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चुनावी रण जीतने को आजमाया जा रहा हर दांव
Meerut
Updated Wed, 02 Apr 2014 05:30 AM IST
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मेरठ। चुनाव जीतने के लिए कोई भी पार्टी न बाहरी प्रत्याशी से परहेज कर रही है और न दूसरे दलों के नेताओं से। मिशन 2014 के लिए सपा जहां लगतार दूसरे दलों से नेताओं को ज्वाइन करा रही है तो दूसरे दल भी आक्रामक रणनीति बना रहे हैं। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस ने मेरठ से नगमा और गाजियाबाद से राजब्बर को उतारने के बाद अब बॉलीवुड स्टार प्रचार के लिए मैदान में उतर सकते हैं। भाजपा ने पूर्व कमिश्नर के समर्थन में सन्नी देओल का रोड शो करा दिया। बसपा स्थानीय स्तर पर नेताओं को अपने से जोड़ रही है तो कड़ी कार्रवाई से भी नहीं हिचक रही है। अब जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है तो सभी दल अपने सभी तरकश के विशेष तीर इस्तेमाल कर रहे हैं।
सपा ने मेरठ केपूर्व सांसद हरीश पाल को ज्वाइन कराकर गुर्जर वोटों में सेंध लगाने की कोशिश की है। मेरठ में गुर्जर प्रत्याशी न होने के कारण सपा गुर्जरों को साधने का लगतार प्रयास कर रही है। रामसकल गुर्जर को प्रभारी बनाया हुआ है। इसके अलावा नोएडा केसांसद सुरेंद्र नागर को पार्टी में लाकर नोएडा के समीकरण तो दुरूस्त करने कवायद की गई साथ ही पूरे पश्चिम में गुर्जर समाज को संदेश देने की रणनीति बनाई गई। सिकंदराबाद विधानसभा चुनाव में सपा प्रत्याशी के खिलाफ हरेंद्र यादव चुनाव लड़े थे। चुनावी रणनीति के तहत वहां की जिला पंचायत अध्यक्ष और हरेंद्र यादव की पत्नी आशा यादव को पार्टी में शामिल कराया गया। गुर्जर मतों को साधने के लिए सपा नेताओं ने 3 अप्रैल को हसनपुर में एक गुर्जर प्रतिनिधियों का सम्मेलन भी बुलाया है।
त्यागी समाज के लिए भाजपा ने जहां हाल ही में रालोद के पश्चिम उत्तर प्रदेश अध्यक्ष सत्यवीर त्यागी को ज्वाइन कराया तो रालोद ने त्रिलोक त्यागी को अपने पाले में लिया। भाजपा ने बागपत में सन्नी देयोल का कार्यक्रम भी चुनाव को आक्रामक बनाने के लिए किया। कल्याण सिंह के गढ़ बुलंदशहर से संदेश देने के लिए मोदी की पश्चिम की चुनावी रैलियों की शुरुआत वहां से की गई। इसके अलावा दूसरे बड़े नेता भी पहले चरण के चुनाव को धार देने के लिए मैदान में उतरेंगे। मुस्लिमों को जोड़ने के लिहाज से मेरठ में मुख्तार अब्बास नकवी ने एक सभा को फोन से संबोधित किया।
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कांग्रेस जहां मेरठ में नगमा जैसे स्टार को उतारकर चुनाव को रोचक बना चुकी है तो माना जा रहा है कि जल्द बॉलीवुड के बड़े चेहरे मेरठ में हो सकते हैं। गाजियाबाद से राजबब्बर और बिजनौर से जयाप्रदा के कारण पहले ही कांग्रेस रालोद गठबंधन चुनावी हवा को मजबूती देने का काम कर चुका है। बागपत में चौधरी परिवार की बहू जब चुनाव प्रचार को पहुंची तो हर वर्ग ने उन्हें हाथों हाथ लिया।
बसपा प्रमुख मायावती के पश्चिम में आक्रामक दौरे होने है। पार्टी स्थानीय स्तर समीकरण दुरूस्त करने के लिए कई जिलों में दूसरे दलों केनेताओं को शामिल करा चुकी है। पार्टी के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी मुनकाद अली दलित-मुस्लिम गठबंधन को मजबूत करने के लिए लगातार सभाएं कर रहे हैं। मुस्लिम मतों के धुव्रीकरण होने की स्थिति में दलित-मुस्लिम समीकरण के सहारे बेहतर प्रदर्शन करने की रणनीति बसपा नेताओं की है।
