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बिजनौर के नूरपुर में होने से बची थी चौरा-चौरी जैसी घटना, हजारों की भीड़ ने किया था थाने का घेराव

Fri, 05 Feb 2021 12:09 AM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Fri, 05 Feb 2021 12:09 AM IST
सार

- 16 अगस्त 1942 को हजारों की भीड़ ने नूरपुर थाने का किया था घेराव
- तिरंगा फहराने वाले लोगों पर पुलिस ने की थी फायरिंग, दो लोगों की हुई थी मौत

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Chauri Chaura like incident was avoided in Bijnor Noorpur
चौरी-चौरा कांड - file photo - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तर प्रदेश के बिजनौर आजादी के आंदोलन के दौरान नूरपुर में भी गोरखपुर के चौरी चौरा जैसी घटना होने से बची थी। 16 अगस्त 1942 को हजारों की भीड़ ने नूरपुर थाने का घेराव कर तिरंगा फहराने का प्रयास किया था। पुलिस ने भीड़ पर की फायरिंग कर दी थी, जिसमें दो क्रांतिकारियों की जान चली गई थी। घटना के बाद बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां की गईं थी। कई लोगों को जेल और सजा के साथ सामूहिक जुर्माना भी लगाया गया था।
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गांधी जी के असहयोग आंदोलन के दौरान गोरखपुर के चौरी चौरा कस्बे में भीड़ ने थाने पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया गया था। चार फरवरी 1922 को जब भीड़ थाने पहुंची तो पुलिस ने उसे रोकने के लिए फायरिंग कर दी थी। गोली लगने से कई प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी। बाद में उग्र भीड़ ने थाने में आग लगा दी थी।
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इसमें 23 पुलिसकर्मी जिंदा जल गए थे। इस घटना के बाद असहयोग आंदोलन को रोक दिया गया था। चौरी चौरा की घटना के लिए पुलिस ने काफी संख्या में लोगों को अभियुक्त बनाया। सेशन कोर्ट से 172 लोगों को फांसी की सजा हुई। बाद में हाईकोर्ट से 19 को फांसी मिली।
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चौरी चौरा की तरह 16 अगस्त 1942 को नूरपुर थाने पर प्रदर्शन किया गया था। पुलिस ने भीड़ को थाने में घुसने से रोकने के लिए फायरिंग कर दी थी। गोली लगने से गांव गुनियाखेड़ी निवासी परवीन सिंह और अस्करीपुर निवासी रिक्खी सिंह शहीद हो गए थे। इसके अलावा कई लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

पुलिस की गोली से दो लोगों की मौत के बाद भीड़ उग्र हो गई थी, लेकिन थाने पर हमला नहीं किया गया। थाने पर हमला न होने से चौरी चौरा जैसी घटना होने से बच गई थी। इस घटना के बाद पुलिस ने काफी लोगों के विरुद्ध गंभीर धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की थी। करीब 32 लोग गिरफ्तार किए गए।

छह हजार रुपये सामूहिक जुर्माना लगाया गया था। गिरफ्तार लोगों को लोअर कोर्ट से छह-छह वर्ष की सजा मिली। अपील के बाद सेशन कोर्ट से 16 व्यक्ति छूट गए शेष को दो-दो वर्ष की सजा हुई। फैसले के विरुद्ध हाईकोर्ट में अपील की गई। इसके बाद अप्रैल 1944 में सभी की रिहाई हुई। 

इनके विरुद्ध हुई थी रिपोर्ट दर्ज
नूरपुर थाने के रिकॉर्ड के मुताबिक इस मामले में नूरपुर निवासी राजकुमार, कृपाशंकर, उमराव सिंह, कल्लन, नौबहार सिंह, नियादर, बुद्धु, चंदन सिंह, होरी, बहाव, रामस्वरूप, पतराम सिंह, जसराम सिंह, मल्लु, नारायण, किशोरी, चंद्रपाल, गणेशी, बलदेव सिंह, प्रताप सिंह के अलावा चांदपुर निवासी क्षेत्रपाल सिंह, कल्लू चौहान, मूला सिंह व लल्लू उर्फ कल्लू के नाम प्रकाश में आए थे, जिन्हें मुकदमे में शामिल किया गया था।

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