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लीड:::::: सहारनपुर को छोड़ नजर नहीं आया ध्रुवीकरण
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जमीन पर नजर नहीं आया ध्रुवीकरण, कम मतदान ने बढ़ाई भाजपा की धड़कनें
-2009 के जैसा दिखा मतदान प्रतिशत का पैटर्न
सैयद यासिर रजा
कॉमन इंट्रों
मेरठ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से शुरु हुए पहले चरण के चुनाव में मतदाताओं का उत्साह पिछले दो चुनाव के मुकाबले काफी कम दिखाई दिया। सहारनपुर की सीट छोड़ दें तो किसी भी सीट पर ध्रुवीकरण नजर नहीं आया। यहां तक कि मुजफ्फरनगर और कैराना जिसे 2014 में ध्रुवीकरण का केंद्र माना गया था वहां मतदाता जातियों में बंटे नजर आए। 2014 के चुनाव में कैराना से उठे पलायन के मुद्दे और मुजफ्फरनगर क दंगे के मुद्दे ने मतदाताओं को दो भागों में बांट दिया था। 2019 के चुनाव में जब अजित सिंह समाजवादी पार्टी के साथ आए तो इसका असर कुछ हद तक कम जरूर हुआ था, लेकिन पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ था। इस चुनाव में ध्रुवीकरण की हवा महसूूस नहीं की गई। इसके पीछे एक बड़ा कारण भाजपा में हुए टिकट वितरण को माना जा रहा है,जिसका असर यह हुआ कि भाजपा के जो मतदाता थे वह या तो बिखरे नजर आए या फिर मतदान के प्रति उदासीन दिखे। इसके उलट मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में लंबी-लंबी कतारों में मतदाता नजर आ रहे थे। कई क्षेत्रों में बहुजन समाज पार्टी भी अच्छी लड़ाई में नजर आ रही थी।
कैसे 2009 के पैटर्न पर नजर आया चुनाव
पहले चरण में जिन 8 सीटों पर चुनाव हुआ है उसमें सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर और पीलीभीत की सीट शामिल रहीं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार इन सीटों पर मतदान का औसत प्रतिशत 57.54 रहा। जबकि 2009 के चुनाव में इन्हीं सीटों औसत मतदान 56.77 प्रतिशत हुआ था। 2009 में कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन था। सपा, बसपा और भाजपा अलग-अलग चुनाव लड़े थे। उस समय बसपा ने तीन, सपा ने दो, रालोद, कांग्रेस और भाजपा को एक-एक सीट मिली थी। खास बात यह थी कि पीलीभीत छोड़ कर किसी भी सीट पर हार जीत का अंतर एक लाख से कम था। पीलीभीत में वरुण गांधी ने 2 लाख 81 हजार से अधिक मतों से जीत हासिल की थी। 2014 और 2019 में मतदाताओं में जबर्दस्त उत्साह दिखा था। इन दोनों चुनावों में औसत मतदान 66 प्रतिशत से अधिक रहा था।
पिछले चुनाव के मुकाबले पांच से 13 प्रतिशत का रहा अंतर
2019 के मुकाबले इस बार जिन सीटों पर शुक्रवार को चुनाव संपन्न हुआ उसमें 5 से 13 प्रतिशत वोटिंग कम हुई। मसलन नगीना में 2019 में 63 प्रतिशत मतदान हुआ था, इस बार 58 प्रतिशत रहा। पीलीभीत में सात प्रतिशत कम मतदान हुआ। पिछले चुनाव में 67 प्रतिशत और इस चुनाव में 60 प्रतिशत रहा। सबसे बड़ा अंतर रामपुर में रहा जहां 11 प्रतिशत कम मतदान हुआ। मुरादाबाद में यह अंतर 8 प्रतिशत, सहारनपुर में 7 प्रतिशत का अंतर देखने को मिला।
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अपने-अपने तरीके से लगा रहे गणित
2014 और 2019 के मुकाबले कम हुए मतदान ने राजनैतिक दलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। इस आंकड़े को राजनैतिक दल अपने-अपने पक्ष में देख सकते हैं। चुनाव के समय देश में कांग्रेस की सरकार थी और 2009 के चुनाव में कांग्रेस दोबारा सत्ता में आ गई। ऐसे में भाजपा के हिमायती कह सकते हैं क्योंकि 2009 में तत्कालीन सरकार की वापसी हुई थी, इसबार भी मतदान का पैटर्न वही रहा है तो भाजपा सरकार वापस आने जा रही है। वहीं विपक्ष इस बात पर खुश हो सकता है कि कम मतदान में उसके प्रत्याशियों की जीत होती रही है। ऐसे में इस चुनाव में हुआ कम मतदान उसके पक्ष में जा सकता है। नतीजा क्या होगा? चुनाव किसके पक्ष में जाएगा इसका पता तो 4 जून को ही चलेगा।
