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बाबू हुकुम सिंह से जुड़ी यादें नहीं भूल पाएंगे साथी, एक क्लिक में पढ़ें पूरी खबर

Mon, 05 Feb 2018 06:46 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, जगेंद्र उज्ज्वल, मुजफ्फरनगर
यूपी डेस्क, अमर उजाला, जगेंद्र उज्ज्वल, मुजफ्फरनगर Updated Mon, 05 Feb 2018 06:46 PM IST
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Babu Hukum Singh will not forget memories associated with him, read the full news in one click
बाबू हुकुम सिंह का फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला

बाबू हुकुम सिंह जनता के बीच जितने धीर और गंभीर रहते थे, विधानसभा और संसद में उतने ही मुखर वक्ता रहे। चाहे मुद्दा किसान हितों का हो या फिर जन समस्याओं से जुड़ा हुआ, उनकी बातें सुनी जाती थी। प्रदेश के शीर्ष राजनीतिज्ञ हुकुम सिंह के जीवन से जुड़े संस्मरण उनके विराट व्यक्तित्व और सियासी कद का अहसास कराते हैं। 

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पूर्व एडीजीसी रविंद्र सिंह बताते हैं कि वर्ष 1979 में जीआईसी के मैदान में तत्कालीन पीएम चौधरी चरण सिंह की जनसभा थी। कैराना सांसद चंदन सिंह दीर्घा में हुकुम सिंह के साथ बैठे थे, वहीं पहली बार बड़े चौधरी ने उनसे मिलवाया। स्नेह बढ़ा और कैराना से गायत्री चौधरी को लोकसभा चुनाव जीताने में बाबूजी ने कड़ी मेहनत की। वर्ष 1980 में वे लोकदल प्रत्याशी बने और कैराना से एमएलए का चुनाव जीते। कई मर्तबा उनके साथ विधानसभा की कार्यवाही देखने का मौका मिला। बकौल रविंद्र सिंह, गंभीर प्रवृत्ति के बाबूजी असेंबली में अपनी बातों के बीच हास्य व्यंग्य से भी नहीं चूकते थे। सीएम वीपी सिंह विधानसभा में कम ही आते थे। किसी एमएलए की मृत्यु पर कंडोलेंस में ही सीएम शामिल होते थे। विधानसभा में हुकुम सिंह के बोलते वक्त मुख्यमंत्री हाउस में पधारे, उन्हें देख बाबूजी ने कटाक्ष किया, ऐसा लगता है कि किसी सदस्य का निधन हो गया है। वीपी सिंह भांप गए और उन्होंने वादा किया कि अब वह विधानसभा सत्र में अधिक वक्त देंगे। एक बार सदन में अपनी बात रख रहे छोटे कद के मंत्री महावीर प्रसाद को देख बाबूजी ने कहा कि प्रसाद जी उठ कर अपनी बात कहे। व्यंग्य को समझे मंत्री ने कहा कि हुकुम सिंह जी यदि आप बैठ जाएंगे तो पीछे वाले सदस्यों को हम दिख जाएंगे। 
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जिला सहकारी बैंक में पूर्व अध्यक्ष और उनके अभिन्न मित्र कुंज बिहारी अग्रवाल बताते हैं कि 70 के दशक से बाबूजी के जीवन को देखा। सादगी के प्रतीक हुकुम सिंह का संसदीय कार्यवाही के साथ हर विधा में उनका ज्ञान उच्च था। देसी गाय को दूध पीना, चक्की का पीसा खाना, बागवानी और योगाभ्यास करना उनकी दिनचर्या था। चाहे गांधी कालोनी का आवास हो या फिर कैराना की कलस्यान चौपाल, हर पीड़ित का दर्द मन से सुनते थे और उनकी समस्या का हल कराते। अग्रवाल कहते हैं कि एक अगस्त 2010 की सुबह 4.45 बजे उनका लखनऊ से फोन आया कि घर पर कोई कॉल रिसीव नहीं कर रहा है। अनहोनी की आशंका में डॉ एमके बंसल के साथ सबसे पहले उनके आवास पर पहुंचा था। नौकरों ने ही उनकी पत्नी की हत्या कर दी थी। पत्नी रेवती सिंह के मर्डर के बाद जब भी वह कोठी में आते उनका मन दुखी होता था। पिछले कई साल से उनका अधिकांश वक्त कैराना में ही बीतता था।  जिला बार संघ के पूर्व अध्यक्ष अनिल जिंदल कहते है कि दंगे के दौरान पुलिस द्वारा मुकदमा दर्ज करने के मामले में बाबूजी ने उनके माध्यम से जिला जज के यहां रिवीजन कराया था, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया था। वरिष्ठ अधिवक्ता ठाकुर कंवरपाल सिंह कहते है कि कचहरी में बतौर अधिवक्ता हुकुम सिंह को साथ लंबा समय बीता। वह कभी किसी नेता या अफसर के खिलाफ टिप्पणी नहीं करते थे। सियासत में मौकापरस्ती उन्हें नापसंद थी। जनता से सीधा संवाद ही उनकी ताकत थी।
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पढ़ें : PHOTOS: शोक में डूबा कैराना, हुकुम सिंह के निधन पर तमाम नेताओं ने अर्पित की श्रद्धांजलि

राजनाथ की शुकतीर्थ दर्शन  इच्छा को कराया था पूरा 

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राजनाथ सिंह के साथ हुकुम सिंह - फोटो : अमर उजाला

साल 2002 की बात है। सूबे के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने बाबू हुकुम सिंह से शुक्रताल दर्शन और शिक्षा ऋषि वीतराग स्वामी कल्याण देव से भेंट का जिक्र किया। उस वक्त भागवत पीठ श्री शुकदेव आश्रम, शुक्रताल में चित्रकूट के तुलसी पीठाधीश्वर जगदगुरु रामभद्राचार्य की श्रीमद्भागवत कथा रखी गई थी। कथा के समापन की पूर्ण आहुति में लखनऊ से सीएम राजनाथ सिंह को लेकर कैबिनेट मंत्री के रूप में हेलीकॉप्टर से हुकुम सिंह शुक्रताल पधारे। कर्मयोगी संत से आशीर्वाद के बाद उन्होंने यज्ञशाला में आहुतियां अर्पित की थी। सांसद एवं पूर्व मंत्री हुकुम सिंह के निधन पर पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद ने शोक व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण शिक्षा के विकास में उनका योगदान मिला। वे परिपक्व और कुशल राजनैतिज्ञ थे। 

चैंबर जी-59 में वकालत करते थे बाबूजी 
कचहरी में चैंबर नंबर जी-59 की पहचान बाबू हुकुम सिंह से होती है। वर्ष 1969 में सेना से कैप्टन का पद त्याग कर यहीं उन्होंने वकालत की प्रैक्टिस प्रारंभ की थी। कैराना और शामली से ग्रामीण उनसे मिलने आते थे। आज इस चैंबर में वरिष्ठ अधिवक्ता सुभाषचंद अरोरा बैठते है। अरोरा बताते है कि 22 जनवरी 1974 का दिन उन्हें नहीं भूलता। पहली बार विधायक बने हुकुम सिंह ने उनसे कहा कि सुभाष अब आप ही मेरे चैंबर को संभालेंगे। वर्ष 1970 में जब पंडित वाचस्पति कौशिक जिला बार संघ के अध्यक्ष बने तब उन्हें सचिव का दायित्व मिला था। अभी भी वह जिला बार संघ के सदस्य थे।

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