ऑनर किलिंग: बहनों के कातिल बन गए राखी वाले हाथ, झकझोर देगी ये घटनाएं
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बचपन से भाइयों को घर में खुद से ऊपर पाया। पानी, चाय, खाना सब उनके हाथों में दिया। दोयम होकर भी भाइयों पर प्यार लुटाती रहीं। हर साल बड़ी खुशी से उनकी कलाई पर राखी बांधतीं। उन्हीं राखी वाले हाथों ने बहनों की बेरहमी से हत्या कर दी। जिनके साथ, जिनके बीच रहकर वे पली-बढ़ीं, वही उनके कातिल बन गए। ऐसे कातिल जिन्हें अपने किए का कोई अफसोस नहीं हैं। आम बातों पर बेटियों की हत्या आम हो गई है...
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बचपन से भाइयों को घर में खुद से ऊपर पाया। पानी, चाय, खाना सब उनके हाथों में दिया। दोयम होकर भी भाइयों पर प्यार लुटाती रहीं। हर साल बड़ी खुशी से उनकी कलाई पर राखी बांधतीं। उन्हीं राखी वाले हाथों ने बहनों की बेरहमी से हत्या कर दी। जिनके साथ, जिनके बीच रहकर वे पली-बढ़ीं, वही उनके कातिल बन गए। ऐसे कातिल जिन्हें अपने किए का कोई अफसोस नहीं हैं। आम बातों पर बेटियों की हत्या आम हो गई है...
पुरुषवादी समाज के ये वो क्रूर चेहरे हैं जो झूठी आन के नाम पर अपनी बहन-बेटियों की बलि लेते आए हैं। वह तड़पती रहीं, जान की भीख मांगती रहीं पर वे नहीं पसीजे। उनका दम निकल गया पर वे वार करते रहे। इतना निर्मम भी कोई हो सकता है। मुजफ्फरनगर में इसी साल ऑनर किलिंग की दिल दहला देने वाली दो घटनाएं हुईं। जिनकी केस हिस्ट्री झकझोर देती है। परिजनों ने आरोपियों के खिलाफ तहरीर दी है लेकिन लड़ाई लंबी है।
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इस घटना के बाद से ही आदेश अपनी बहन से नाराज था। एक दिन उसे इसी मामले में बयान देने के लिए थाने ले जाने के बहाने घर से ले गया। रास्ते में तमंचे से उस पर गोलियों की बौछार कर दी। उसकी नफरत इस हद तक थी कि दो गोली मारने के बाद भी उसके हाथ नहीं रुके। जबकि उसकी बहन पहले ही दम तोड़ चुकी थी। इस नृशंस हत्या को अंजाम देने के बाद आदेश थाने गया और अपना जुर्म कुबूल किया। उसने कहा कि उसे अपने किए का कोई पछतावा नहीं है। इज्जत से बड़ा कुछ भी नहीं है।
प्रेम विवाह की खता पर मौत की सजा
क्या कहते हैं समाजशास्त्री
समाज की संरचना और मूल्य पितृ सत्तात्मक हैं। इन मूल्यों के खिलाफ जो भी जाता है, वह हिंसा का शिकार होता है। पुरुषों को परिवार की प्रतिष्ठा को किसी भी कीमत पर बचाना होता है। उनकी नजर में ऑनर महिलाओं के चरित्र से ही जुड़ा है। ये घटनाएं परिवार की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर भी निर्भर करती हैं। इन मामलों में परिवार की बड़ी-बुजुर्ग महिलाओं का भी बहुत रोल होता है। उस अवस्था तक आते-आते उनका समाजीकरण भी बहुत हद तक पितृ सत्तात्मक हो जाता है। परिवार में इस तरह की घटना होने पर वह पुरुषों को उकसाने का काम करती हैं। जेंडर रेशियो नेगेटिव होने से ये घटनाएं बढ़ जाती हैं। - डॉ. अमरजीत, एसोसिएट प्रोफेसर, समाज शास्त्र विभाग, मेरठ कॉलेज
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