अहोई अष्टमी आज: संतान कल्याण के लिए रखा जाता है यह व्रत, इस मुहूर्त में करें पूजन
ब्रह्मपुरी कॉलोनी स्थित श्री बगलामुखी मंदिर के अधिष्ठाता पंडित रोहित वशिष्ठ ने बताया कि अहोई अष्टमी का व्रत विशेष रूप से संतान की आयु एवं आरोग्य जीवन के लिए रखा जाता है। इस व्रत को रखने से संतान का कल्याण होता है। इसलिए माताएं इस व्रत को विशेष रूप से रखती हैं।
दीवार पर चित्र बनाने की है प्राचीन परंपरा
अहोई अष्टमी पर दीवार पर मां अहोई का स्वरूप बनाकर विधि-विधान से पूजा अर्चना करने की प्राचीन परंपरा है। वर्तमान में समय के अभाव में दीवार पर चित्र बनाने की परंपरा कम हुई है। बाजारों में मां अहोई के सुंदर कलेंडर बिक रहे हैं, जिनको महिलाओं ने खरीदकर दीवारों पर लगाया है।
संतान के जन्म से ही तैयार की जाती है चांदी के मोतियों की माला
संतान होने पर चांदी के मोतियों की एक माला बनाई है। मोती को स्थानीय भाषा में सेव कहते हैं। प्रत्येक वर्ष अहोई अष्टमी के दिन दो सेव माला में डाल दिये जाते हैं।
वर्ष- वृद्धि के साथ-साथ माला के मोती भी बढ़ने लगते हैं। इस माला को अष्टमी से लेकर दीपावली तक माताएं अपने गले में पहनती हैं, जितनी संताने होती है, उतनी ही मालाएं तैयार की जाती हैं।
मां अहोई के चित्र और मूर्ति के समक्ष रखा जाता है जल से भरा पात्र
अहोई माता की मूर्ति के पास एक जल पात्र रखा जाता है जिसको स्थानीय भाषा में करवा कहते हैं। अहोई पर विशेष रूप से पूड़े या गुलगुले बनाए जाते हैं। भगवती अहोई के स्वरूप के समक्ष जल से भरे पात्र को रखकर, दीपक-धूप जलाकर भगवती अहोई की पूजा की जाती है।
मां को पूड़े या गुलगले का भोग लगाया जाता है, जिसे बाद में प्रसाद के रूप में बांट दिया जाता है। इसके साथ ही माताएं बायना निकालकर घर की बड़ी महिलाओं को देती हैं। शाम को तारों को देखकर व्रत खोलती हैं।