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एक और कृषि क्रांति : कृषि विज्ञानियों ने तैयार किया गन्ने का सिंथेटिक बीज

Wed, 05 Jul 2017 01:22 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, मेरठ/ विजय नारायन सिंह
अमर उजाला ब्यूरो, मेरठ/ विजय नारायन सिंह Updated Wed, 05 Jul 2017 01:22 PM IST
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Another agricultural revolution : agricultural scientists designed the cane synthetic seeds
गन्ने का सिंथेटिक बीज
सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के दो कृषि विज्ञानियों ने दुनिया में पहली बार गन्ने का सिंथेटिक बीज तैयार किया है। इस रिसर्च से गन्ने की खेती का पूरा तरीका बदल जाएगा। अब गन्ने को काटकर खेत में लगाने की बजाय नर्सरी में बीजों से तैयार पौधे खेतों में रोपे जा  सकते हैं। इस बीज का तीन बार फील्ड ट्रायल पूरी तरह सफल रहा है। अब इसकी बड़े पैमाने पर खेती की तैैयारी है। यह शोध जैव प्रौद्योगिकी विभाग के अध्यक्ष  प्रोफेसर आरएस सेंगर और डॉक्टर मनोज शर्मा ने किया है। दोनों विज्ञानियों ने बताया कि इस उपलब्धि का पेटेंट कराने की तैयारी की जा रही है। कृषि विज्ञानी इसे गन्ने की खेती में दूसरी हरित क्रांति मान रहे हैं। 
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कैसे तैयार हुआ बीज

Another agricultural revolution : agricultural scientists designed the cane synthetic seeds
लैब में बीज से तैयार किए गए पौधे
यह संश्लेषित बीज प्राकृतिक बीज का ही बहुरूपीय रूप है। पौधे के किसी भी हिस्से से लिए गए टिश्यू को सोडियम एल्जीनेट और कैल्सियम क्लोराइड के घोल से बीज तैयार किया जाता है। इसकी खासियत यह है कि यह प्राकृतिक और कृतिम दोनों ही परिस्थितियों में विकसित होता है। 

प्रति हेक्टेयर उत्पादन 75 टन ले जाने का लक्ष्य 
प्रोफेसर सेंगर ने बताया कि वेस्ट यूपी में प्रति हेक्टेयर 75 टन गन्ना उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अभी गन्ने का उत्पादन 71.78 टन प्रति हेक्टेयर है। मध्य क्षेत्र में 65.12 टन और पूर्वी उत्तर प्रदेश में गन्ने का औसत उत्पादन 59.99 टन प्रति हेक्टेयर है। 
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फसल तैयार होने में करीब डेढ़ से दो माह की बचत

Another agricultural revolution : agricultural scientists designed the cane synthetic seeds
लैब में डा. मनोज और प्रोफेसर सेंगर
प्रोफेसर सेंगर ने बताया कि संश्लेषित बीज तकनीक के जरिये इस बीज को गोली के रूप में तैयार किया गया है। इस बीज का अंकुरण गन्ने को काटर कर बोए गए बीज की तुलना में अधिक होता है। इसके जरिये रोगमुक्त पौधों का रोपण करने से गन्ने की उत्पादकता तीन गुणा तक बढ़ाई जा सकती है। अभी प्रचलित पद्धति की बोआई से करीब 35 प्रतिशत फसल रोगों व अन्य कारणों से खराब हो जाती है। नर्सरी के सफल प्रयोग के बाद इन बीजों को सीधे खेत में बोने का परीक्षण किया जा रहा है। उम्मीद है कि शीघ्र ही इसमें सफलता मिल जाएगी। उन्होंने बताया कि पादप टिश्यू कल्चर तकनीक और उत्तम तकनीक के जरिए विविध फसलों के रोगमुक्त बीज का उत्पादन हमारी प्राथमिकता है, ताकि बढ़ती आबादी के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराया जा सके।

डॉक्टर मनोज शर्मा ने बताया कि इस बीज से गन्ने की फसल बोने के समय से पहले नर्सरी तैयार की जा सकती है। डेढ़ से दो महीने के अंदर पौधे रोपने के लिए तैयार हो जाएंगे। इस तरह फसल के पूरी तरह तैयार होने का समय दो महीने तक बचाया जा सकता है।  

एक एकड़ के लिए 6000 पौधों की जरूरत
प्रेफेसर सेंगर ने बताया कि वर्तमान की पद्धति में एक एकड़ के लिए करीब 50 क्विंटल गन्ने की जरूरत होती है, जबकि इतनी ही खेती के लिए 6000 पौधे पर्याप्त होंगे। अभी किसानों के लिए एक-एक हजार गोलियों का पैकेट तैयार किया गया है। 

व्यावसायिक उत्पादन से लागत में कम होगी
उन्होंने बताया कि संश्लेषित पौधे की कीमत 5 रुपये प्रति पौधा निर्धारित की गई है, जबकि बीज की कीमत 3 रुपये प्रति बीज रखी गई है। व्यावसायिक उत्पादन के जरिये इसकी कीमत 50 पैसे प्रति बीज तक लाई जा सकती है।




 
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कुलपति ने दी बधाई

Another agricultural revolution : agricultural scientists designed the cane synthetic seeds
कुलपति गया प्रसाद
सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर गया प्रसाद ने इस उपलब्धि के लिए प्रोफेसर सेंगर और डॉक्टर मनोज शर्मा को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि जैव तकनीक में शोध को बढञा देने के लिए ज्यादा निवेश की जरूरत है, क्योंकि आने वाले दिनों में बढ़ती आबादी के लिए भोजन की समस्या बढती जाएगी। इसके लिए जरूरी है कि शोध को बढ़ावा दिया जाए।
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