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व्यवस्थाएं बेहाल : मेरठ में तीन करोड़ से बिल्डिंग बनाकर टांगी तख्ती, मरीजों को नहीं मिला इलाज

Mon, 28 Feb 2022 11:54 AM IST
Dimple Sirohi अरीश रिजवी, अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ
अरीश रिजवी, अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Mon, 28 Feb 2022 11:54 AM IST
सार

मेरठ शहर का हेल्थ सिस्टम वेंटिलेटर पर है। मेडिकल कॉलेज में तीन करोड़ रुपये से बनी बर्न यूनिट पर 5 माह से ताला है। दवा प्रयोगशाला है पर जांच नहीं होती। जिला अस्पताल में ढाई साल से एमआरआई यूनिट की तख्ती तो टंगी है पर मशीन नहीं है।

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Building built with three crores but patients did not get treatment In Meerut
meerut medical - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सावधान। आप कैमरे की नजर में हैं। आपने कई ऐसी जगह इस तरह की तख्तियां लगी देखी होंगी जहां वास्तव में कोई कैमरा नहीं होता। आजकल कुछ ऐसे ही काम स्वास्थ्य विभाग कर रहा है। मेडिकल कॉलेज में एक शानदार बिल्डिंग पर बर्न यूनिट की तख्ती लगी है पर अंदर न कोई मशीन है और न ही स्टाफ।  

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मेरठ में बर्न यूनिट की मांग दशकों पुरानी है। विक्टोरिया पार्क में 2006 में हुए भीषण अग्निकांड में 68 लोगों की मौत हो गई थी। तब अगर बर्न यूनिट होती तो शायद बहुत से लोगों की जाच बच जाती। डेढ़ दशक बाद भी स्वास्थ्य विभाग वहीं खड़ा है। मेडिकल कॉलेज में करीब पांच महीने पहले तीन करोड़ की लागत से बर्न यूनिट की बिल्डिंग बनी, मगर गंभीर रूप से जले हुए मरीजों को इलाज के लिए अभी भी दिल्ली रेफर करना पड़ रहा है।
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यहां न उपकरण आए हैं और न स्टाफ मिला है। इस बर्न यूनिट में 5 बेड की आईसीयू है। 20 बेड का जनरल वार्ड तैयार किया गया है। सर्जन और अन्य स्टाफ भी आना है। मेडिकल में सामान्य तौर पर हर माह 30 से 35 मरीज जले हुए आते हैं। कम जले मरीजों को तो भर्ती कर लिया जाता है, लेकिन 14 से 15 मरीज ऐसे भी आते हैं जिन्हें रेफर करना पड़ता है। सालभर में 150 से 200 गंभीर मरीजों को रेफर करना पड़ता है। 
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ढाई साल में न मशीन आई न स्टाफ  
जिला अस्पताल में करीब 25 लाख रुपये खर्च कर एक बिल्डिंग पर एमआरआई यूनिट की तख्ती टांग दी गई। करीब ढाई साल बाद भी यहां न तो एमआरआई करने वाली की मशीन है और स्टाफ। मरीजों को मेगनेटिक रेसोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) के लिए या तो मेडिकल कॉलेज जाना पड़ता है या फिर निजी लैब में महंगी जांच कराने को मजबूर हैं। निजी लैब में एक एमआरआई के लिए तीन से 25 हजार तक खर्च आता है। 

चल रहा है पत्र व्यवहार 
चिकित्सा अधीक्षक डॉ. कौशलेंद्र सिंह का कहना है कि इस बाबत शासन को अवगत कराया जा चुका है। पत्र व्यवहार चल रहा है। शासन को निर्णय लेना है कि मशीन और स्टाफ कब आएगा। 

दवा प्रयोगशाला में 27 महीने बाद भी जांच नहीं 
मेडिकल कॉलेज स्थित खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विंग में करीब 27 महीने से दवाओं की जांच के लिए बनी प्रयोगशाला की बिल्डिंग तैयार है। बाहर ताला है और अंदर इसमें न तो उपकरण हैं और न ही स्टाफ।

16 नवंबर 2019 को तत्कालीन राज्यमंत्री डॉ. धर्म सिंह सैनी ने इसका लोकार्पण किया था। तब दावा किया गया था कि जल्द ही दवाओं की जांच शुरू हो जाएगी। यहां से दवाओं के सैंपल लखनऊ जाते हैं, जहां से रिपोर्ट आने में कई महीने लग जाते हैं। दवा के 100 से ज्यादा नमूनों की रिपोर्ट महीनों से अटकी है।

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