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21 साल बाद पीएसी बम कांड
Meerut
Updated Thu, 20 Nov 2014 05:30 AM IST
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मेरठ। पीएसी कैंप पर हुए आतंकी हमले में पुरानी परतें उघाड़ना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर होगा। मुख्य आरोपी सलीम पतला को सजा दिलाने में गवाही ही महत्वपूर्ण होगी, लेकिन 21 साल बाद कौन गवाह कहां है, यह पुलिस नहीं जानती। यह अब सम्मन तामील कराने के दौरान ही पता चल पाएगा। इस बात से पुलिस भी इनकार नहीं कर रही है कि केस का दारोमदार गवाही पर टिका है और गवाहों को खोजना बड़ा टास्क होगा।
26 जनवरी 1993 को सिविल लाइन थाना क्षेत्र अंतर्गत जिला पशु चिकित्सालय के पास स्थित पीएसी के कैंप पर बम से हमला हुआ था। उस समय यह चर्चा थी कि मलियाना कांड का बदला लेने के लिए शहर में पीएसी के कैंपों को निशाना बनाया गया था। 1992 और 1993 को दो कैंपों पर हमले हुए थे। इस केस में उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सलीम पतला से अलग आठ आरोपियों को उम्र कैद की सजा सुनाई जा चुकी है। वहीं सलीम पतला 21 साल बाद पकड़ा गया है। उसके खिलाफ उसी तरह से ट्रायल चलेगा जैसा उन आठ आरोपियों के खिलाफ चला था। पुलिस के लिए बदले समीकरणों में मुसीबत ही मुसीबत है। इस केस में 30 गवाह बनाए गए थे। उस समय इनकी गवाही पर आरोपियों को सजा भी सुनाई गई। अब 21 साल बाद ये गवाह कहां होंगे, यह कोई नहीं जानता। इंस्पेक्टर सिविल लाइन इकबाल अहमद कलीम का कहना है कि सब कुछ न्यायालय के आदेश पर निर्भर है। न्यायालय से ही गवाहों के लिए सम्मन जारी होंगे। जिस समय इन्हें तामील कराने का समय आएगा तो पता चल पाएगा कि कौन गवाह किस स्थिति में है। हालांकि यह बात सही है कि फिलहाल महत्वपूर्ण बात यही है कि गवाहों को खोजा कैसे जाएगा? गौरतलब है कि यह अपने आप में ऐसा मुकदमा है, जिसमें सजा सुनाने के 21 साल बाद एक अकेले अभियुक्त के खिलाफ ट्रायल शुरू होगा।
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26 जनवरी 1993 को सिविल लाइन थाना क्षेत्र अंतर्गत जिला पशु चिकित्सालय के पास स्थित पीएसी के कैंप पर बम से हमला हुआ था। उस समय यह चर्चा थी कि मलियाना कांड का बदला लेने के लिए शहर में पीएसी के कैंपों को निशाना बनाया गया था। 1992 और 1993 को दो कैंपों पर हमले हुए थे। इस केस में उल्लेखनीय तथ्य यह है कि सलीम पतला से अलग आठ आरोपियों को उम्र कैद की सजा सुनाई जा चुकी है। वहीं सलीम पतला 21 साल बाद पकड़ा गया है। उसके खिलाफ उसी तरह से ट्रायल चलेगा जैसा उन आठ आरोपियों के खिलाफ चला था। पुलिस के लिए बदले समीकरणों में मुसीबत ही मुसीबत है। इस केस में 30 गवाह बनाए गए थे। उस समय इनकी गवाही पर आरोपियों को सजा भी सुनाई गई। अब 21 साल बाद ये गवाह कहां होंगे, यह कोई नहीं जानता। इंस्पेक्टर सिविल लाइन इकबाल अहमद कलीम का कहना है कि सब कुछ न्यायालय के आदेश पर निर्भर है। न्यायालय से ही गवाहों के लिए सम्मन जारी होंगे। जिस समय इन्हें तामील कराने का समय आएगा तो पता चल पाएगा कि कौन गवाह किस स्थिति में है। हालांकि यह बात सही है कि फिलहाल महत्वपूर्ण बात यही है कि गवाहों को खोजा कैसे जाएगा? गौरतलब है कि यह अपने आप में ऐसा मुकदमा है, जिसमें सजा सुनाने के 21 साल बाद एक अकेले अभियुक्त के खिलाफ ट्रायल शुरू होगा।
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