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Meerut News: बापू का सपना टूटा...कोरोना निगल गया गांधी आश्रम
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बापू का सपना टूटा...कोरोना निगल गया गांधी आश्रम
छुटमलपुर के गांधी आश्रम में होता था पॉलिएस्टर उत्पादन, अब सूत की कताई भी बंद
कपड़े की बुनाई करने वाली दस खड्डियां बंद होने पर बन गई हैं मकड़ी का आशियाना
राजेन्द्र मौर्य
सहारनपुर। देश में महात्मा गांधी ने आजादी के आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ अहम भूमिका निभाने वाले गांधी आश्रम वीरान खंडहर बन गए हैं। जहां न तो खादी का उत्पादन हो रहा है और न ही अन्य कोई दूसरे उत्पाद बनाए जा रहे हैं। सहारनपुर जनपद के छुटमलपुर के गांधी आश्रम में कभी पॉलिएस्टर का उत्पादन भी होता था लेकिन इसे भी कोरोना काल निगल गया और इसमें अब सूत की कताई तक भी बंद हो गई।
छुटमलपुर में आजादी के बाद गांधी आश्रम उत्पादन केंद्र की स्थापना हुई थी। उस वक्त रुई से सूत कताई होती थी और फिर सूत से कपड़ा बुना जाता था। बेहट, मंगलौर, रुड़की तक के बुनकर यहां से रुई, सूत ले जाकर खड्डी पर कपड़ा बुनते थे। कपड़ा बुनने का मेहनताना गांधी आश्रम की तरफ से मिलता था। बुना हुआ कपड़ा गांधी आश्रम के केंद्रों पर बिकता था। 90 के दशक में गांधी आश्रम ने फतेहपुर भादो में दस खड्डी लगाकर सूत की बुनाई शुरू कराई थी। उस वक्त यहां पर पॉलिएस्टर का कपड़ा भी बनता था। रात-दिन कारीगर काम करते थे। वर्ष 2000 आते-आते यह काम धीरे-धीरे बंद हो गया। इसके बाद यहां बनी इमारत भी खंडहर में तब्दील हो गई। इनमें बंद खड्डियों में मकड़ी के जालों और धूल के गुबार चढ़ गए।
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गांधी आश्रम के इंचार्ज शिव कुमार बताते हैं कि कोरोना काल से पहले तक केंद्र के लिए 12-14 कत्तिन काम करते थे। अब यहां तीन साल से उत्पादन बिल्कुल बंद है। बिक्री केंद्र में भी कच्चा माल कम होने तथा नई जेनरेशन द्वारा दरी, खेस, लिहाफ की जगह सिंथेटिक फाइबर या डाउन फेदर के कंबल पसंद करने के चलते इन उत्पादों की बिक्री भी काफी घट गई है।
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कभी रात-रात भर बुनते थे कपड़ा
बुनकरों के जिम्मेदार और गांव नानका के प्रधान रहे शमीम अंसारी बताते हैं कि कभी उनके गांव में घर-घर खड्डियां थीं। आधी रात तक लोग कपड़ा बुनते थे। दिन में इसे फेरी लगाकर बेचा जाता था, लेकिन बिक्री कम होने से एक अरसा पहले ही एक-एक करके सभी ने यह काम बंद कर दिया।
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प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पा रहे गांधी आश्रम के महंगे उत्पाद
गांधी आश्रम के जिला प्रबंधक (उत्पत्ति) अशोक कुमार कुशवाह बताते हैं कि उन्हें रुई भी खादी ग्रामोद्योग बोर्ड से खरीदनी पड़ती है, जो अपेक्षाकृत बाजार से महंगी मिलती है। उनके यहां का उत्पाद लेबर और सूत लगाकर मिल के उत्पाद से तीन गुना तक महंगा पड़ता है। ऐसे में लोग मिल के सस्ते उत्पाद को खरीदना पसंद करते हैं। वह कहते हैं कि दरी, दुतई, खेस और रजाई की बिक्री घटकर बीस प्रतिशत तक रह गई है।
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कुम्हारीकला उद्योग में बनती थी खपरैल
सन 1993 तक गांधी आश्रम के अधीन ही कुम्हारी कला उद्योग भी यहां सक्रिय रहा। इसमें मिट्टी के गमले और छत पर डालने वाली खपरैल बनती थी। समय के साथ खपरैल की उपयोगिता कम होती गई और गमलों के निर्माण का काम भी यहां बंद कर दिया गया। हालांकि इस उद्योग के अवशेषों के रूप में यहां भट्टी की चिमनी आज भी मौजूद है।
