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Meerut News: सिंदूर खेला में बंगाली परंपरा नारी शक्ति का संगम
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...नम आंखों से मां दुर्गा को दी गई विदाई
.... 220वें दुर्गा पूजा महोत्सव में महिलाओं ने निभाई परंपरा
माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ।
बंगाली दुर्गाबाड़ी समिति में बुधवार को 220 वें दुर्गा पूजा महोत्सव के अंतर्गत विजयादशमी पर पारंपरिक सिंदूर खेला का आयोजन श्रद्धा और उल्लास के साथ किया गया। महिलाओं ने मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर सुख, सौभाग्य, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन की मंगलकामना की।
लाल-सफेद पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाओं ने सिंदूर खेला की रस्म निभाई। सिंदूर के लाल रंग और मां दुर्गा के जयकारों से दुर्गाबाड़ी परिसर उत्सवमय हो उठा। बंगाली समाज की इस विशेष परंपरा में महिलाओं का आपसी स्नेह, एकजुटता और मां के प्रति अटूट आस्था दिखाई दी। वहीं, मां दुर्गा की विदाई की घड़ी आते ही माहौल भावुक हो गया।
समिति के अध्यक्ष अमिताभ मुखर्जी ने कहा कि सिंदूर खेला बंगाली संस्कृति की अनमोल परंपरा है। यह महिलाओं के स्नेह, शक्ति, विश्वास और पारिवारिक एकजुटता को दर्शाती है। महासचिव अभय मुखर्जी ने कहा कि 220 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा बंगाली समाज की सामूहिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। उन्होंने आयोजन में सहयोग देने वाली महिलाओं, श्रद्धालुओं, स्वयंसेवकों और समिति के सदस्यों का आभार जताया।
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पूजा सचिव सुब्रोतो विश्वास ने सभी श्रद्धालुओं को विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए मां दुर्गा से सभी परिवारों के सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना की।
सिंदूर खेला के बाद मां दुर्गा की शोभायात्रा और विदाई के दौरान श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। महिलाओं ने मां को सिंदूर अर्पित कर अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना की। पूरा परिसर आश्छे बोछोर आबार होबे यानी मां, अगले वर्ष फिर आना के भाव से गूंज उठा। 220 वर्षों की आस्था और परंपरा को समेटे यह आयोजन बंगाली संस्कृति की जीवंत विरासत का प्रतीक बना।
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.... 220वें दुर्गा पूजा महोत्सव में महिलाओं ने निभाई परंपरा
माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ।
बंगाली दुर्गाबाड़ी समिति में बुधवार को 220 वें दुर्गा पूजा महोत्सव के अंतर्गत विजयादशमी पर पारंपरिक सिंदूर खेला का आयोजन श्रद्धा और उल्लास के साथ किया गया। महिलाओं ने मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर सुख, सौभाग्य, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की। इसके बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन की मंगलकामना की।
लाल-सफेद पारंपरिक परिधानों में सजी महिलाओं ने सिंदूर खेला की रस्म निभाई। सिंदूर के लाल रंग और मां दुर्गा के जयकारों से दुर्गाबाड़ी परिसर उत्सवमय हो उठा। बंगाली समाज की इस विशेष परंपरा में महिलाओं का आपसी स्नेह, एकजुटता और मां के प्रति अटूट आस्था दिखाई दी। वहीं, मां दुर्गा की विदाई की घड़ी आते ही माहौल भावुक हो गया।
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समिति के अध्यक्ष अमिताभ मुखर्जी ने कहा कि सिंदूर खेला बंगाली संस्कृति की अनमोल परंपरा है। यह महिलाओं के स्नेह, शक्ति, विश्वास और पारिवारिक एकजुटता को दर्शाती है। महासचिव अभय मुखर्जी ने कहा कि 220 वर्षों से चली आ रही यह परंपरा बंगाली समाज की सामूहिक पहचान और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। उन्होंने आयोजन में सहयोग देने वाली महिलाओं, श्रद्धालुओं, स्वयंसेवकों और समिति के सदस्यों का आभार जताया।
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पूजा सचिव सुब्रोतो विश्वास ने सभी श्रद्धालुओं को विजयादशमी की शुभकामनाएं देते हुए मां दुर्गा से सभी परिवारों के सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना की।
सिंदूर खेला के बाद मां दुर्गा की शोभायात्रा और विदाई के दौरान श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। महिलाओं ने मां को सिंदूर अर्पित कर अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना की। पूरा परिसर आश्छे बोछोर आबार होबे यानी मां, अगले वर्ष फिर आना के भाव से गूंज उठा। 220 वर्षों की आस्था और परंपरा को समेटे यह आयोजन बंगाली संस्कृति की जीवंत विरासत का प्रतीक बना।