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चाइनीज मांझे में उलझकर जख्मी हुआ दुर्लभ गोबर गिद्ध
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 31 Jan 2018 12:47 AM IST
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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चाइनीज मांझा पक्षियों का दुश्मन बना हुआ है। मंगलवार को अपने शहर में एक बेहद दुर्लभ गोबर गिद्ध - इजिप्शियन, स्केविन्जर वल्चर चाइनीज मांझे की चपेट में आकर जख्मी हो गया। इसके बाद वो कैंट स्थित गुरु तेग बहादुर स्कूल में गिर गया। रात को बेहद दुर्लभ प्रजाति का गिद्ध मिलने की सूचना पर डीएफओ ने कर्मचारियों को भेजकर उसे कब्जे में लेकर कानपुर चिड़ियाघर भिजवाने को कहा है।
एनिमल केयर सोसायटी के अंशु माली वशिष्ठ ने बताया कि उनके पास जीटीबी स्कूल के प्रधानाचार्य का फोन आया था कि एक चील चाइनीज मांझे में उलझकर जख्मी होकर स्कूल में गिर गई है। अंशुमाली वशिष्ठ उस पक्षी को लेकर अपने घर आ गए। उन्होंने उस पक्षी के बारे में जानकारी की तो किसी ने बताया कि वो ईरानी पक्षी है। जो दुर्लभ गिद्ध बताया गया। इस गिद्ध को उन्होंने अंडे खिलाए और उसका उपचार शुरू कर दिया। अंशु माली का कहना था कि वे या तो उसे संजय वन में छोड़ देंगे या किसी को गोद दे देंगे ताकि उसकी जान बच सके। उधर, पूरे प्रकरण के बारे में रात को वन विभाग के अफसरों को जानकारी हुई तो डीएफओ अदिति शर्मा ने तुरंत कर्मचारियों को अंशुमाली के घर पर भेजा। डीएफओ ने बताया कि इस तरह का दुर्लभ पक्षी मिलने के बारे में वन विभाग को जानकारी देनी चाहिए थी। बता दें कि मेरठ में दर्जनों पक्षियों को फायर ब्रिगेड की टीम एक साल के भीतर चाइनीज मांझे की चपेट से निकाल चुकी है।
ये अकेले नहीं रहते, तुरंत भेजा जाना चाहिए कानपुर चिड़ियाघर
सीनियर ओनिथोलोजिस्ट रजत भार्गव का कहना है कि ये बेहद दुर्लभ पक्षी है। इसे गोबर गिद्ध या इजिप्शियन और स्केविन्जर वल्चर बोला जाता है। आठ प्रजाति के गिद्धों में से ये उन प्रजातियों में से है जो लुप्त हो रही हैं। ऐसे में इसको बचाने के लिए तुरंत कानपुर चिड़ियाघर में भेज देना चाहिए। रजत बताते हैं कि ये समूह में ही रहते हैं। ये लाशों के मज्जा व हड्डियों को खाते हैं। गिद्धों में कौन सी प्रजाति दिल, यकृत, बिसरा, दिमाग, आंखें खाएंगी, ये सब भी तय रहता है। गिद्धों को प्रकृति का सफाई कर्मी माना जाता है। इनका मेटाबॉलिक सिस्टम इस प्रकार से बना है कि ये आहार के हर हिस्से को पचा जाते हैं। एक्सपर्ट बताते हैं कि ये अंडे नहीं खाते बल्कि बड़ों गिद्धों का खाना छोड़े जाने के बाद हड्डियों से भोजन निकालते हैं। ऐसे में ये समूह में रहने के बाद ही खाना खा सकते हैं। अगर इसको जल्द ही कानपुर नहीं भेजा गया तो इसकी जान खतरे में पड़ जाएगी।
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एनिमल केयर सोसायटी के अंशु माली वशिष्ठ ने बताया कि उनके पास जीटीबी स्कूल के प्रधानाचार्य का फोन आया था कि एक चील चाइनीज मांझे में उलझकर जख्मी होकर स्कूल में गिर गई है। अंशुमाली वशिष्ठ उस पक्षी को लेकर अपने घर आ गए। उन्होंने उस पक्षी के बारे में जानकारी की तो किसी ने बताया कि वो ईरानी पक्षी है। जो दुर्लभ गिद्ध बताया गया। इस गिद्ध को उन्होंने अंडे खिलाए और उसका उपचार शुरू कर दिया। अंशु माली का कहना था कि वे या तो उसे संजय वन में छोड़ देंगे या किसी को गोद दे देंगे ताकि उसकी जान बच सके। उधर, पूरे प्रकरण के बारे में रात को वन विभाग के अफसरों को जानकारी हुई तो डीएफओ अदिति शर्मा ने तुरंत कर्मचारियों को अंशुमाली के घर पर भेजा। डीएफओ ने बताया कि इस तरह का दुर्लभ पक्षी मिलने के बारे में वन विभाग को जानकारी देनी चाहिए थी। बता दें कि मेरठ में दर्जनों पक्षियों को फायर ब्रिगेड की टीम एक साल के भीतर चाइनीज मांझे की चपेट से निकाल चुकी है।
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ये अकेले नहीं रहते, तुरंत भेजा जाना चाहिए कानपुर चिड़ियाघर
सीनियर ओनिथोलोजिस्ट रजत भार्गव का कहना है कि ये बेहद दुर्लभ पक्षी है। इसे गोबर गिद्ध या इजिप्शियन और स्केविन्जर वल्चर बोला जाता है। आठ प्रजाति के गिद्धों में से ये उन प्रजातियों में से है जो लुप्त हो रही हैं। ऐसे में इसको बचाने के लिए तुरंत कानपुर चिड़ियाघर में भेज देना चाहिए। रजत बताते हैं कि ये समूह में ही रहते हैं। ये लाशों के मज्जा व हड्डियों को खाते हैं। गिद्धों में कौन सी प्रजाति दिल, यकृत, बिसरा, दिमाग, आंखें खाएंगी, ये सब भी तय रहता है। गिद्धों को प्रकृति का सफाई कर्मी माना जाता है। इनका मेटाबॉलिक सिस्टम इस प्रकार से बना है कि ये आहार के हर हिस्से को पचा जाते हैं। एक्सपर्ट बताते हैं कि ये अंडे नहीं खाते बल्कि बड़ों गिद्धों का खाना छोड़े जाने के बाद हड्डियों से भोजन निकालते हैं। ऐसे में ये समूह में रहने के बाद ही खाना खा सकते हैं। अगर इसको जल्द ही कानपुर नहीं भेजा गया तो इसकी जान खतरे में पड़ जाएगी।
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