देवबंद: पीएम मोदी के बयान पर मदनी का कटाक्ष -छात्र एक हाथ में लैपटॉप लेकर न कुरआन पढ़ा सकेंगे न नमाज
रविवार को अपने आवास पर मीडिया से रुबरु हुए जमीयत अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने साफ लफ्जों में कहा कि हमें ऐसे लोगों की जरुरत है जो लैपटॉप न लें, बल्कि शहर और देहात की मस्जिदों और जंगलों में पांच वक्त की नमाज पढ़ा सकें।
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रविवार को अपने आवास पर मीडिया से रुबरु हुए जमीयत अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने साफ लफ्जों में कहा कि यह हम जानते हैं कि मदरसों की शिक्षा कैसे अच्छी होगी। लैपटॉप लेकर होगी, मोबाइल लेकर होगी या सिर्फ कुरआन लेकर होगी। हम पहले भी कह चुके हैं और आज भी कहते हैं कि हमें ऐसे लोगों की जरुरत है जो लैपटॉप न लें बल्कि शहर और देहात की मस्जिदों और जंगलों में पांच वक्त की नमाज पढ़ा सकें। हमारे बच्चों को कुरआन की तालीम दे सकें। लैपटॉप एक हाथ में लेकर वह न कुरआन पढ़ा सकेंगे और न ही वह नमाज पढ़ा सकेंगे। इसलिए हम ऐसे लोग तैयार कर रहे हैं जो हमारी मजहबी जरुरतों को पूरा कर सकें।
जाकर देखो मदरसों में कोई रिवाल्वर लिए बैठा हैः अरशद मदनी
आतंकवाद के सवाल पर मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि मदरसों के दरवाजे हमेशा खुले हुए हैं। बल्कि 90 प्रतिशत मदरसे ऐसे हैं जिनमें दरवाजे तक नहीं हैं। सुबह से शाम तक कुत्ता, बिल्ली, गधा, घोड़ा जो चाहता है घुस जाता है, उसमें आदमी भी घुस सकता है। जाकर देखिए क्या पढ़ाया जाता है, किसको मारा जा रहा है किसके हाथ में छुरी है कौन रिवाल्वर लिए बैठा है। मौलाना मदनी ने कहा कि मदरसों के अंदर कुत्ते भगाने के लिए बांस तक भी नहीं मिलेगा।
सेना भर्ती को लेकर गाडियां फूंकने वाले मदरसा छात्र नहीं थे : अरशद मदनी
मौलाना अरशद मदनी ने सवाल उठाते हुए कहा कि सेना भर्ती को लेकर जिन्होंने गाडियां फूंकी, क्या वह किसी मदरसे के छात्र थे। हकीकत यह है कि किसी मदरसा छात्र ने आज तक कोई गाड़ी नहीं फूंकी, क्योंकि हमारी तालीम में इस अराजकता की कोई गुंजाइश ही नहीं है। यदि उन्हें किसी चीज का विरोध करना होता है तो वह केवल गुस्से का इजहार कर देते हैं।
पूर्व की सरकारें जानती थीं दारुल उलूम की कुर्बानियां
सरकार पर निशाना साधते हुए मौलाना मदनी ने दो टूक कहा कि उलमा और दारुल उलूम देवबंद की मुल्क में आजादी में दी गई कुर्बानियों को पूर्व की सरकारें जानती थी। उसकी बुनियाद पर ही दारुल उलूम को राहत दी जाती थी। लेकिन अब वो सहूलियत नहीं मिल रही है, जो अफसोस की बात है। उन्होंने यह भी कहा कि हम किसी सरकार से खुश या नाखुश नहीं होते। क्योंकि हम जमीन पर बैठकर पढऩे और पढ़ाने वाले लोग हैं। हमें किसी की कुर्सी का कोई लालच या लेना देना नहीं है।
दारुल उलूम में पढ़ते थे हिंदू छात्र
मौलाना अरशद मदनी ने दारुल उलूम के इतिहास के पन्ने उलटते हुए कहा, स्थापना के समय ही दारुल उलूम ने यह नियम बनाया था कि हम सरकार से कोई सहायता नहीं लेंगे। मुसलमानों तमाम दीनी इदारों को अपने चंदे से चलाएगा। दारुल उलूम आज भी उस पर कायम है। दारुल उलूम ने हमेशा इंसानियत को तरजीह दी है। यही कारण है कि दारुल उलूम के शुरुआती दौर में हिंदू भाई भी यहां तालीम हासिल किए करते थे। वह यहां प्रवेश लेकर पढ़ने आते थे।