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बाजू में फटा दुश्मन का गोला... फिर भी नहीं डिगा हौसला
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बाजू में फटा दुश्मन का गोला... फिर भी नहीं डिगा हौसला
मोदीनगर। कारगिल युद्ध में दुश्मनों ने लोहा लेने वाले जाट रेजिमेंट के जवान गांव रोरी निवासी (सेवानिवृत्त) परविंदर ने बताया कि उनके बाजू में ही दुश्मनों का एक गोला आकर फटा लेकिन उनके और देश के अन्य वीर जवानों का हौसला नहीं डिगा सका। अनेक वीर सैनिकों ने दुश्मन को धूल चटाते हुए अपने साथी सैनिकों व खुद को बचाते हुए बहादुरी की मिसाल कायम की। परविंदर ऑपरेशन विजय स्टार तथा ऑपरेशन विजय मेडल से सम्मानित हैं। वर्तमान में वह गांव में युवाओं को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग दे रहे हैं।
परविंदर बताते है कि 1996 में सेना में भर्ती हुए थे। एक साल की ट्रेनिंग के बाद उनकी तैनाती 4 जाट रेजिमेंट में पिथौरागढ़ में हुई। एक साल बाद 1998 में उनकी यूनिट कारगिल आ गई। 1999 में युद्ध के दौरान वह कैप्टन अमित भारद्वाज और 30 जवानों के साथ पोस्ट की ओर गए। इसमें कैैप्टन अमित भारद्वाज शहीद हो गए। इसके बाद दुश्मन की तरफ से भारी गोलाबारी शुरू कर दी गई। इस दौरान दुश्मन का एक बम धमाका उनके पास हुआ जिसमें उनके साथी सैनिक व दोस्त मुजफ्फनगर के बुढ़ाना तहसील स्थित इटावा गांव निवासी नरेंद्र राठी शहीद हो गए तथा दो सैनिक गंभीर रूप से घायल हो गए। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी भारतीय सैनिक अपने देश की रक्षा के लिए जी-जान से लड़े।
24 घंटे में एक बार पहुंचता था खाना
परविंदर बताते हैं कि बर्फबारी से बचने के लिए न ही तो उनके पास जैकेट थे और न ही स्नो शूज, साथ ही खाना भी 24 घंटे में एक बार पहुंचता था। ऐसे में युद्घ के दौरान भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। परविंदर अपने साथी और दोस्त शहीद नरेंद्र को श्रद्धांजलि देने के लिए उनके पैतृक निवास स्थान बुढ़ाना के इटावा गांव जाते हैं। उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं।
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मोदीनगर। कारगिल युद्ध में दुश्मनों ने लोहा लेने वाले जाट रेजिमेंट के जवान गांव रोरी निवासी (सेवानिवृत्त) परविंदर ने बताया कि उनके बाजू में ही दुश्मनों का एक गोला आकर फटा लेकिन उनके और देश के अन्य वीर जवानों का हौसला नहीं डिगा सका। अनेक वीर सैनिकों ने दुश्मन को धूल चटाते हुए अपने साथी सैनिकों व खुद को बचाते हुए बहादुरी की मिसाल कायम की। परविंदर ऑपरेशन विजय स्टार तथा ऑपरेशन विजय मेडल से सम्मानित हैं। वर्तमान में वह गांव में युवाओं को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग दे रहे हैं।
परविंदर बताते है कि 1996 में सेना में भर्ती हुए थे। एक साल की ट्रेनिंग के बाद उनकी तैनाती 4 जाट रेजिमेंट में पिथौरागढ़ में हुई। एक साल बाद 1998 में उनकी यूनिट कारगिल आ गई। 1999 में युद्ध के दौरान वह कैप्टन अमित भारद्वाज और 30 जवानों के साथ पोस्ट की ओर गए। इसमें कैैप्टन अमित भारद्वाज शहीद हो गए। इसके बाद दुश्मन की तरफ से भारी गोलाबारी शुरू कर दी गई। इस दौरान दुश्मन का एक बम धमाका उनके पास हुआ जिसमें उनके साथी सैनिक व दोस्त मुजफ्फनगर के बुढ़ाना तहसील स्थित इटावा गांव निवासी नरेंद्र राठी शहीद हो गए तथा दो सैनिक गंभीर रूप से घायल हो गए। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी भारतीय सैनिक अपने देश की रक्षा के लिए जी-जान से लड़े।
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24 घंटे में एक बार पहुंचता था खाना
परविंदर बताते हैं कि बर्फबारी से बचने के लिए न ही तो उनके पास जैकेट थे और न ही स्नो शूज, साथ ही खाना भी 24 घंटे में एक बार पहुंचता था। ऐसे में युद्घ के दौरान भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। परविंदर अपने साथी और दोस्त शहीद नरेंद्र को श्रद्धांजलि देने के लिए उनके पैतृक निवास स्थान बुढ़ाना के इटावा गांव जाते हैं। उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं।
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