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छुटमलपुर के गांधी आश्रम में होता था पॉलिएस्टर उत्पादन, अब सूत की कताई भी बंद
कपड़े की बुनाई करने वाली दस खड्डियां बंद होने पर बन गई हैं मकड़ी का आशियाना
राजेन्द्र मौर्य
सहारनपुर। देश में महात्मा गांधी ने आजादी के आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ अहम भूमिका निभाने वाले गांधी आश्रम वीरान खंडहर बन गए हैं। जहां न तो खादी का उत्पादन हो रहा है और न ही अन्य कोई दूसरे उत्पाद बनाए जा रहे हैं। सहारनपुर जनपद के छुटमलपुर के गांधी आश्रम में कभी पॉलिएस्टर का उत्पादन भी होता था लेकिन इसे भी कोरोना काल निगल गया और इसमें अब सूत की कताई तक भी बंद हो गई।
छुटमलपुर में आजादी के बाद गांधी आश्रम उत्पादन केंद्र की स्थापना हुई थी। उस वक्त रुई से सूत कताई होती थी और फिर सूत से कपड़ा बुना जाता था। बेहट, मंगलौर, रुड़की तक के बुनकर यहां से रुई, सूत ले जाकर खड्डी पर कपड़ा बुनते थे। कपड़ा बुनने का मेहनताना गांधी आश्रम की तरफ से मिलता था। बुना हुआ कपड़ा गांधी आश्रम के केंद्रों पर बिकता था। 90 के दशक में गांधी आश्रम ने फतेहपुर भादो में दस खड्डी लगाकर सूत की बुनाई शुरू कराई थी। उस वक्त यहां पर पॉलिएस्टर का कपड़ा भी बनता था। रात-दिन कारीगर काम करते थे। वर्ष 2000 आते-आते यह काम धीरे-धीरे बंद हो गया। इसके बाद यहां बनी इमारत भी खंडहर में तब्दील हो गई। इनमें बंद खड्डियों में मकड़ी के जालों और धूल के गुबार चढ़ गए।
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गांधी आश्रम के इंचार्ज शिव कुमार बताते हैं कि कोरोना काल से पहले तक केंद्र के लिए 12-14 कत्तिन काम करते थे। अब यहां तीन साल से उत्पादन बिल्कुल बंद है। बिक्री केंद्र में भी कच्चा माल कम होने तथा नई जेनरेशन द्वारा दरी, खेस, लिहाफ की जगह सिंथेटिक फाइबर या डाउन फेदर के कंबल पसंद करने के चलते इन उत्पादों की बिक्री भी काफी घट गई है।
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कभी रात-रात भर बुनते थे कपड़ा
बुनकरों के जिम्मेदार और गांव नानका के प्रधान रहे शमीम अंसारी बताते हैं कि कभी उनके गांव में घर-घर खड्डियां थीं। आधी रात तक लोग कपड़ा बुनते थे। दिन में इसे फेरी लगाकर बेचा जाता था, लेकिन बिक्री कम होने से एक अरसा पहले ही एक-एक करके सभी ने यह काम बंद कर दिया।
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प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पा रहे गांधी आश्रम के महंगे उत्पाद
गांधी आश्रम के जिला प्रबंधक (उत्पत्ति) अशोक कुमार कुशवाह बताते हैं कि उन्हें रुई भी खादी ग्रामोद्योग बोर्ड से खरीदनी पड़ती है, जो अपेक्षाकृत बाजार से महंगी मिलती है। उनके यहां का उत्पाद लेबर और सूत लगाकर मिल के उत्पाद से तीन गुना तक महंगा पड़ता है। ऐसे में लोग मिल के सस्ते उत्पाद को खरीदना पसंद करते हैं। वह कहते हैं कि दरी, दुतई, खेस और रजाई की बिक्री घटकर बीस प्रतिशत तक रह गई है।
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कुम्हारीकला उद्योग में बनती थी खपरैल
सन 1993 तक गांधी आश्रम के अधीन ही कुम्हारी कला उद्योग भी यहां सक्रिय रहा। इसमें मिट्टी के गमले और छत पर डालने वाली खपरैल बनती थी। समय के साथ खपरैल की उपयोगिता कम होती गई और गमलों के निर्माण का काम भी यहां बंद कर दिया गया। हालांकि इस उद्योग के अवशेषों के रूप में यहां भट्टी की चिमनी आज भी मौजूद है।