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मेरठ में खुद को बचा नहीं पाई चालाक लोमड़ी
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मेरठ में खुद को बचा नहीं पाई चालाक लोमड़ी
जिले से विलुप्त हो गई रेड फॉक्स, बागपत में भी खत्म हो चुका अस्तित्व
जमीन के बदलते इस्तेमाल और आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या बनी कारण
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार बुलंदशहर में हैं 59 लोमड़ी
सचिन त्यागी
मेरठ। किताबों-कहानियों में जिस लोमड़ी की चालाकी के किस्से बयां किए जाते हैं, वो लोमड़ी खुद को बदलती परिस्थितियों में नहीं ढालने के कारण आज विलुप्प्त होने के कगार पर पहुंच गई है। कहीं इंसान ने उसके रहवास को खत्म कर दिया तो कहीं वो बढ़ते आवारा कुत्तों का शिकार हो गई। मेरठ और बागपत में तो लोमड़ी पूरी तरह से खत्म हो गई है।
लोमड़ी को खाने में जो चीजें पसंद हैं, उनकी मेरठ और बागपत में भरमार है। इसके बाद भी लोमड़ी यहां से खत्म हो गई है। कई जिलों में डीएफओ रहे वन्य जीव सलाहकार जीएस खुसारिया बताते हैं कि उन्होंने आखिर बार साल 2007 में बागपत में नदी क्षेत्र के पास एक लोमड़ी देखी थी। इसके बाद इस क्षेत्र में कहीं लोमड़ी नहीं देखी। लोमड़ी के बारे में जो गणनाएं हुई हैं, वे कितनी ठीक हैं, इसके बारे में भी स्पष्ट नहीं बताया जा सकता है। वे बताते हैं कि लोमड़ी और गीदड़ दूर से एक जैसे ही दिखते हैं। ऐसे में कई बार लोग गीदड़ को भी लोमड़ी समझ लेते हैं। इनमें फर्क ये होता है कि लोमड़ी के पैरों के निशान अलग होते हैं। गीदड़ का मुंह छोटा होता है, जबकि लोमड़ी का माथा काफी चौड़ा होता है। गीदड़ की पीठ का रंग बदलता रहता है, जबकि यहां पाई जाने वाली रेड फॉक्स का रंग नहीं बदलता। वो लाल रंग ही रहता है। लोमड़ी की नाक नुकीली, पूंछ झबरी और आंखें बहुत तेज होती हैं। ये दौड़ती भी काफी तेज है। लोमड़ी की पांच प्रजातियां पाई जाती हैं। इस क्षेत्र में रेड फॉक्स ही दिखती थी। इसका आकार दूसरी लोमड़ियों से बड़ा होता है। लोमड़ी की उम्र दो से पांच साल तक है।
मांद टूट जाए, तो नहीं करती प्रजनन
जीएस खुसारिया बताते हैं कि लोमड़ी की संख्या कम होने के पीछे कुछ दूसरे प्रमुख कारण भी हैं। दरअसल, लोमड़ी एक ही मांद बनाकर उसमें ही सालों तक बच्चों को जन्म देती है। अगर वो मांद टूट जाती है, तो फिर वो दूसरी मांद बहुत कम बनाती है। लोमड़ी की गर्भावस्था का समय 50 से 60 दिन तक का रहता है। इसका प्रजनन ऋतुकाल तीन या चार दिन ही होता है। इस वजह से लोमड़ी का परिवार कम बढ़ता है। मेरठ की जमीन के इस्तेमाल में काफी बदलाव हुआ है, ऐसे में लोमड़ी का रहवास प्रभावित हुआ।
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कुत्तों की बढ़ती संख्या भी प्रमुख वजह
लोमड़ी मार्च से मई महीने के बीच बच्चों को जन्म देती है, जो अकसर वेस्ट यूपी में फसलों के कटने का समय रहता है। ऐसे में खेत खाली होने के बाद आवारा कुत्तों को लोमड़ी और उसके बच्चों का शिकार करने का आसान मौका मिल जाता है। यही वजह है कि लोमड़ी का परिवार यहां बढ़ नहीं पाया। मेरठ में कमेले और गंदगी के कारण कुत्तों की संख्या बढ़ती जा रही है। यह भी लोमड़ी के खत्म होने का कारण है।
छोटे जीव और फल भी पसंद करती है लोमड़ी
लोमड़ी छोटे जीवों जैसे चूहे, मेंढ़क, गिरगिट, खरगोश, गिलहरी, जंगली मुर्गी, तीतर, बटेर, फल, मछली, पक्षी, अंडे, छोटे पक्षी और कीड़े मकोड़े, केंचुए आदि खाती है। लोमड़ी की जरूरत एक दिन में आम तौर पर 1 किलोग्राम भोजन की है। यह किसी दूसरे बड़े जानवर द्वारा छोड़े गए शिकार को भी बहुत पसंद करती है। लोमड़ी रात को शिकार करती है। आमतौर पर शर्मीली होने के कारण लोमड़ी इंसान पर हमला नहीं करती। लेकिन जब रैबीज का असर हो जाता है तो हमला कर देती है। हालांकि ऐसा बहुत कम होता है।