एक दूसरे से ज्यादा सीट लाने की होड़
एक तरफ़ भाजपा जहां 400 पार के नारे के साथ मैदान में है और यूपी की सभी 80 सीटों को जीतने का दावा कर रही है। वहीं बसपा और सपा के बीच एक दूसरे से अधिक सीट लाने की होड़ है। दरअसल 2019 के चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी गठबंधन के साथ चुनाव लड़ रही थीं। रालोद भी उनके साथ थी। नतीजा आया तो सपा को 5 और बसपा को 10 सीटें मिलीं। रालोद की झोली खाली रही थी। इस बार दोनों ही दल अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में दोनों की कोशिश एक दूसरे से अधिक सीट हासिल करने की है। शुक्रवार को जिन 8 सीटों पर चुनाव हुआ है उनमें 3 सीटों सहारनपुर, बिजनौर और नगीना पर बसपा, तीन सीटों कैराना, मुजफ्फरनगर और पीलीभीत पर भाजपा और दो सीटों मुरादाबाद और रामपुर पर समाजवादी पार्टी का कब्जा था। वहीं 2014 में इन सभी सीटों पर भाजपा ने जीत का परचम लहराया था। देखना दिलचस्प होगा कि 2024 के चुनाव में कौन सी पार्टी अपनी सीट बचा पाती है और कौन सी पार्टी अपनी सीट गंवाती है।
जितना अधिक मतदान भाजपा की उतनी बड़ी जीत
2014 के चुनाव में भाजपा ने इन सभी आठ सीटों पर बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी। मुजफ्फरनगर में संजीव बालियान ने 4 लाख एक हजार के अंतर से, पीलीभीत में मेनका गांधी ने 3 लाख सात हजार के अंतर से, कैराना में हुकुम सिंह ने 2 लाख 36 हजार वोटों से, बिजनौर मेें कुंवर भारतेंद्र ने 2 लाख 5 हजार से, सहारनपुर, नगीना, मुरादाबाद और रामपुर में हार जीत का अंतर एक लाख से कम का था।
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-2009 के जैसा दिखा मतदान प्रतिशत का पैटर्न
सैयद यासिर रजा
कॉमन इंट्रों
मेरठ। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से शुरु हुए पहले चरण के चुनाव में मतदाताओं का उत्साह पिछले दो चुनाव के मुकाबले काफी कम दिखाई दिया। सहारनपुर की सीट छोड़ दें तो किसी भी सीट पर ध्रुवीकरण नजर नहीं आया। यहां तक कि मुजफ्फरनगर और कैराना जिसे 2014 में ध्रुवीकरण का केंद्र माना गया था वहां मतदाता जातियों में बंटे नजर आए। 2014 के चुनाव में कैराना से उठे पलायन के मुद्दे और मुजफ्फरनगर क दंगे के मुद्दे ने मतदाताओं को दो भागों में बांट दिया था। 2019 के चुनाव में जब अजित सिंह समाजवादी पार्टी के साथ आए तो इसका असर कुछ हद तक कम जरूर हुआ था, लेकिन पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ था। इस चुनाव में ध्रुवीकरण की हवा महसूूस नहीं की गई। इसके पीछे एक बड़ा कारण भाजपा में हुए टिकट वितरण को माना जा रहा है,जिसका असर यह हुआ कि भाजपा के जो मतदाता थे वह या तो बिखरे नजर आए या फिर मतदान के प्रति उदासीन दिखे। इसके उलट मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में लंबी-लंबी कतारों में मतदाता नजर आ रहे थे। कई क्षेत्रों में बहुजन समाज पार्टी भी अच्छी लड़ाई में नजर आ रही थी।
कैसे 2009 के पैटर्न पर नजर आया चुनाव