वहीं आप के प्रत्याशी दिल्ली चुनाव के करिश्मे की याद दिलाकर दूसरी सभी पार्टियों पर प्रहार कर रहे हैं। स्थानीय मुद्दों को उठाकर आप के प्रत्याशी चुनाव को जातिगत समीकरणों के अलावा मुद्दों पर लाने की रणनीति में हैं।
भाजपा ने बनायी चुनावी रणनीति
मेरठ। भाजपा का थिंक टैंक जातीय समीकरण साधने में जुटा है। परंपरागत वोट बैंक के साथ भाजपा का जोर जाट वोटरों को अपने पाले में बचाये रखने और गुर्जरों को जोड़ने पर है। इसी रणनीति के तहत नेताओं को संपर्क की कमान दी गयी है। भाजपा का मानना है कि जाट और गुर्जर वोट बैंक उसके तारणहार हो सकते हैं।
मेरठ लोकसभा सीट पर भाजपा अपने परंपरागत वोट बैंक के साथ जाट वोटों में भी अच्छी पकड़ रखती है। पिछले चुनाव में रालोद से गठबंधन के चलते उसे इसका पूरा लाभ मिला और मेरठ सीट पर जीत मिली। लेकिन इस बार जाट वोटों को लेकर भाजपा बेचैन है। क्योंकि एक तरफ जहां उसका रालोद से गठबंधन नहीं है, वहीं दूसरी तरफ चुनाव से ठीक पहले केंद्रीय सेवाओं जाट आरक्षण मिलने से जाट रालोद - कांग्रेस गठबंधन को फायदा पहुंच सकता है। बात अगर गुर्जर मतों की करें तो गुर्जर वोट हमेशा अपनी बिरादरी के प्रत्याशी को ही गया है, चाहे वह किसी पार्टी से हो। वर्ष 1999 में गुर्जर वोट कांग्रेस के अवतार सिंह भड़ाना को गया तो 2004 में रालोद से लड़े मलूक नागर को गया। यही नहीं 2009 के चुनाव में जब मलूक नागर बसपा से लड़े तो भी उनकी तरफ ही रहा। लेकिन इस बार परिस्थिति अलग है। मेरठ सीट पर एक भी गुर्जर प्रत्याशी मैदान में नहीं है, जो भाजपा को राहत दे रही है। ऐसे में भाजपा ने जाट वोटों को अपने पास बचाये रखने के लिए पार्टी के स्थानीय जाट नेताओं को सक्रिय कर दिया है, तो गुर्जर नेता भी अपने काम में जुट गये हैं। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि यदि इन दो वोट बैंक को साध लिया तो चुनाव आसान हो जायेगा।
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सपा ने मेरठ केपूर्व सांसद हरीश पाल को ज्वाइन कराकर गुर्जर वोटों में सेंध लगाने की कोशिश की है। मेरठ में गुर्जर प्रत्याशी न होने के कारण सपा गुर्जरों को साधने का लगतार प्रयास कर रही है। रामसकल गुर्जर को प्रभारी बनाया हुआ है। इसके अलावा नोएडा केसांसद सुरेंद्र नागर को पार्टी में लाकर नोएडा के समीकरण तो दुरूस्त करने कवायद की गई साथ ही पूरे पश्चिम में गुर्जर समाज को संदेश देने की रणनीति बनाई गई। सिकंदराबाद विधानसभा चुनाव में सपा प्रत्याशी के खिलाफ हरेंद्र यादव चुनाव लड़े थे। चुनावी रणनीति के तहत वहां की जिला पंचायत अध्यक्ष और हरेंद्र यादव की पत्नी आशा यादव को पार्टी में शामिल कराया गया। गुर्जर मतों को साधने के लिए सपा नेताओं ने 3 अप्रैल को हसनपुर में एक गुर्जर प्रतिनिधियों का सम्मेलन भी बुलाया है।
