच रहे हैं। शिकायतें बढ़ी है तो जाहिर है ऐसे मामलों का ग्राफ भी बढे़गा। तीन साल में ऐसे मामलों में दोगुनी बढ़ोतरी हुई है। जबकि समझौते का ग्राफ काफी नीचे है। काउंसिलिंग में वजह चाहे जो निकले। लेकिन मामूली विवाद में रिश्तों की डोर कमजोर होती जा रही है। परिवार परामर्श केंद्र के आंकडे़ बताते हैं कि पिछले दो वर्ष में शिकायतों में 15 फीसदी मामले ही दहेज उत्पीड़न के निकले। ऐसे मामलों में एफआईआर करा दी गई।

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आरोप कैसे-कैसे
पीपीके पर आने वाली प्रत्येक शिकायत में दहेज उत्पीड़न के आरोप होते हैं। लेकिन जब दंपति की कांउसिलिंग शुरू होती है तो अधिकांश मामलों में कुछ और मामला निकल कर आता है। जो आपसी समझ न होने से थाने तक पहुंच गया। ऐसे अधिकांश मामलों में सुलह समझौता हो जाता है। लेकिन काउंसलर जिन मामलों को दहेज उत्पीड़न की श्रेणी में मानता है, उसमें एफआईआर दर्ज होने की संस्तुति की जाती है।
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उत्पीड़न भी कम नहीं
कुछ ऐसे संगीन मामले भी हैं कि शादी को 15 दिन भी नहीं बीते और ससुराल पक्ष पर दहेज मांगने के आरोप लगने शुरू हो जाते हैं। ससुराल पक्ष पर पैसे की डिमांड बढ़ाने और उत्पीड़न के आरोप लगने शुरू होते ही मामला पुलिस तक पहुंचने में देर नहीं लगती। अधिकांश मामलों में दहेज उत्पीड़न के साथ मारपीट, जान से मारने की धमकी, जानलेवा हमला और दुष्कर्म के आरोप भी सामने आते हैं। कहीं-कहीं दहेज में 50 हजार रुपये और बाइक मांगने तो कुछ हाई प्रोफाइल मामलों में 50 लाख रुपये तक दहेज मांगने की शिकायत सामने आई हैं। जिले में इस साल दहेज हत्या के करीब 175 मामले दर्ज हो चुके हैं।
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निस्तारण की लंबी है प्रक्रिया

Hundreds of excuses for the dispute, the police station that reached the fights
दहेज उत्पीड़न मामले

पीपीके पर पहुंचने वाली ऐसी शिकायतों के निस्तारण की प्रक्रिया काफी लंबी होती है। कहीं एक या दो तारीख पर काउंसिलिंग में समझौता हो जाता है तो किसी में सात या आठ तारीख यानी आठ माह तक लग जाते हैं। पीपीके से निकलकर मामला परिवार न्यायालय में पहुंच जाता है। एफआईआर दर्ज होने पर पुलिस दहेज मांगने संबंधी साक्ष्य भी जुटाती है। जिन्हें विवेचना में शामिल किया जाता है।

दहेज उत्पीड़न और काउंसिलिंग
पीपीके की प्रभारी रेनू सक्सेना के अनुसार वर्ष 2014 में दहेज उत्पीड़न की 1322 शिकायत आई थीं। 2015 में ऐसे मामलों की संख्या बढ़कर 1689 पहुंच गई। 2016 में यह संख्या 2341 रही तो इस साल इन आठ माह में एक जनवरी से लेकर 31 अगस्त तक ऐसे 1836 मामले केंद्र में चल रहे हैं। प्रत्येक दिवस औसतन सात मामले आते हैं, जिनमें पहला आरोप दहेज उत्पीड़न का ही होता है। जबकि काउंसिलिंग के नतीजों की बात करें तो इस साल आठ माह में ऐसे 250 मामलों में एफआईआर दर्ज की गई जबकि 225 के करीब मामलों में समझौता होकर परिवार फिर से एक हो चुके हैं। पिछले दो सालों में औसतन 15 फीसदी मामलों में ही दहेज उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज हुई। 

आपसी विवाद आता है सामने
एसपी क्राइम शिवराम यादव का कहना है कि दहेज उत्पीड़न संबंधी जो भी मामले सामने आते हैं, पहले दोनों पक्षों की पीपीके में काउंसिलिंग की जाती है। अधिकांश मामलों में दहेज के बजाय दंपत्ति का आपसी विवाद सामने आता है। समझौता न होने पर ही केस दर्ज किया जाता है।

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