स्मृति दिवस: दैदीप्यमणि `दादी प्रकाशमणि' ने प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय को दीं नई ऊंचाइयां
दादी प्रकाशमणि जी ने अपने जीवनकाल में विश्व कल्याण का परचम प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के विशाल आध्यात्मिक संगठन का सफल नेतृत्व करते हुए फहराया। उन्होंने 14 वर्ष की अल्पायु में ही अपना जीवन मानव कल्याण हेतु प्रभु अर्पण कर दिया।उनके मूल्य एवं आध्यात्मिक शिक्षा की पुनर्स्थाना को देखते हुए मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर ने 30 दिसंबर 1992 को डॉक्टरेट की मानद् उपाधि से उन्हें सम्मानित किया
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प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के विशाल आध्यात्मिक संगठन का सफल नेतृत्व करते हुए दादी प्रकाशमणि जी ने अपने जीवनकाल में विश्व कल्याण का परचम फहराया। वह प्रेम और दया की
प्रतिमूर्ति थीं। ऐसी महान विभूति का जन्म दीपावली के शुभ दिन सन् 1922 में अवभिाजित भारत के सिंध प्रांत के हैदराबाद शहर में हुआ।
दादी प्रकाशमणि बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि थीं। उनका इस संस्था में एक स्नेहमयी, लगनशील, आज्ञाकारी कुमारी के रूप में पदार्पण हुआ। उस समय इस संस्था को `ओम मंडली' के नाम से जाना जाता था। उन्होंने 14 वर्ष की अल्पायु में ही अपना जीवन मानव कल्याण के लिए प्रभु को अर्पण कर दिया।
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वह परमात्म शिक्षा से प्रेरित होकर अपने जीवन में पवित्रता, शांति, प्रेम, सरलता, दिव्यता, नम्रता, निरहंकारिता जैसे गुणों को अपनाकर आध्यात्मिक प्रकाश को फैलाने और मानव को महान बनाने के कार्य में सफल रहीं। उनके मूल्य एवं आध्यात्मिक शिक्षा की पुनर्स्थाना को देखते हुए मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर ने 30 दिसंबर 1992 को डॉक्टरेट की मानद् उपाधि से उन्हें सम्मानित किया।
1969 में प्रजापिता ब्रह्मा ने अध्यात्म की मशाल दादी को सौंप दी और स्वयं संपूर्ण बन गए। ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने के पश्चात् दादी जी ने संपूर्ण मानवता का सेवा करते हुए एक विशाल आध्यात्मिक संगठन को साथ लेकर विश्व सेवा का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने विभिन्न जाति, वर्ग, रंग-भेद को दूर करने के लिए मानवता में विश्व-बंधुत्व एवं वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को जगाने के लिए आत्मिक एवं प्रभु संतान की स्मृति दिलाई तथा परमात्म अवतरण के ईश्वरीय संदेश को अल्प समय में संपूर्ण विश्व के क्षितिज पर गुंजायमान किया।
आपके कुशल नेतृत्व का कमाल रहा कि संस्थान को संयुक्त राष्ट्र संघ ने गैर सरकारी संस्था के तौर पर आर्थिक एवं सामाजिक परिषद का परामर्शक सदस्य बनाया एवं यूनिसेफ ने भी अपने कार्यों में अपना सहभागी बनाया।
आपके नेतृत्व में संस्था ने विश्व शांति हेतु कई रचनात्मक एवं सार्थक कार्यक्रम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किए। उनकी उपलब्धियों को देखकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने सन् 1987 में एक अंतर्राष्ट्रीय तथा पांच राष्ट्रीय स्तर के `शांतिदूत" पुरस्कार प्रदान कर उन्हें सम्मानित किया।
कुशल प्रशासिका दादी जी के कर्तव्यो, गुणों, चरित्रों और महानताओं की झलक सर्व को अपनी ओर आकर्षित करती थी। ऐसे विशालहृदयी व्यक्तित्व की धनी थीं। दादी प्रकाशमणि, जिनके दर्शन मात्र से दुःख, अशांति एवं चिंताएं दूर हो जाती थीं। आज वह सबके दिलों में अमर हैं। ऐसी महान विभूति दादी प्रकाशमणि ने 25 अगस्त 2007 में अपनी भौतिक देह का त्याग कर नई दुनिया के निर्माण के लिए अव्यक्त यात्रा को प्रस्थान किया।