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सूखे इलाकों में खूब पैदा होगा प्रोटीन वाला गेहूं, सीसीएसयू में तैयार की गई दो उन्नत किस्में

Thu, 22 Nov 2018 11:49 AM IST
सचिन त्यागी, अमर उजाला, मेरठ
सचिन त्यागी, अमर उजाला, मेरठ Updated Thu, 22 Nov 2018 11:49 AM IST
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Agricultural scientists have developed protein rich wheat in meerut
मेरठ न्यूज

अब बारिश और पानी की कमी से गेहूं का उत्पादन प्रभावित नहीं हो सकेगा। इसके लिए मेरठ में चौ. चरण सिंह विश्वविद्यालय (सीसीएसयू) के डिपार्टमेंट ऑफ जेनेटिक एंड प्लांट ब्रीडिंग (डीओजीएंडपीबी) ने गेहूं की रोगरोधी दो उन्नत किस्में ड्राउट टॉलरेंट (डीटी) और लीफ रस्ट रेसिस्टेंट (एलआरआर) तैयार की हैं, जो शोध के अंतिम चरण में हैं। 

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सीसीएसयू में शोध परियोजनाओं के प्रधान अन्वेषक प्रो. पीके शर्मा के मुताबिक डीओजीएंडपीबी के रिसर्च में ग्रेन क्वालिटी, प्रोटीन और मिनिरल आदि बढ़ाने के लिए एलआरआर प्रजाति और सूखा सहन करने वाली डीटी प्रजाति डेवलप की जा रही हैं।
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एलआरआर में प्रोटीन के साथ रोगरोधक जीन ट्रांसफर किए गए हैं, जिनमें 13 से 14 फीसदी प्रोटीन के साथ ग्रेन क्वालिटी और दूसरे मिनरल की मात्रा बढ़ गई है। डीटी खासतौर पर कम पानी वाले इलाको के लिए विकसित की जा रही है। नई प्रजाति में 13 से 14 फीसदी विटामिन और उत्पादन भी ज्यादा होगा। 

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विश्व में चीन के बाद गेहूं उत्पादन में भारत का दूसरा नंबर है। गेहूं में औसतन 11-12 प्रतिशत प्रोटीन होता है, जो ठंडे मौसम वाले देशों में शीत एवं गर्म जलवायु वाले देशों में वसंत में उगाया जाता है। वसंतकालीन 120-130 दिनों में तैयार हो जाता है, जबकि शीतकालीन 240-300 दिन लेता है। गेहूं में थायमिन, नियासिन, विटामिन बी-6, रिबोफ्लेविन, पैंटोथेनिक एसिड, फोलेट तथा खनिज के रूप में मैगनीज और सेलेनियम प्रचुर मात्रा में  होते हैं।  

कई प्रजातियों को कराया जाता है क्रॉस 
अच्छे किस्मों की प्रजातियों के पौधों को अधिक रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले पौधों से क्रॉस कराकर नई प्रजाति तैयार की गई। इसे अधिक प्रोटीन वाली तीसरी प्रजाति से क्रॉस कराया गया। इसी तरह कम दिन में तैयार होने, अधिक तापमान सहने वाले, खास विशेषता वाले पौधों से एक-एक कर क्रॉस कराने के बाद ये नई वैरायटी तैयार की जा रही हैं।  

Agricultural scientists have developed protein rich wheat in meerut
प्रो. पीके शर्मा

लैब और फार्म में फसल बोने के बाद एक साथ रिसर्च

प्रो. पीके शर्मा के मुताबिक चार जगहों पर काम चल रहा है। लैब और रिसर्च फार्म में फसल बोने के बाद शोध जारी है। इसके लिए भारतीय गेहूं एवं जौं अनुसंधान केंद्र, करनाल, पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना एवं भारतीय कृषि अनुसंधान नई दिल्ली के साथ अनुबंध किया है। रिसर्च और विकास में कम समय लगे, इसलिए मेरठ के साथ हिमाचल प्रदेश के कैलोन और दालन के मैदान पर इनको उगाया जा रहा है।

मई महीने में बुआई कर सितंबर में कटाई हो जाती है। फिर बीज को मेरठ लाकर नवंबर में बोया जाता है और अप्रैल में कटाई हो जाती है। एक साल में दो फसल उगाकर रिसर्च में लगने वाले समय को कम किया जा रहा है।  
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