पहले चरण में जिन 8 सीटों पर चुनाव हुआ है उसमें सहारनपुर, कैराना, मुजफ्फरनगर, बिजनौर, मुरादाबाद, रामपुर और पीलीभीत की सीट शामिल रहीं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार इन सीटों पर मतदान का औसत प्रतिशत 57.54 रहा। जबकि 2009 के चुनाव में इन्हीं सीटों औसत मतदान 56.77 प्रतिशत हुआ था। 2009 में कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन था। सपा, बसपा और भाजपा अलग-अलग चुनाव लड़े थे। उस समय बसपा ने तीन, सपा ने दो, रालोद, कांग्रेस और भाजपा को एक-एक सीट मिली थी। खास बात यह थी कि पीलीभीत छोड़ कर किसी भी सीट पर हार जीत का अंतर एक लाख से कम था। पीलीभीत में वरुण गांधी ने 2 लाख 81 हजार से अधिक मतों से जीत हासिल की थी। 2014 और 2019 में मतदाताओं में जबर्दस्त उत्साह दिखा था। इन दोनों चुनावों में औसत मतदान 66 प्रतिशत से अधिक रहा था।
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पिछले चुनाव के मुकाबले पांच से 13 प्रतिशत का रहा अंतर
2019 के मुकाबले इस बार जिन सीटों पर शुक्रवार को चुनाव संपन्न हुआ उसमें 5 से 13 प्रतिशत वोटिंग कम हुई। मसलन नगीना में 2019 में 63 प्रतिशत मतदान हुआ था, इस बार 58 प्रतिशत रहा। पीलीभीत में सात प्रतिशत कम मतदान हुआ। पिछले चुनाव में 67 प्रतिशत और इस चुनाव में 60 प्रतिशत रहा। सबसे बड़ा अंतर रामपुर में रहा जहां 11 प्रतिशत कम मतदान हुआ। मुरादाबाद में यह अंतर 8 प्रतिशत, सहारनपुर में 7 प्रतिशत का अंतर देखने को मिला।
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अपने-अपने तरीके से लगा रहे गणित
2014 और 2019 के मुकाबले कम हुए मतदान ने राजनैतिक दलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। इस आंकड़े को राजनैतिक दल अपने-अपने पक्ष में देख सकते हैं। चुनाव के समय देश में कांग्रेस की सरकार थी और 2009 के चुनाव में कांग्रेस दोबारा सत्ता में आ गई। ऐसे में भाजपा के हिमायती कह सकते हैं क्योंकि 2009 में तत्कालीन सरकार की वापसी हुई थी, इसबार भी मतदान का पैटर्न वही रहा है तो भाजपा सरकार वापस आने जा रही है। वहीं विपक्ष इस बात पर खुश हो सकता है कि कम मतदान में उसके प्रत्याशियों की जीत होती रही है। ऐसे में इस चुनाव में हुआ कम मतदान उसके पक्ष में जा सकता है। नतीजा क्या होगा? चुनाव किसके पक्ष में जाएगा इसका पता तो 4 जून को ही चलेगा।
एक दूसरे से ज्यादा सीट लाने की होड़
एक तरफ़ भाजपा जहां 400 पार के नारे के साथ मैदान में है और यूपी की सभी 80 सीटों को जीतने का दावा कर रही है। वहीं बसपा और सपा के बीच एक दूसरे से अधिक सीट लाने की होड़ है। दरअसल 2019 के चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी गठबंधन के साथ चुनाव लड़ रही थीं। रालोद भी उनके साथ थी। नतीजा आया तो सपा को 5 और बसपा को 10 सीटें मिलीं। रालोद की झोली खाली रही थी। इस बार दोनों ही दल अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में दोनों की कोशिश एक दूसरे से अधिक सीट हासिल करने की है। शुक्रवार को जिन 8 सीटों पर चुनाव हुआ है उनमें 3 सीटों सहारनपुर, बिजनौर और नगीना पर बसपा, तीन सीटों कैराना, मुजफ्फरनगर और पीलीभीत पर भाजपा और दो सीटों मुरादाबाद और रामपुर पर समाजवादी पार्टी का कब्जा था। वहीं 2014 में इन सभी सीटों पर भाजपा ने जीत का परचम लहराया था। देखना दिलचस्प होगा कि 2024 के चुनाव में कौन सी पार्टी अपनी सीट बचा पाती है और कौन सी पार्टी अपनी सीट गंवाती है।
जितना अधिक मतदान भाजपा की उतनी बड़ी जीत
2014 के चुनाव में भाजपा ने इन सभी आठ सीटों पर बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी। मुजफ्फरनगर में संजीव बालियान ने 4 लाख एक हजार के अंतर से, पीलीभीत में मेनका गांधी ने 3 लाख सात हजार के अंतर से, कैराना में हुकुम सिंह ने 2 लाख 36 हजार वोटों से, बिजनौर मेें कुंवर भारतेंद्र ने 2 लाख 5 हजार से, सहारनपुर, नगीना, मुरादाबाद और रामपुर में हार जीत का अंतर एक लाख से कम का था।