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सहायक कुलसचिव का ऑफिस सील
ब्यूरो/अमर उजाला मेरठ
Updated Wed, 02 Mar 2016 01:53 AM IST
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सरदार वल्लभ भाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में विधिक समिति द्वारा धोखाधड़ी किये जाने का मामला सामने आया है। सहायक कुलसचिव द्वारा अग्रिम भुगतान के लिये दिये गये बिलों में गड़बड़ी पकड़ी गई है। जिस पर कार्रवाई करते हुए कुलपति ने तीन सदस्यों की मौजूदगी में सोमवार रात सहायक कुलसचिव के कार्यालय को सील कर दिया।
कृषि विवि में सहायक कुलसचिव देवेंद्र यादव द्वारा 16 लाख 76 हजार रुपये के अग्रिम भुगतान में की गई गड़बड़ी से खलबली मच गई है। पिछले दो वर्षों से यह मामला चल रहा था। पूर्व में हुई वित्त समिति और प्रबंध समिति की बैठक में अग्रिम भुगतान का मुद्दा उठा था, जिस पर प्रबंध समिति ने सभी का समायोजन करने के निर्देश दिए थे।
समायोजन के बाद सहायक कुलसचिव पर बकाया निकला तो उनका जनवरी माह का वेतन रोक दिया गया। इसके बाद उन्होंने वित्त नियंत्रक को छह बिल दिए जो 16 लाख 78 हजार 297 रुपये के थे। वित्त नियंत्रक सतेंद्र कुमार को शक हुआ तो मामले की जांच शुरू हो गई। जांच में जो बिल भुगतान की रसीद लगाई गई वह गलत निकली।
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यहां पकड़ी गई गड़बड़ी
बिलों में जो रसीद लगाई गई है वह उच्च न्यायालय में प्रयोग नहीं की जाती है, इस उपयोग किसी को समन जारी करने में किया जाता है। एक बिल में लखनऊ पीठ की मुहर अंग्रेजी में लगी हुई थी। उसमें हाईकोर्ट ब्रांच लिखा हुआ था, जबकि हाईकोर्ट की मुहर पर बेंच होना चाहिए था।
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कृषि विवि में सहायक कुलसचिव देवेंद्र यादव द्वारा 16 लाख 76 हजार रुपये के अग्रिम भुगतान में की गई गड़बड़ी से खलबली मच गई है। पिछले दो वर्षों से यह मामला चल रहा था। पूर्व में हुई वित्त समिति और प्रबंध समिति की बैठक में अग्रिम भुगतान का मुद्दा उठा था, जिस पर प्रबंध समिति ने सभी का समायोजन करने के निर्देश दिए थे।
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समायोजन के बाद सहायक कुलसचिव पर बकाया निकला तो उनका जनवरी माह का वेतन रोक दिया गया। इसके बाद उन्होंने वित्त नियंत्रक को छह बिल दिए जो 16 लाख 78 हजार 297 रुपये के थे। वित्त नियंत्रक सतेंद्र कुमार को शक हुआ तो मामले की जांच शुरू हो गई। जांच में जो बिल भुगतान की रसीद लगाई गई वह गलत निकली।
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यहां पकड़ी गई गड़बड़ी
बिलों में जो रसीद लगाई गई है वह उच्च न्यायालय में प्रयोग नहीं की जाती है, इस उपयोग किसी को समन जारी करने में किया जाता है। एक बिल में लखनऊ पीठ की मुहर अंग्रेजी में लगी हुई थी। उसमें हाईकोर्ट ब्रांच लिखा हुआ था, जबकि हाईकोर्ट की मुहर पर बेंच होना चाहिए था।