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पर्यावरण के प्रहरियों को बचाने आगे आ रहे अन्नदाता
Updated Mon, 09 Jul 2018 02:28 AM IST
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पर्यावरण के रक्षकों को बचाने आगे आ रहे कृषक
हैचरी में अंडों से निकले 850 कछुए कर रहे हस्तिनापुर के तालाब में अठखेलियां
पांच गांवों के 600 किसानों संग विश्व प्रकृति निधि भारत ने छेड़ी जागरूकता मुहिम
मेरठ।
पर्यावरण के सबसे बड़े प्रहरी माने जाने वाले कछुओं को बचाने के लिए अब गंगा के किनारे बसने वाले किसान आगे आ रहे हैं। उन्होंने मुहिम के तहत रेत से कछुओं के अंडों को निकालकर सुरक्षित हैचरी तक पहुंचाने का काम भी शुरू किया है। साथ ही कछुओं का प्रजनन सही तरीके से हो सके, इसके लिए वह गंगा किनारे 40 मीटर जगह छोड़कर खेती कर रहे हैं। विश्व प्रकृति निधि भारत द्वारा हस्तिनापुर में बनाए गए तालाब में आजकल करीब 850 कछुए के बच्चे अठखेलियां कर रहे हैं। ये पिछले महीने ही अंडों से निकले हैं। इन बच्चों को कुछ दिन यहां रखने के बाद गंगा में छोड़ दिया जाएगा।
विश्व प्रकृति निधि की ओर से कछुआ संरक्षण कार्यक्रम एक पहल सहभागिता से संरक्षण की शुरुआत मुहिम के तहत अब दो हजार कछुओं को गंगा में छोड़ा जा चुका है। सीनियर को-आर्डिनेटर संजीव यादव बताते हैं कि बिजनौर, मेरठ, हापुड़, अमरोहा और बुलंदशहर के छह सौ के करीब किसानों को वे इस अभियान से जोड़ चुके हैं। संस्था लगातार किसानों को जागरूक करने के लिए मुहिम चला रही है। उन्होेंने बताया कि पांचों जिलों से एकत्र होने वाले अंडों को हस्तिनापुर और बुलंदशहर में बनाई गई हैचरी में रखा जाता है। यहां अंडों से बच्चे निकलने के बाद इन्हें तालाब में शिफ्ट कर दिया जाता है।
नदी किनारे रेत में अंडे देते हैं कछुए
कछुए अक्टूबर से मार्च माह के बीच अंडे देते हैं। इसके लिए वे नदी के किनारों से 40-50 मीटर दूर छोटा गड्ढा खोदते हैं। वह अंडों के लिए जरूरी तापमान का भी ख्याल रखते हैं। एक कछुआ एक बार में चार से 30 अंडे तक देता है। अंडे देने के बाद कछुआ उसके ऊपर मिट्टी डालकर नदी में चला जाता है। इस दौरान कुछ अंडे बाढ़ की भेंट चढ़ जाते हैं तो कुछ को जंगली जानवर खा जाते हैं। गंगा किनारे की खाली जमीन पर जो लोग सब्जी उगाते हैं, उनकी खुदाई में भी कुछ अंडे नष्ट हो जाते हैं।
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जागरूकता से शुरू हुआ बचाव
लेकिन अब गंगा किनारे रहने वाले किसान जागरूक हो चले हैं। कछुओं के इन घोंसलों का पता लगने पर वह अंडों को वहां से निकालकर हैचरी तक पहुंचाते हैं। इसके बाद विश्व प्रकृति निधि के सदस्यों द्वारा इन्हें उचित तापमान में हैचरी में रखा जाता है। मई के आखिरी सप्ताह से जून के प्रथम सप्ताह के बीच इन अंडों से बच्चे निकल आते हैं। इसके बाद इन्हें हस्तिनापुर में बनाए गए तालाब में रखा जाता है।
गंगा में हैं कछुओं की 15 प्रजातियां
विश्व में कछुओं की 300 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं। भारत में 29 प्रजातियां मिलती हैं। उप्र में गंगा में कछुओं की 15 प्रजातियां हैं। इनमें सात प्रजातियां सिड्यूल वन में हैं। ये विलुप्त होने के कगार पर हैं। बता दें कि कछुए नदी को साफ करने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं।
किसान हो रहे जागरूक
विश्व प्रकृति निधि के सीनियर का-आर्डिनेटर संजीव यादव बताते हैं कि पांच साल के डाटा का आकलन कराए जाने पर कई जगह पर गंगा के किनारे फसल उगाने वालों ने अब 40 मीटर तक जगह छोड़ना शुरू कर दिया है। इससे प्राकृतिक ढंग से बड़ी संख्या में कछुओं के अंडों से हैचिंग होगी। अक्टूबर से एक ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू कर रहे हैं। इसमें ये सिखाया जाएगा कि कछुए का घोंसला मिले तो क्या करें। कैसे उसे हैचरी तक सुरक्षित पहुंचाएं। डीएफओ अदिति शर्मा बताती हैं कि गंगा किनारे के गांवों में किसानों को लगातार इसके लिए जागरूक किया जाता है कि गंगा में जीवों के संरक्षण में अपनी भूमिका निभाएं।
