{"_id":"6a1b4ccd0a21c804c90eeb7e","slug":"change-in-society-is-possible-through-practical-changes-meerut-news-c-72-1-mct1014-154055-2026-05-31","type":"story","status":"publish","title_hn":"Meerut News: व्यावहारिक बदलावों से समाज में परिवर्तन संभव","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Meerut News: व्यावहारिक बदलावों से समाज में परिवर्तन संभव
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मेरठ। सुभारती विश्वविद्यालय के कला एवं सामाजिक विज्ञान संकाय के भाषा विभाग ने एक अतिथि व्याख्यान आयोजित किया। यह व्याख्यान जेंडर सेंसिटाइजेशन सेल एवं वूमेन एम्पावरमेंट सेल के संयुक्त तत्वावधान में हुआ। इसका विषय मृदु कौशल विकास के माध्यम से जेंडर संवेदनशील स्थान था।
कार्यक्रम भाषा विभाग की मानव संसाधन प्रयोगशाला में आयोजित किया गया। इसमें विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। भाषा विभागाध्यक्ष डॉ. सीमा शर्मा के निर्देशन में यह कार्यक्रम संपन्न हुआ। मुख्य वक्ता डॉ. साहनी ने जेंडर संवेदनशीलता के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि मृदु कौशल सुरक्षित और समावेशी वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण हैं। यह शिक्षण संस्थानों, कार्यस्थलों और सामाजिक परिवेश के लिए आवश्यक है। डॉ. साहनी ने विद्यार्थियों को समावेशी भाषा, सहानुभूति और सकारात्मक संवाद का महत्व समझाया। उन्होंने सक्रिय श्रवण तथा व्यावहारिक संवेदनशीलता जैसे गुणों को उदाहरणों से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे व्यावहारिक बदलावों से समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव है। कार्यक्रम में समावेशी संवाद वृत्त जैसी गतिविधियां आयोजित करने का प्रस्ताव भी रखा गया।
विज्ञापन
विज्ञापन
कार्यक्रम भाषा विभाग की मानव संसाधन प्रयोगशाला में आयोजित किया गया। इसमें विद्यार्थियों, शोधार्थियों और शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। भाषा विभागाध्यक्ष डॉ. सीमा शर्मा के निर्देशन में यह कार्यक्रम संपन्न हुआ। मुख्य वक्ता डॉ. साहनी ने जेंडर संवेदनशीलता के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।
विज्ञापन
उन्होंने बताया कि मृदु कौशल सुरक्षित और समावेशी वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण हैं। यह शिक्षण संस्थानों, कार्यस्थलों और सामाजिक परिवेश के लिए आवश्यक है। डॉ. साहनी ने विद्यार्थियों को समावेशी भाषा, सहानुभूति और सकारात्मक संवाद का महत्व समझाया। उन्होंने सक्रिय श्रवण तथा व्यावहारिक संवेदनशीलता जैसे गुणों को उदाहरणों से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे व्यावहारिक बदलावों से समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव है। कार्यक्रम में समावेशी संवाद वृत्त जैसी गतिविधियां आयोजित करने का प्रस्ताव भी रखा गया।
विज्ञापन