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नमस्ते के साथ अभिवादन वैज्ञानिक दृष्टि से भी उत्तम : सेठी
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आर्य समाज थापर नगर में भजन की प्रस्तुति देते भजनोपदेशक।
- फोटो : mrt
मेरठ। आर्य समाज थापरनगर के रविवारीय सत्संग में नमस्ते ही श्रेष्ठ अभिवादन क्यों... विषय पर चर्चा की गई। अध्यक्ष राजेश सेठी ने कहा कि वैदिक काल से परस्पर मिलने पर अभिवादन के रूप में नमस्ते शब्द ही प्रयुक्त किया जाता रहा। वेदों में तो परमात्मा के प्रति श्रद्धा एवं सम्मान अभिव्यक्त करने के लिए भी नमस्ते शब्द का प्रयोग किया गया है। यह वैज्ञानिक दृष्टि से भी सर्वोत्तम है।
मध्यकाल में विभिन्न संप्रदायों एवं क्षेत्रीय संगठनों ने अपने-अपने मत एवं महापुरुषों को प्रचारित करने के लिए अभिवादन के साथ अनेक महापुरुषों के नाम और शब्दों को जोड़ दिया। राजेश सेठी ने बताया कि ये शब्द भी अच्छे एवं शुभ हो सकते हैं, लेकिन अभिवादन की प्रक्रिया के साथ उन वाक्यों या शब्दों का सामंजस्य उचित प्रतीत नहीं होता। नमस्ते शब्द परस्पर छोटे, बड़े, मित्र, बंधु, सखा, माता, पिता पुत्र के प्रति भावनाओं को अभिव्यक्त करने का श्रेष्ठ माध्यम है।
हृदय की भावना के साथ दोनों हाथ जोड़कर मस्तक नवाकर नमस्ते शब्द कहना वास्तविक स्नेह एवं सम्मान का द्योतक है। इसका अर्थ होता है मैं बुद्धि पूर्वक अपने हृदय की समस्त भावनाओं के साथ अपनी वाणी से आपको नमन करता हूं। इसका प्रयोग पूर्णतः सार्थक एवं शास्त्रीय है। महर्षि देव दयानंद ने इसको समाज में स्थापित किया। यह अभिवादन आर्य समाज के सदस्यों की एक पहचान के रूप में प्रचलित हो गया। इसी के कारण आर्य समाज के लोगों का समाज में अत्यंत सम्मान होता था। कोरोना काल के बाद नमस्ते शब्द को अंतरराष्ट्रीय रूप से भी अभिवादन के रूप में स्वीकार कर लिया गया।
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ऐसे अभिवादन करने पर परस्पर शारीरिक संक्रमण का भय भी नहीं रहता है। इसलिए यह वैज्ञानिक दृष्टि से भी उपयुक्त है। डॉ. हरेंद्र चौधरी ने भी नमस्ते अभिवादन के महत्व को बताया। कार्यक्रम में प्रीति सेठी, कमलेश चांदना, सुमन आनंद, सुभाष मल्होत्रा, अपर्णा अग्रवाल ने सुंदर भजन प्रस्तुत किए। आचार्य सत्य प्रकाश शास्त्री के ब्रह्मत्व में देवयज्ञ संपन्न हुआ यजमान रेखा, शांतनु रहे। इस अवसर पर धर्म वीर, अशोक आनंद, अपर्णा अग्रवाल, सुभाष चंद्र, कृष्ण कुमार वर्मा, विजय बंसल, लोकेंद्र सिंह, विक्रम सौंधी रहे।
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मध्यकाल में विभिन्न संप्रदायों एवं क्षेत्रीय संगठनों ने अपने-अपने मत एवं महापुरुषों को प्रचारित करने के लिए अभिवादन के साथ अनेक महापुरुषों के नाम और शब्दों को जोड़ दिया। राजेश सेठी ने बताया कि ये शब्द भी अच्छे एवं शुभ हो सकते हैं, लेकिन अभिवादन की प्रक्रिया के साथ उन वाक्यों या शब्दों का सामंजस्य उचित प्रतीत नहीं होता। नमस्ते शब्द परस्पर छोटे, बड़े, मित्र, बंधु, सखा, माता, पिता पुत्र के प्रति भावनाओं को अभिव्यक्त करने का श्रेष्ठ माध्यम है।
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हृदय की भावना के साथ दोनों हाथ जोड़कर मस्तक नवाकर नमस्ते शब्द कहना वास्तविक स्नेह एवं सम्मान का द्योतक है। इसका अर्थ होता है मैं बुद्धि पूर्वक अपने हृदय की समस्त भावनाओं के साथ अपनी वाणी से आपको नमन करता हूं। इसका प्रयोग पूर्णतः सार्थक एवं शास्त्रीय है। महर्षि देव दयानंद ने इसको समाज में स्थापित किया। यह अभिवादन आर्य समाज के सदस्यों की एक पहचान के रूप में प्रचलित हो गया। इसी के कारण आर्य समाज के लोगों का समाज में अत्यंत सम्मान होता था। कोरोना काल के बाद नमस्ते शब्द को अंतरराष्ट्रीय रूप से भी अभिवादन के रूप में स्वीकार कर लिया गया।
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ऐसे अभिवादन करने पर परस्पर शारीरिक संक्रमण का भय भी नहीं रहता है। इसलिए यह वैज्ञानिक दृष्टि से भी उपयुक्त है। डॉ. हरेंद्र चौधरी ने भी नमस्ते अभिवादन के महत्व को बताया। कार्यक्रम में प्रीति सेठी, कमलेश चांदना, सुमन आनंद, सुभाष मल्होत्रा, अपर्णा अग्रवाल ने सुंदर भजन प्रस्तुत किए। आचार्य सत्य प्रकाश शास्त्री के ब्रह्मत्व में देवयज्ञ संपन्न हुआ यजमान रेखा, शांतनु रहे। इस अवसर पर धर्म वीर, अशोक आनंद, अपर्णा अग्रवाल, सुभाष चंद्र, कृष्ण कुमार वर्मा, विजय बंसल, लोकेंद्र सिंह, विक्रम सौंधी रहे।