सेना बाहर से खरीदेगी 10 करोड़ रुपये का दूध, बंद होगा 'मिलट्री डेयरी फार्म', यहां शिफ्ट होंगी गायें
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यूपी के मेरठ में सेना के जवानों को अब अपने मिलिट्री फार्म की 15 सौ गायों का दूध नहीं मिलेगा। इसके चलते अब हर साल सेना को 10 करोड़ रुपये से ज्यादा का दूध बाहर की डेयरियों से खरीदना पड़ेगा। तीन दिनों में मिलिट्री डेयरी फार्म की सभी 1500 गायें यहां से दूसरी जगह भेज दी जाएंगी।
मेरठ में सन् 1908 में मवाना रोड पर हजारों बीघे जमीन में मिलिट्री फार्म की स्थापना की गई थी। इसमें गोशाला और डेयरी की शुरुआत 1939 में हुई। यहां पर फ्रीजवाल नस्ल की करीब 15 सौ गायें थी। ये रोजाना करीब सात हजार लीटर दूध देती थीं। ये दूध मेरठ छावनी में सेना को सप्लाई किया जाता था। पूरे साल करीब 25 लाख बीस हजार लीटर दूध का उत्पादन होता था। 40 रुपये किलो के हिसाब से इस दूध की कीमत 10 करोड़ आठ हजार रुपये होती थी।
मिलिट्री डेयरी फार्म की सभी गायें अब उत्तराखंड भेज दी जाएंगी। दरअसल, पिछले साल केंद्र सरकार ने देश के सभी 39 मिलिट्री फार्म को बंद करने का आदेश दिया था। इन्हें बंद करने के पीछे तर्क दिया गया था कि बाजार में दूध उपलब्ध है तो इतने संसाधन क्यों लगाए जाएं। इस घोषणा के बाद सेना ने गायें देने की बात कही थी। लेकिन कई राज्यों की सरकार ने गायें लेने से इंकार कर दिया था। इसके बाद उत्तराखंड सरकार ने सेना से 10 हजार फ्रीजवाल नस्ल की गाय लेने की प्रक्रिया शुरू की थी। बीते तीन दिन में 500 से ज्यादा गायें उत्तराखंड के नैनीताल जिले भेजी जा चुकी हैं। बाकी गायें अब चंपावत और दूसरे जिलों में जाएंगी।
नस्ल पर पड़ेगा फर्क
मेरठ कैंट स्थित केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान ने 1989 में क्रास ब्रीड के जरिये गायों की फ्रीजवाल नस्ल तैयार की थी। भारत की सबसे ज्यादा दूध देने वाली गाय साहिवाल नस्ल और हालैंड की सबसे ज्यादा दूध देने वाली हॉलस्टीन फ्रिजियन की क्रास ब्रीड से फ्रीजवाल नस्ल तैयार हुई। फ्रीजवाल नस्ल एक ब्यात में आमतौर पर चार हजार लीटर दूध देती है। यह सात से आठ हजार लीटर तक भी दूध दे सकती है।
इसकी कीमत डेढ़ लाख से दो लाख रुपये तक है। मिलिट्री फार्म बंद होने के बाद केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान पर भी संकट है। ये गायें उत्तराखंड में ग्रामीणों को दिए जाने से फ्रीजवाल नस्ल पर भी संकट आएगा। विशेषज्ञों का कहना है मिलिट्री फार्म से यह नस्ल बाहर होते ही जल्द ही खत्म हो जाएगी।
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