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हैचरी में अंडों से निकले 850 कछुए कर रहे हस्तिनापुर के तालाब में अठखेलियां
पांच गांवों के 600 किसानों संग विश्व प्रकृति निधि भारत ने छेड़ी जागरूकता मुहिम
मेरठ।
पर्यावरण के सबसे बड़े प्रहरी माने जाने वाले कछुओं को बचाने के लिए अब गंगा के किनारे बसने वाले किसान आगे आ रहे हैं। उन्होंने मुहिम के तहत रेत से कछुओं के अंडों को निकालकर सुरक्षित हैचरी तक पहुंचाने का काम भी शुरू किया है। साथ ही कछुओं का प्रजनन सही तरीके से हो सके, इसके लिए वह गंगा किनारे 40 मीटर जगह छोड़कर खेती कर रहे हैं। विश्व प्रकृति निधि भारत द्वारा हस्तिनापुर में बनाए गए तालाब में आजकल करीब 850 कछुए के बच्चे अठखेलियां कर रहे हैं। ये पिछले महीने ही अंडों से निकले हैं। इन बच्चों को कुछ दिन यहां रखने के बाद गंगा में छोड़ दिया जाएगा।
विश्व प्रकृति निधि की ओर से कछुआ संरक्षण कार्यक्रम एक पहल सहभागिता से संरक्षण की शुरुआत मुहिम के तहत अब दो हजार कछुओं को गंगा में छोड़ा जा चुका है। सीनियर को-आर्डिनेटर संजीव यादव बताते हैं कि बिजनौर, मेरठ, हापुड़, अमरोहा और बुलंदशहर के छह सौ के करीब किसानों को वे इस अभियान से जोड़ चुके हैं। संस्था लगातार किसानों को जागरूक करने के लिए मुहिम चला रही है। उन्होेंने बताया कि पांचों जिलों से एकत्र होने वाले अंडों को हस्तिनापुर और बुलंदशहर में बनाई गई हैचरी में रखा जाता है। यहां अंडों से बच्चे निकलने के बाद इन्हें तालाब में शिफ्ट कर दिया जाता है।
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नदी किनारे रेत में अंडे देते हैं कछुए
कछुए अक्टूबर से मार्च माह के बीच अंडे देते हैं। इसके लिए वे नदी के किनारों से 40-50 मीटर दूर छोटा गड्ढा खोदते हैं। वह अंडों के लिए जरूरी तापमान का भी ख्याल रखते हैं। एक कछुआ एक बार में चार से 30 अंडे तक देता है। अंडे देने के बाद कछुआ उसके ऊपर मिट्टी डालकर नदी में चला जाता है। इस दौरान कुछ अंडे बाढ़ की भेंट चढ़ जाते हैं तो कुछ को जंगली जानवर खा जाते हैं। गंगा किनारे की खाली जमीन पर जो लोग सब्जी उगाते हैं, उनकी खुदाई में भी कुछ अंडे नष्ट हो जाते हैं।
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जागरूकता से शुरू हुआ बचाव
लेकिन अब गंगा किनारे रहने वाले किसान जागरूक हो चले हैं। कछुओं के इन घोंसलों का पता लगने पर वह अंडों को वहां से निकालकर हैचरी तक पहुंचाते हैं। इसके बाद विश्व प्रकृति निधि के सदस्यों द्वारा इन्हें उचित तापमान में हैचरी में रखा जाता है। मई के आखिरी सप्ताह से जून के प्रथम सप्ताह के बीच इन अंडों से बच्चे निकल आते हैं। इसके बाद इन्हें हस्तिनापुर में बनाए गए तालाब में रखा जाता है।
गंगा में हैं कछुओं की 15 प्रजातियां
विश्व में कछुओं की 300 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं। भारत में 29 प्रजातियां मिलती हैं। उप्र में गंगा में कछुओं की 15 प्रजातियां हैं। इनमें सात प्रजातियां सिड्यूल वन में हैं। ये विलुप्त होने के कगार पर हैं। बता दें कि कछुए नदी को साफ करने में सबसे अहम भूमिका निभाते हैं।
किसान हो रहे जागरूक
विश्व प्रकृति निधि के सीनियर का-आर्डिनेटर संजीव यादव बताते हैं कि पांच साल के डाटा का आकलन कराए जाने पर कई जगह पर गंगा के किनारे फसल उगाने वालों ने अब 40 मीटर तक जगह छोड़ना शुरू कर दिया है। इससे प्राकृतिक ढंग से बड़ी संख्या में कछुओं के अंडों से हैचिंग होगी। अक्टूबर से एक ट्रेनिंग प्रोग्राम शुरू कर रहे हैं। इसमें ये सिखाया जाएगा कि कछुए का घोंसला मिले तो क्या करें। कैसे उसे हैचरी तक सुरक्षित पहुंचाएं। डीएफओ अदिति शर्मा बताती हैं कि गंगा किनारे के गांवों में किसानों को लगातार इसके लिए जागरूक किया जाता है कि गंगा में जीवों के संरक्षण में अपनी भूमिका निभाएं।