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चंद्रशेखर की मौलाना अरशद मदनी से मुलाकात है कई मायनों में खास, रुख बदलने को तैयार गैर सियासी लोग

Wed, 19 Sep 2018 09:52 AM IST
एम. रियाज़ हाशमी, अमर उजाला, मेरठ
एम. रियाज़ हाशमी, अमर उजाला, मेरठ Updated Wed, 19 Sep 2018 09:52 AM IST
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Chandrasekhar chief of bhim army meeting with Maulana Arshad Madanimeans a lot here is how
चंदशेखर व मौलाना अरशद मदनी - फोटो : अमर उजाला
भीम आर्मी  के संस्थापक चंद्रशेखर भले ही जेल के बाद ‘रावण’ उपनाम से ‘आजाद’ हो गए, लेकिन वह अभी सियासी दायरों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। भाजपा विरोधी नेता उनसे सीधे और गैर राजनीतिक लोगों के जरिए मिल रहे हैं और उनकी 'किंगमेकर' बनने की महत्वाकांक्षा का लोकसभा चुनाव में फायदा उठाना चाहते हैं। जानें आखिर कैसे लोकसभा चुनाव 2019 का रुख बदलने को तैयार हैं  गैर सियासी लोग:-
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उनके सामने बड़ी चुनौती यही है कि वे खुद को बुलंदी पर कैसे स्थापित रखें? मंगलवार को उनकी जमीयत उलेमा हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी से देवबंद में बीस मिनट की मुलाकात को सियासत से अलग करके नहीं देखा जा सकता है। क्योंकि यह भावी राजनीति को प्रभावित करने वाली है।सपा के एमएलसी आशु मलिक एक दिन पहले चंद्रशेखर से मिले थे। वे मौलाना अरशद की कृपा से ही अखिलेश मंत्रिमंडल में आए थे। राम मंदिर आंदोलन के नायक कल्याण सिंह की तब सपा में एंट्री के बाद वही मुलायम सिंह यादव और देवबंदी उलेमा के बीच मध्यस्थ बने थे। अब वे सिर्फ एमएलसी हैं और सपा में हाशिए पर लेकिन सहारनपुर से चुनावी दावेदार हैं। इधर जमीयत मौलाना अरशद और मौलाना महमूद मदनी के बीच बंटी है। अरशद सपा तो महमूद कांग्रेस की विचारधारा से प्रेरित हैं। 

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Chandrasekhar chief of bhim army meeting with Maulana Arshad Madanimeans a lot here is how
चंद्रशेख लोगों से मुलाकात करते हुए - फोटो : अमर उजाला

जेल से छूटकर चंद्रशेखर ने कांग्रेस के पूर्व विधायक इमरान मसूद के लिए हर कुर्बानी देने की बात कही तो आशु की सक्रियता पर कोई ताज्जुब नहीं होना चाहिए। इनके और इमरान के बीच सियासी प्रतिद्वंद्विता भी है। भले ही कहा जाए कि चंद्रशेखर सिर्फ मौलाना अरशद से आशीर्वाद लेने गए थे लेकिन गैर सियासी भीम आर्मी दलित-मुस्लिम के सहारे भाजपा विरोधी दलों के लिए राजनीति को प्रभावित करने की तैयारी में है। 
एक सशक्त गैर राजनीतिक मंच बनाने की बात भी सामने आ रही है। जमीयत और भीम आर्मी जल्द ही दिल्ली के जंतर मंतर पर अपनी ताकत भी दिखाएंगे। यह मुलाकात इसी रणनीति का हिस्सा हो सकती है। दो दिन पहले ही चंद्रशेखर से जेएनयू के छात्र नेता उमर खालिद ने मुलाकात की थी और एक-दो दिन में गुजरात से विधायक जिग्नेश मेवाणी भी मुलाकात कर सकते हैं। 

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चंद्रशेखर भी कह चुके हैं कि वह भाजपा के खिलाफ संभावित महागठबंधन को सपोर्ट करेंगे, लेकिन कांग्रेस की खामोशी और बसपा सुप्रीमो मायावती का मुखर अंदाज इस बंधन की गांठ खोल रहा है। ऐसे में भाजपा विरोधी स्थानीय क्षत्रप और दावेदारों का चंद्रशेखर के प्रति झुकाव स्वाभाविक सा है। यही  गतिविधियां चंद्रशेखर की महत्वाकांक्षा को बढ़ा रही हैं। यह सही है कि बसपा और कांग्रेस के गढ़ सहारनपुर में भीम आर्मी को घटाकर सियासी दल गिनती में नहीं रह सकते, लेकिन यह सवाल भी है कि क्या चंद्रशेखर ‘किंगमेकर’ के बजाए सियासी हथियार बनने से खुद को बचा पाएंगे? 

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