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मेडिकल में 89 रक्तदाताओं का खून निकला संक्रमित
Updated Thu, 05 Jul 2018 03:04 AM IST
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दो को एचआईवी, 87 हेपेटाइटिस के शिकार
मेडिकल कॉलेज में 89 रक्तदाताओं का खून निकला संक्रमित
जांच में बीमारी का हुआ खुलासा, शुरू किया गया इलाज
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में रक्तदान करने वाले 89 रक्तदाताओं का खून संक्रमित निकला है। इनमें दो एचआईवी पॉजिटिव हैं, जबकि 49 हेपेटाइटिस सी और 38 हेपेटाइटिस बी के मरीज मिले हैं। जांच में बीमारी का खुलासा होने पर इनके खून को नष्ट कर इनका इलाज शुरू कर दिया गया है।
मेडिकल अस्पताल के ब्लड बैंक में एक जनवरी 2018 से लेकर 31 मई 2018 तक 2562 यूनिट रक्तदान हुआ। इनमें से 89 यूनिट रक्त संक्रमित निकला है। जनवरी माह में 19 हेपेटाइटिस सी, सात हेपेटाइटिस बी के मरीज थे। फरवरी में सात हेपेटाइटिस सी और आठ हेपेटाइटिस बी के मरीज। इसी तरह मार्च में 12 हेपेटाइटिस सी, पांच हेपेटाइटिस बी, अप्रैल में तीन हेपेटाइटिस सी, सात हेपेटाइटिस बी, मई में आठ हेपेटाइटिस सी और 11 हेपेटाइटिस बी के मरीज मिले हैं। अप्रैल और मई माह में एक-एक एचआईवी पॉजिटिव भी मिला है। इनमें से काफी खून वह भी है, जो रक्तदान शिविर लगाने के दौरान आया था।
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रक्तदान करने का हुआ फायदा
रक्तदान के बाद रक्त की जांच की जाती है, जो व्यक्ति रोगी पाए जाते हैं, उनके खून को नष्ट कर दिया जाता है। इन रक्तदाताओं को अस्पताल बुलाया जाता है। उन्हें उनके खून की रिपोर्ट के बारे में बताया जाता है और फिर उनका इलाज किया जाता है। संक्रमित व्यक्तियों में अधिकांश 20 से 40 उम्र के हैं। इन रोगियों को खून की जांच होने से पहले जानकारी नहीं थी कि वे इन बीमारियों से ग्रसित हैं। इन्हें रक्तदान करने का फायदा मिला है।
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- डॉ. अजीत चौधरी, सीएमएस, मेडिकल कॉलेज
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एचआईवी क्या है
एचआईवी (ह्यूमेन इम्यूनो डिफिशिएंसी सिंड्रोम) एक ऐसा वायरस है, जिसकी वजह से एड्स होता है। यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलता है। जिस इंसान में इस वायरस की मौजूदगी होती है, उसे एचआईवी पॉजिटिव कहते हैं। आमतौर पर लोग एचआईवी पॉजिटिव होने का मतलब ही एड्स समझने लगते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। एचआईवी के शरीर में दाखिल होने के बाद प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। शरीर पर तरह-तरह की बीमारियों की गिरफ्त में आने लगता है। एचआईवी पॉजिटिव होने के करीब 8-10 साल बाद इन तमाम बीमारियों के लक्षण दिखने शुरू हो जाते हैं। इस स्थिति को ही एड्स कहा जाता है।
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हेपेटाइटिस-सी क्या है
हेपेटाइटिस-सी (यकृतशोथ ग) इसे काला पीलिया भी कहते हैं। यह एक संक्रामक रोग है, जो हेपेटाइटिस-सी वायरस एचसीवी की वजह से होता है। यह यकृत को प्रभावित करता है। यह वायरस रक्त से रक्त के संपर्क द्वारा फैलता है। इलाज और देखभाल से यह ठीक हो जाता है।
इलाज- इस बीमारी का पता शुरू में नहीं लग पाता। इस कारण यह जानलेवा हो जाती है। इसके इलाज में करीब 80 हजार रुपये का खर्च आता है। जिला अस्पताल में इसका इलाज निशुल्क किया जा रहा है।
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हेपेटाइटिस-बी
हेपेटाइटिस-बी (यकृतशोथ बी) एक संक्रामक बीमारी है। इसके कारण लीवर की सूजन और जलन पैदा होती है। इसके वायरस का संचरण संक्रमित रक्त या शरीर के तरल पदार्थ के संपर्क में जाने से होता है।
इलाज- इसका इलाज वायरस रोधी दवाओं से किया जाता है। ये दवाएं खून में वायरस की मात्रा घटा सकती हैं या उन्हें हटा सकती हैं। इससे लीवर सिरोसिस या लीवर कैंसर होने का खतरा कम हो जाता है।
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यह हैं कारण
हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमण के कारण लगभग वहीं हैं जो एचआईवी संक्रमण के होते हैं। इन बातों से बचाव करने से इन बीमारियों से काफी हद तक बचा जा सकता है। कोई भी ऐसा कार्य या गतिविधि जिसमें खून से खून का संपर्क होने की संभावना है, संक्रमण का संभावित स्रोत हो सकता है। जैसे- दूषित सिरिंज का उपयोग करना, दूषित रेजर या टूथब्रश, दूषित रक्तदान, अंगदान या लंबे समय तक डायलिसिस, दूषित सुई से टैटू बनवाना या एक्युपंचर करवाना, असुरक्षित यौन संबंध और इंजेक्शन से नशीली दवाओं का प्रयोग करना एचसीवी संक्रमण का सबसे आम रास्ता है।
