EXCLUSIVE: करीब है होली, दिहाड़ी पर बन रही सुल्फे की गोली
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होली से पहले नशे का कारोबार पूरे चरम पर है। खादर में कच्ची शराब तो बनाई ही जा रही है। इसके अलावा भांग के पौधाें की पत्तियों से तैयार होने वाले सुल्फे की मांग भी बढ़ गई है। हैरत की बात ये है कि नशा माफिया इन दिनों लघु उद्योग की तरह दिहाड़ी मजदूरी देकर सुल्फा तैयार कराकर उसका स्टॉक कर रहे हैं। अमर उजाला ने नशे के इस कारोबार का स्टिंग किया तो पूरा सच निकलकर सामने आ गया।
कैसे तैयार होता है सुल्फा
भांग के पौधे की पत्तियों को हथेलियों से रगड़ा जाता है। इससे उसका रस हथेली पर जमता रहता है। बाद में हथेलियों को आपस में रगड़कर उससे उतरने वाले मैल को कागज पर इकट्ठा कर लिया जाता है। इस मैल की गोली बना ली जाती है। यही मैल की गोली सुल्फा होती है।
कैसे होता है इसका प्रयोग
सुल्फे का प्रयोग सिगरेट या चिलम में होता है। नशा करने वाले चने की दाल के बराबर सुल्फा माचिस की तीली जैसी बारीक लकड़ी के आगे चिपका लेते हैं। इससे पहले वह सिगरेट का तंबाकू कागज पर निकाल लेते हैं। इस सुल्फे को आग लगा दी जाती है। जैसे ही यह थोड़ा जलता है, उसकी आग बुझाकर इसके चूरे को सिगरेट के तंबाकू में मिला दिया जाता है। इस सुल्फा मिश्रित तंबाकू को वापस सिगरेट में भरके पिया जाता है। इसके अलावा इसी प्रक्रिया को चिलम के तंबाकू के साथ भी प्रयोग करके पिया जाता है।
खतरनाक है ये नशा
सुल्फे का नशा आदमी को धीरे-धीरे अपना आदी बना लेता है। इसे पीने पर आदमी की आंखें लाल हो जाती हैं और शरीर में सुस्ती आने के साथ दिमाग भी शून्य में जाने लगता है। यदि इसका सेवन ज्यादा कर लिया जाये, तो आदमी मानसिक रूप से बीमार या पागल भी हो सकता है।
इस समय तैयार करते हैं सुल्फा
भांग के पौधे खरपतवार की तरह होते हैं और बारिश के समय हरे-भरे होकर ज्यादा पैदा होते हैं। लेकिन इस दौरान पत्तियों में रस तो ज्यादा होता है, लेकिन नशा बहुत कम होता है। सर्दियां आने पर इन पत्तियों का रस गाढ़ा होना शुरू हो जाता है। ऐसे में फरवरी से अप्रैल तक का समय इन पत्तियों से सुल्फा तैयार करने के लिए सबसे उपयुक्त होता है। क्योंकि गर्मियों में जहां पत्तियों का रस सूख जाता है तो इसे तैयार करने वाले ज्यादा देर काम भी नहीं कर पाते हैं।
दिहाड़ी पर तैयार कराते हैं नशा
अमर उजाला ने इस नशे को तैयार करने वालों का स्टिंग किया। छोटा मवाना रोड से बाईपास की ओर जाने वाली सड़क किनारे एक खेत में कई लोग भांग की पत्तियां रगड़ रहे थे। संवाददाता ने ऑन कैमरा जब बात की, तो इन लोगों ने बताया कि उन्हें भांग के पौधे की पहचान होती है। माफिया के लिए वह मजदूरी पर यह काम कर रहे हैं। एक मजदूर को 20 ग्राम सुल्फा बनाना होता है, जिसमें तीन-चार घंटे का समय लगता है। इसके बदले उसे 300 रुपये मिलते हैं। बाजार में 10 ग्राम सुल्फे की कीमत 600 रुपये तक है। गर्मियों में इसकी कीमत और ज्यादा हो जाती है।
प्रतिबंधित नशा है सुल्फा
आबकारी विभाग सिर्फ भांग का ठेका छोड़ता है। जिसमें भांग की पत्तियों को उबालकर उसके गोले बेचने की अनुमति है। यह गोला दवाई, पूजा और प्रसाद आदि में काम आता है। कुछ लोग इस गोले का नशा भी करते हैं। लेकिन सुल्फा पूरी तरह प्रतिबंधित नशा है। इसे ड्रग्स की श्रेणी में रखा गया है।
युवा हो रहे ज्यादा शिकार
सुल्फा ड्रग्स की श्रेणी में आने वाले नशे में डोडा के बाद सबसे सस्ता नशा है। लेकिन इस प्रभाव डोडा से कहीं ज्यादा और तेज है। ऐसे में कालेजों के छात्र और युवा सुल्फे की लत का शिकार होते जा रहे हैं।
वर्जन...
हमारे यहां से सिर्फ भांग का ठेका दिया जाता है। सुल्फा जैसा कोई उत्पाद आबकारी विभाग में नहीं है। ऐसे मामलों पर पुलिस को कार्रवाई करनी चाहिए। - प्रदीप दूबे, जिला आबकारी अधिकारी