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खुशखबर: दूर रखें कीटनाशक, न जलाएं पराली तो चने की खेती होगी मुनाफे वाली

Sat, 02 Mar 2019 12:11 PM IST
Dimple Sirohi मोहित कुमार, अमर उजाला, मेरठ
मोहित कुमार, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Sat, 02 Mar 2019 12:11 PM IST
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Good news for farmer: keep away insecticides from gram corp to get  much production
डॉ. रितेश शर्मा, प्रधान वैज्ञानिक व प्रभारी बीईडीएफ

बासमती निर्यात विकास प्रतिष्ठान (बीईडीएफ) के वैज्ञानिकों द्वारा पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए बिना कीटनाशक के चने की खेती करने के नतीजे लंबे समय बाद आने शुरू हो गए हैं। यदि दलहनी फसलों की खेती के लिए उचित फसल चक्र अपनाया जाया और पराली जलाने पर अनिवार्य रूप से प्रतिबंध लग जाए तो चने की खेती बिना कीटनाशक की जा सकती है। इसके लिए एनसीआर के साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों को जागरूक भी किया जा रहा है। 

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दलहनी फसलों को बढ़ावा देने के लिए जहां कृषि वैज्ञानिक लगातार शोध कर नई किस्में ईजाद कर रहे हैं। वहीं, फसलों को बिना कीटनाशक के प्रयोग के उगाने पर भी शोध चला। वेस्ट यूपी में चने की खेती की संभावनाओं को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने इसकी खेती में कीटनाशक न प्रयोग करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। वैज्ञानिक जो तकनीक बता रहे हैं, उससे न केवल गुणवत्ता युक्त फसल का उत्पादन होगा बल्कि किसानों को भी फसल के अतिरिक्त दाम मिलेंगे।

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इस तकनीक से होगी पूर्ति
डॉ. शर्मा के अनुसार दलहनी फसलों को उगाने से खेतों में प्राकृतिक नाइट्रोजन की पूर्ति होती है। अधिक उत्पादन लेने के लिए हमें फसल चक्र को अपनाना होगा। ऐसी फसलों का चयन करना होगा जिससे मिट्टी में उर्वरा शक्ति का संतुलन बना रहे।

वेस्ट यूपी में चने की खेती किसानों के लिए बेहद लाभकारी है। चने व अन्य दलहनी फसलों की जड़ों में राइजोबियम होते हैं जो वातावरण से नाइट्रोजन लेकर हमारी भूमि में डालते हैं जिससे यूरिया आदि की जरूरत कम हो जाती है।

अवशेष जलाने बंद हों
दिल्ली एनसीआर, पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खेतों में परीली जलाने पर पहले से रोक है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि किसान खेतों में फसलों के अवशेष जलाने बंद कर दें तो जमीन में नाइट्रोजन का नुकसान नहीं होता। फसलों के अवशेष यदि खेत में ही छोड़कर उन्हें वहीं गला दिया जाए तो यह खेती के लिए उर्वरकों का काम करते हैं। परीली नहीं जलेगी तो पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा।

अब किसानों की बारी
बासमती निर्यात विकास प्रतिष्ठान में इस तकनीक से चने की खेती करने से काफी अच्छे रिजल्ट देखने को मिल रहे हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि चने की खेती में किसान की लागत बेहद कम लगती है जबकि आमदनी अच्छी होती है। यदि धान की फसल लेने के बाद उसके पुआल को खेत में ही जोत दिया जाए और उसके बाद चने की खेती की जाए तो चने की उन्नत फसल होती है। 

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यूं आती है क्षमता में कमी
बासमती निर्यात विकास प्रतिष्ठान के प्रधान वैज्ञानिक व प्रभारी डॉ. रितेश कुमार शर्मा का कहना है कि खेतों में एक जैसी फसल लेने और संतुलित मात्रा से अधिक उवर्रकों का प्रयोग करने से मिट्टी की क्षमता में कमी आती है। मिट्टी से नाइट्रोजन की मात्रा कम होती जाती है। 

किसानों को कर रहे जागरूक  
चने की खेती मुनाफे की खेती है। किसान खेतों में परीली जलाते है, जो गलत है। किसान अवशेष को खेत में डाल दें तो अच्छा रिजल्ट आएगा। बीईडीएफ केंद्र पर बिना पेस्टीसाइड के चने की खेती की जा रही है। जिसके बारे में वेस्ट यूपी के किसानों को जागरूक किया जा रहा है। -डॉ. रितेश शर्मा, प्रधान वैज्ञानिक व प्रभारी बीईडीएफ

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