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मेडिकल कॉलेज में 89 रक्तदाताओं का खून निकला संक्रमित
जांच में बीमारी का हुआ खुलासा, शुरू किया गया इलाज
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक में रक्तदान करने वाले 89 रक्तदाताओं का खून संक्रमित निकला है। इनमें दो एचआईवी पॉजिटिव हैं, जबकि 49 हेपेटाइटिस सी और 38 हेपेटाइटिस बी के मरीज मिले हैं। जांच में बीमारी का खुलासा होने पर इनके खून को नष्ट कर इनका इलाज शुरू कर दिया गया है।
मेडिकल अस्पताल के ब्लड बैंक में एक जनवरी 2018 से लेकर 31 मई 2018 तक 2562 यूनिट रक्तदान हुआ। इनमें से 89 यूनिट रक्त संक्रमित निकला है। जनवरी माह में 19 हेपेटाइटिस सी, सात हेपेटाइटिस बी के मरीज थे। फरवरी में सात हेपेटाइटिस सी और आठ हेपेटाइटिस बी के मरीज। इसी तरह मार्च में 12 हेपेटाइटिस सी, पांच हेपेटाइटिस बी, अप्रैल में तीन हेपेटाइटिस सी, सात हेपेटाइटिस बी, मई में आठ हेपेटाइटिस सी और 11 हेपेटाइटिस बी के मरीज मिले हैं। अप्रैल और मई माह में एक-एक एचआईवी पॉजिटिव भी मिला है। इनमें से काफी खून वह भी है, जो रक्तदान शिविर लगाने के दौरान आया था।
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रक्तदान करने का हुआ फायदा
रक्तदान के बाद रक्त की जांच की जाती है, जो व्यक्ति रोगी पाए जाते हैं, उनके खून को नष्ट कर दिया जाता है। इन रक्तदाताओं को अस्पताल बुलाया जाता है। उन्हें उनके खून की रिपोर्ट के बारे में बताया जाता है और फिर उनका इलाज किया जाता है। संक्रमित व्यक्तियों में अधिकांश 20 से 40 उम्र के हैं। इन रोगियों को खून की जांच होने से पहले जानकारी नहीं थी कि वे इन बीमारियों से ग्रसित हैं। इन्हें रक्तदान करने का फायदा मिला है।
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- डॉ. अजीत चौधरी, सीएमएस, मेडिकल कॉलेज
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एचआईवी क्या है
एचआईवी (ह्यूमेन इम्यूनो डिफिशिएंसी सिंड्रोम) एक ऐसा वायरस है, जिसकी वजह से एड्स होता है। यह वायरस एक इंसान से दूसरे इंसान में फैलता है। जिस इंसान में इस वायरस की मौजूदगी होती है, उसे एचआईवी पॉजिटिव कहते हैं। आमतौर पर लोग एचआईवी पॉजिटिव होने का मतलब ही एड्स समझने लगते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। एचआईवी के शरीर में दाखिल होने के बाद प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है। शरीर पर तरह-तरह की बीमारियों की गिरफ्त में आने लगता है। एचआईवी पॉजिटिव होने के करीब 8-10 साल बाद इन तमाम बीमारियों के लक्षण दिखने शुरू हो जाते हैं। इस स्थिति को ही एड्स कहा जाता है।
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हेपेटाइटिस-सी क्या है
हेपेटाइटिस-सी (यकृतशोथ ग) इसे काला पीलिया भी कहते हैं। यह एक संक्रामक रोग है, जो हेपेटाइटिस-सी वायरस एचसीवी की वजह से होता है। यह यकृत को प्रभावित करता है। यह वायरस रक्त से रक्त के संपर्क द्वारा फैलता है। इलाज और देखभाल से यह ठीक हो जाता है।
इलाज- इस बीमारी का पता शुरू में नहीं लग पाता। इस कारण यह जानलेवा हो जाती है। इसके इलाज में करीब 80 हजार रुपये का खर्च आता है। जिला अस्पताल में इसका इलाज निशुल्क किया जा रहा है।
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हेपेटाइटिस-बी
हेपेटाइटिस-बी (यकृतशोथ बी) एक संक्रामक बीमारी है। इसके कारण लीवर की सूजन और जलन पैदा होती है। इसके वायरस का संचरण संक्रमित रक्त या शरीर के तरल पदार्थ के संपर्क में जाने से होता है।
इलाज- इसका इलाज वायरस रोधी दवाओं से किया जाता है। ये दवाएं खून में वायरस की मात्रा घटा सकती हैं या उन्हें हटा सकती हैं। इससे लीवर सिरोसिस या लीवर कैंसर होने का खतरा कम हो जाता है।
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यह हैं कारण
हेपेटाइटिस बी और सी संक्रमण के कारण लगभग वहीं हैं जो एचआईवी संक्रमण के होते हैं। इन बातों से बचाव करने से इन बीमारियों से काफी हद तक बचा जा सकता है। कोई भी ऐसा कार्य या गतिविधि जिसमें खून से खून का संपर्क होने की संभावना है, संक्रमण का संभावित स्रोत हो सकता है। जैसे- दूषित सिरिंज का उपयोग करना, दूषित रेजर या टूथब्रश, दूषित रक्तदान, अंगदान या लंबे समय तक डायलिसिस, दूषित सुई से टैटू बनवाना या एक्युपंचर करवाना, असुरक्षित यौन संबंध और इंजेक्शन से नशीली दवाओं का प्रयोग करना एचसीवी संक्रमण का सबसे आम रास्ता है।