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सफलता के नए आयाम: मेरठ से धधकी क्रांति की ज्वाला से झुलस गई थी ब्रिटिश हुकूमत, इतिहास में दर्ज हो गई 10 मई 

Sun, 24 Apr 2022 05:19 PM IST
Dimple Sirohi राजदीप जाखड़, अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ
राजदीप जाखड़, अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ Published by: Dimple Sirohi Updated Sun, 24 Apr 2022 05:19 PM IST
सार

25 मार्च का दिन इतिहास में अहं महत्व रखता है। इस दिन मंगल पांडे ने अंग्रेजों के खिलाफ बैरकपुर छावनी में बगावत कर दी थी। मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी में चर्बी वाले कारतूसों को लेकर अंग्रेज अफसरों के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। इसके बाद मेरठ में तीसरी इंफेंट्री के 85 सिपाहियों ने भी बगावत शुरू कर दी थी। 

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British rule was scorched by the flames of revolution blazing from Meerut, 10 May was recorded in history
1857 की क्रांति (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

10 मई 1857 को क्रांति की तारीख माना जाता है। क्रांति की इस तारीख की नींव 25 मार्च को ही पड़ गई थी। जब मंगल पांडे ने बैरकपुर छावनी में चर्बी वाले कारतूसों को लेकर अंग्रेज अफसरों के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। इसके बाद मेरठ में तीसरी इंफेंट्री के 85 सिपाहियों ने भी बगावत शुरू कर दी थी। 
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8 अप्रैल को मंगल पांडे को फांसी पर चढ़ा दिया गया था। इससे भारतीय सिपाहियों में अंग्रेजों के खिलाफ नफरत और बढ़ गई थी। सिपाहियों के साथ देशवासियों में क्रांति की खातिर रोटी-कमल का संदेश गांव-गांव जाने लगा था। अंदर ही अंदर चिंगारी सुलग रही थी। तभी बड़ी चूक मेरठ में अंग्रेज अफसरों ने कर दी। इसके बाद क्रांति की माटी से आजादी का सुनहरा सपना दिखाने वाली ज्वाला जल उठी। 
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मेरठ छावनी में घटित हुआ घटनाक्रम 
23 अप्रैल 1857

मेरठ छावनी में भारतीय पलटन की तीसरी अश्वारोही सेना के कमांडर ने अगली सुबह सिपाहियों को परेड ग्राउंड में पहुंचने का निर्देश दिया, जहां उन्हें चर्बी वाली एक विशेष गोली को चलाने का प्रशिक्षण दिया जाएगा। उसी रात सिपाहियों ने गंगाजल और कुरान हाथ में लेकर शपथ ली कि वे चर्बी वाली गोली का विरोध करेंगे। 
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24 अप्रैल 1857 
परेड ग्राउंड में पहुंचे 90 में से 85 सिपाहियों ने नई गोली के इस्तेमाल का विरोध कर दिया। इसके बाद इन सभी के लिए 25, 26 और 27 अप्रैल को जांच बैठा दी गई और तय हुआ कि विद्रोही सिपाहियों का कोर्ट मार्शल किया जाएगा।

30 अप्रैल से 7 मई 1857
इस बीच मेरठ के कई हिस्सों में छोटी-मोटी आग लगने की घटनाएं हुई। कई सरकारी दफ्तरों के छप्पर जला दिए गए। अंग्रेज इसकी वजह गर्मी मानते रहे, जबकि यह क्रांति का एक बड़ा संकेत था। 

6 से 8 मई 1857
कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया चली। 80 सिपाहियों को 10 साल, जबकि 5 सिपाहियों को पांच साल की सजा सुनाई गई। 9 मई परेड ग्राउंड में सभी सिपाहियों को इकट्ठा करके पहले तो उनसे असलहा छीने गए और फिर वर्दी उतरवाई गई। सभी को जंजीरों में जकड़कर जेल भेज दिया गया। बाजार में उन पर लोगों और नगरवधुओं के ताने पड़े तो उनका खून भी खौल उठा। 

इतिहास में दर्ज हो गई 10 मई 
रविवार का दिन था, अंग्रेज छुट्टी के मूड में थे। कोई बाजार में खरीदारी कर रहा था तो कोई चर्च में प्रार्थना करने गया था। तभी शाम करीब 5:30 बजे सदर बाजार से क्रांति की ज्वाला धधक उठी। पैदल सेना के परेड ग्राउंड में फायरिंग शुरू हो गई। अंग्रेज अफसरों को निशाना बनाया गया। 6:15 बजे तक दोनों जेल तोड़ दी गई।

भारतीय सिपाही विद्रोह कर चुके थे। अगले दो घंटे में छावनी इलाका जल उठा। शाम 7:30 बजे के आसपास ये सभी रिठानी गांव के निकट इकट्ठा हुए और दिल्ली कूच कर गए। अगले दिन सुबह ये नावों के बने पुल को पार कर यमुना किनारे लाल किला की प्राचीर तक पहुंचे। इधर रात के हमलों से संभलकर ब्रिटिश सैनिकों ने भी दिल्ली कूच किया, लेकिन तब तक क्रांति की ज्वाला धधक चुकी थी।

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