महाभारत के लिए प्रख्यात हस्तिनापुर नगर मेें राजा रघुनाथ महल स्वतंत्रता आंदोलन का गवाह रहा है। कई क्रांतिकारियों ने इसी महल में रहकर देश की आजादी में अहम भूमिका निभाई थी। क्षेत्र में इन क्रांतिकारियों की बहादुरी की कहानियां आज भी सुनाई जाती हैं। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बीजारोपण भी इसी महल से हुआ बताया जाता है।
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रघुनाथ महल पर देवताओं का स्थान। संवाद
- फोटो : अमर उजाला
महल पांडव टीला उल्टा खेड़ा के मैदानी भाग से लगभग 40 फीट ऊंचे टीले पर स्थित है। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के मामा रघुनाथ नायक फौजी क्रांति के समय यहां आकर छिपे थे। महल का निर्माण उन्होंने ही कराया था।
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महंत भीष्म रमन स्वामी
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महल में ऐसी दो गुफाएं हैं, जिसमें एक साथ 50 लोग बैठ सकते हैं। अवशेष के तौर पर इसके परकोटे, गुफा पर बने गुबंद सभी कुछ क्रांतिवीरों की याद दिलाते हैं। महल में मराठों द्वारा मां दुर्गा मंदिर की स्थापना की गई थी। मुगल शासकों ने इसे ध्वस्त कर दिया था।
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स्थल की जानकारी देते मंहत
- फोटो : अमर उजाला
1901 में महात्मा शाहदास ने धर्म प्रचार व देशभक्ति की अटूट प्रेरणा दी थी। 1918 में उनका महाप्रयाण हो गया। 1919 में पनियाला के राजा महात्मा सुमेर सिंह काली कमली वाले ने यहां गुरुकुल की स्थापना की। देश की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने साइमन कमीशन को काले झंडे दिखाए थे। जेल में डाले जाने के बाद उन्होंने 60 दिन अनशन किया।
इसके बाद इस महल के संचालक महात्माजी के शिष्य रामकिशन उर्फ डॉ. स्वामी महंत बने। उन्होंने गुरु परंपरा को जारी रखते हुए आर्य समाज व समाज सुधार के प्रचार-प्रसार में तन, मन, धन से जुड़ गए। 2001 में उनके देहावसान के बाद से उनके शिष्य ब्रह्मचारी महंत भीष्म रमन स्वामी महल की देखरेख करते हैं। भीष्म रमन स्वामी के अनुसार हस्तिनापुर शुरू से ही शासन व्यवस्था का केंद्र रहा।
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रघुनाथ महल की दीवार
- फोटो : अमर उजाला
मराठा शासन का भी केंद्र रहा हस्तिनापुर
हस्तिनापुर मुगलों के साथ ही मराठाओं और अंग्रेजों के लिए भी अहम स्थान रखता है। खंडहरों के रूप में चार कमरों का एक मकान आज भी मौजूद है। पांडव टीले पर जंगल के बीच मनमोहक स्थान को रघुनाथ टीला कहते हैं। रघुनाथ टीला नाम मराठा वीर रघुनाथ राव से जुड़ कर पड़ा था।