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त्यागी समाज के लिए भाजपा ने जहां हाल ही में रालोद के पश्चिम उत्तर प्रदेश अध्यक्ष सत्यवीर त्यागी को ज्वाइन कराया तो रालोद ने त्रिलोक त्यागी को अपने पाले में लिया। भाजपा ने बागपत में सन्नी देयोल का कार्यक्रम भी चुनाव को आक्रामक बनाने के लिए किया। कल्याण सिंह के गढ़ बुलंदशहर से संदेश देने के लिए मोदी की पश्चिम की चुनावी रैलियों की शुरुआत वहां से की गई। इसके अलावा दूसरे बड़े नेता भी पहले चरण के चुनाव को धार देने के लिए मैदान में उतरेंगे। मुस्लिमों को जोड़ने के लिहाज से मेरठ में मुख्तार अब्बास नकवी ने एक सभा को फोन से संबोधित किया।
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कांग्रेस जहां मेरठ में नगमा जैसे स्टार को उतारकर चुनाव को रोचक बना चुकी है तो माना जा रहा है कि जल्द बॉलीवुड के बड़े चेहरे मेरठ में हो सकते हैं। गाजियाबाद से राजबब्बर और बिजनौर से जयाप्रदा के कारण पहले ही कांग्रेस रालोद गठबंधन चुनावी हवा को मजबूती देने का काम कर चुका है। बागपत में चौधरी परिवार की बहू जब चुनाव प्रचार को पहुंची तो हर वर्ग ने उन्हें हाथों हाथ लिया।
बसपा प्रमुख मायावती के पश्चिम में आक्रामक दौरे होने है। पार्टी स्थानीय स्तर समीकरण दुरूस्त करने के लिए कई जिलों में दूसरे दलों केनेताओं को शामिल करा चुकी है। पार्टी के पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभारी मुनकाद अली दलित-मुस्लिम गठबंधन को मजबूत करने के लिए लगातार सभाएं कर रहे हैं। मुस्लिम मतों के धुव्रीकरण होने की स्थिति में दलित-मुस्लिम समीकरण के सहारे बेहतर प्रदर्शन करने की रणनीति बसपा नेताओं की है।
वहीं आप के प्रत्याशी दिल्ली चुनाव के करिश्मे की याद दिलाकर दूसरी सभी पार्टियों पर प्रहार कर रहे हैं। स्थानीय मुद्दों को उठाकर आप के प्रत्याशी चुनाव को जातिगत समीकरणों के अलावा मुद्दों पर लाने की रणनीति में हैं।
भाजपा ने बनायी चुनावी रणनीति
मेरठ। भाजपा का थिंक टैंक जातीय समीकरण साधने में जुटा है। परंपरागत वोट बैंक के साथ भाजपा का जोर जाट वोटरों को अपने पाले में बचाये रखने और गुर्जरों को जोड़ने पर है। इसी रणनीति के तहत नेताओं को संपर्क की कमान दी गयी है। भाजपा का मानना है कि जाट और गुर्जर वोट बैंक उसके तारणहार हो सकते हैं।
मेरठ लोकसभा सीट पर भाजपा अपने परंपरागत वोट बैंक के साथ जाट वोटों में भी अच्छी पकड़ रखती है। पिछले चुनाव में रालोद से गठबंधन के चलते उसे इसका पूरा लाभ मिला और मेरठ सीट पर जीत मिली। लेकिन इस बार जाट वोटों को लेकर भाजपा बेचैन है। क्योंकि एक तरफ जहां उसका रालोद से गठबंधन नहीं है, वहीं दूसरी तरफ चुनाव से ठीक पहले केंद्रीय सेवाओं जाट आरक्षण मिलने से जाट रालोद - कांग्रेस गठबंधन को फायदा पहुंच सकता है। बात अगर गुर्जर मतों की करें तो गुर्जर वोट हमेशा अपनी बिरादरी के प्रत्याशी को ही गया है, चाहे वह किसी पार्टी से हो। वर्ष 1999 में गुर्जर वोट कांग्रेस के अवतार सिंह भड़ाना को गया तो 2004 में रालोद से लड़े मलूक नागर को गया। यही नहीं 2009 के चुनाव में जब मलूक नागर बसपा से लड़े तो भी उनकी तरफ ही रहा। लेकिन इस बार परिस्थिति अलग है। मेरठ सीट पर एक भी गुर्जर प्रत्याशी मैदान में नहीं है, जो भाजपा को राहत दे रही है। ऐसे में भाजपा ने जाट वोटों को अपने पास बचाये रखने के लिए पार्टी के स्थानीय जाट नेताओं को सक्रिय कर दिया है, तो गुर्जर नेता भी अपने काम में जुट गये हैं। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि यदि इन दो वोट बैंक को साध लिया तो चुनाव आसान हो जायेगा।