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खतरनाक स्मॉग बिगाड़ सकता है बच्चों का डीएनए, पढ़िए- अमर उजाला की ये खास रिपोर्ट

Fri, 01 Nov 2019 10:47 AM IST
कपिल kapil शालू अग्रवाल, अमर उजाला, मेरठ
शालू अग्रवाल, अमर उजाला, मेरठ Published by: कपिल kapil Updated Fri, 01 Nov 2019 10:47 AM IST
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Children's DNA may be spoiled from Smog, read this special report by Amar Ujala
मास्क लगाकर स्कूल जाते बच्चे - फोटो : अमर उजाला

वातावरण में फैली स्मॉग की चादर का सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव नौनिहालों पर है। स्मॉग के संपर्क में लंबे समय तक रहने के कारण बच्चों के फेफड़ों, दिमाग और तंत्रिका तंत्र पर सीधा असर पड़ रहा है। टीबी और सांस की बीमारी देने के साथ स्मॉग बच्चे की याददाश्त भी कमजोर कर सकता है। स्मॉग में घुले बेंजीन, सल्फर व पीएम 2.5 के महीन कणों के कारण बच्चों का डीएनए भी प्रभावित हो सकता है। 

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खेलने के दौरान तेजी से सांस लेने पर पीएम 2.5 के हानिकारक कण तेजी से बच्चे की श्वांस नलियों के जरिए फेफ़डों में पहुंचते हैं। चिकित्सकों का कहना है कि बच्चों की नाक में इन दूषित कणों को छानने वाले बालों की संख्या कम होने व बालों के कमजोर होने के कारण ये धुआं अपने साथ बेंजीन, सल्फर, कार्बन मोनोऑक्साइड सहित पीएम 2.5 के महीन कणों को फेफड़ों तक पहुंचा देता है। प्रदूषण के यही भारी कण लंबे समय तक फेफड़े में रहने और रक्त नलियों से चिपके रहने के कारण कैंसर बनाते हैं। डीएनए को भी प्रभावित कर सकते हैं। 
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पीएम 2.5 है बेहद घातक
धुंध में ज्यादा मात्रा पीएम 2.5 (पार्टिकुलेट मैटर) की है। पीएम 2.5 सिर के एक बाल से भी बारीक, हल्के और महीन कण होते हैं। प्रकाश कणों की तरह ही ये कण सामान्य आंखों से दिखाई नहीं देते, लेकिन शरीर पर इनका घातक असर होता है। पीएम 2.5 के ये महीन कण वातावरण में परत बनाकर सांस के माध्यम से शरीर के भीतर जाकर फेफड़ों में बैठ जाते हैं। साथ ही रक्त कोषिकाओं से चिपक जाते हैं। नाइट्रोजन, सल्फर, बेंजीन, क्रोमियम, निकिल, हानिकारक बैक्टीरिया, पटाखों से निकला केमिकल, कार्बन मोनोऑक्साइड, धातु के महीन कण व हानिकारक रसायन मिलकर पीएम 2.5 के कणों का निर्माण करते हैं। सबसे पहले 1952 में लंदन में स्मॉग देखा गया था।
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पटाखों के हानिकारक तत्वों से होती हैं गंभीर बीमारियां
- पोटैशियम क्लोरेट- तेज रोशनी देना : कैंसर का प्रमुख कारक
- सल्फर- आवाज व रोशनी देना : दमा व सांस की बीमारी
- एल्युमिनियम- रोशनी देना : तंत्रिका तंत्र में डिस्टर्बेंस, त्वचीय बीमारियां, अल्जाइमर
- कार्बन मोनोऑक्साइड : गर्भस्थ शिशु में सांस की बीमारी
- मर्करी- रोशनी देना : हाई बीपी, सांस की बीमारियां
- कॉपर- रोशनी देना : हार्मोनल डिस्टर्बेंस, अपंगता, बौनापन 

- पटाखा :        धुएं का उत्सर्जन
सांप पटाखा:   464 सिगरेट बराबर
1000 लड़ियों का चटाई बम: 277 सिगरेट
पुलपुल: 208 सिगरेट, फुलझड़ी: 74 सिगरेट
चकरी: 68 सिगरेट, अनार: 34 सिगरेट

- पटाखे द्वारा हवा में घोला गया पीएम 2.5
सांप पटाखा : 3 मिनट में 64,849 
चटाई बम 1000 लड़ी: 6 मिनट में 47,789
पुलपुल : 3 मिनट में 34,068
फुलझड़ी : 2 मिनट में 10,898
चकरी : 5 मिनट में 10,475

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बच्चों के डीएनए, दिमाग पर असर
स्मॉग में वीओसी (वॉल्टाइल आर्गेनिक कंपाउंड) होते हैं। जो बच्चों में पेट की परेशानी, बच्चे के व्यवहार में बदलाव, याददाश्त में कमजोरी और फेफड़ों पर असर डालते हैं। इससे बच्चों का डीएनए भी सल्फर व बेंजीन, क्रोमियम के कारण प्रभावित हो सकता है।  - डॉ. वीएन त्यागी, वरिष्ठ छाती एवं सास रोग विशेषज्ञ 

गल सकती हैं सांस की नलियां
बच्चों की सांस की नलियां बेहद नाजुक होती हैं। आएसपीएम, पीएम 2.5 के कण नाक के जरिए बच्चों के फेफड़ों की झिल्लियों तक पहुंचते हैं। झिल्ली से चिपके रहने के कारण अंदर ही अंदर ये कण सल्फ्यूरिक अम्ल बनाने लगते हैं। इससे बच्चों की सांस की नलियां गलने लगती हैं। - डॉ. राजीव तेवतिया, बाल एवं शिशु रोग विशेषज्ञ

बच्चों में कैंसर का खतरा
पीएम 2.5 के नन्हें कण सीधे सांस के जरिए शरीर में पहुंचते हैं। ये कण सेल्स से चिपककर खून में ऑक्सीजन के प्रवाह को बाधित करते हैं। इससे कैंसर का खतरा बढ़ता है। चूंकि बच्चों की नाक में बाल बेहद कम और कमजोर होते हैं, इसलिए उन पर स्मॉग का बड़ा खतरा है। - डॉ. उमंग मित्थल, कैंसर रोग विशेषज्ञ

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