मेरठ कॉलेज के जूलॉजी म्यूजियम में देख सकते हैं
मेरठ कॉलेज के जूलॉजी म्यूजियम में कई दशकों से एक मृत लोमड़ी को संरक्षित करके रखा गया है। यह लोमड़ी पश्चिम बंगाल के इलाकों में पाई जाती है।
लोमड़ी की संख्या - 2013 -2016
मेरठ - 00 - 00
बागपत -00 -00
गाजियाबाद - 10 -08
हापुड़ - 14 - 12
गौतमबुद्धनगर - 19 - 12
बुलंदशहर - 72 - 59
कुल - 115 - 91
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जिले से विलुप्त हो गई रेड फॉक्स, बागपत में भी खत्म हो चुका अस्तित्व
जमीन के बदलते इस्तेमाल और आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या बनी कारण
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार बुलंदशहर में हैं 59 लोमड़ी
सचिन त्यागी
मेरठ। किताबों-कहानियों में जिस लोमड़ी की चालाकी के किस्से बयां किए जाते हैं, वो लोमड़ी खुद को बदलती परिस्थितियों में नहीं ढालने के कारण आज विलुप्प्त होने के कगार पर पहुंच गई है। कहीं इंसान ने उसके रहवास को खत्म कर दिया तो कहीं वो बढ़ते आवारा कुत्तों का शिकार हो गई। मेरठ और बागपत में तो लोमड़ी पूरी तरह से खत्म हो गई है।
लोमड़ी को खाने में जो चीजें पसंद हैं, उनकी मेरठ और बागपत में भरमार है। इसके बाद भी लोमड़ी यहां से खत्म हो गई है। कई जिलों में डीएफओ रहे वन्य जीव सलाहकार जीएस खुसारिया बताते हैं कि उन्होंने आखिर बार साल 2007 में बागपत में नदी क्षेत्र के पास एक लोमड़ी देखी थी। इसके बाद इस क्षेत्र में कहीं लोमड़ी नहीं देखी। लोमड़ी के बारे में जो गणनाएं हुई हैं, वे कितनी ठीक हैं, इसके बारे में भी स्पष्ट नहीं बताया जा सकता है। वे बताते हैं कि लोमड़ी और गीदड़ दूर से एक जैसे ही दिखते हैं। ऐसे में कई बार लोग गीदड़ को भी लोमड़ी समझ लेते हैं। इनमें फर्क ये होता है कि लोमड़ी के पैरों के निशान अलग होते हैं। गीदड़ का मुंह छोटा होता है, जबकि लोमड़ी का माथा काफी चौड़ा होता है। गीदड़ की पीठ का रंग बदलता रहता है, जबकि यहां पाई जाने वाली रेड फॉक्स का रंग नहीं बदलता। वो लाल रंग ही रहता है। लोमड़ी की नाक नुकीली, पूंछ झबरी और आंखें बहुत तेज होती हैं। ये दौड़ती भी काफी तेज है। लोमड़ी की पांच प्रजातियां पाई जाती हैं। इस क्षेत्र में रेड फॉक्स ही दिखती थी। इसका आकार दूसरी लोमड़ियों से बड़ा होता है। लोमड़ी की उम्र दो से पांच साल तक है।
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मांद टूट जाए, तो नहीं करती प्रजनन
जीएस खुसारिया बताते हैं कि लोमड़ी की संख्या कम होने के पीछे कुछ दूसरे प्रमुख कारण भी हैं। दरअसल, लोमड़ी एक ही मांद बनाकर उसमें ही सालों तक बच्चों को जन्म देती है। अगर वो मांद टूट जाती है, तो फिर वो दूसरी मांद बहुत कम बनाती है। लोमड़ी की गर्भावस्था का समय 50 से 60 दिन तक का रहता है। इसका प्रजनन ऋतुकाल तीन या चार दिन ही होता है। इस वजह से लोमड़ी का परिवार कम बढ़ता है। मेरठ की जमीन के इस्तेमाल में काफी बदलाव हुआ है, ऐसे में लोमड़ी का रहवास प्रभावित हुआ।
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कुत्तों की बढ़ती संख्या भी प्रमुख वजह
लोमड़ी मार्च से मई महीने के बीच बच्चों को जन्म देती है, जो अकसर वेस्ट यूपी में फसलों के कटने का समय रहता है। ऐसे में खेत खाली होने के बाद आवारा कुत्तों को लोमड़ी और उसके बच्चों का शिकार करने का आसान मौका मिल जाता है। यही वजह है कि लोमड़ी का परिवार यहां बढ़ नहीं पाया। मेरठ में कमेले और गंदगी के कारण कुत्तों की संख्या बढ़ती जा रही है। यह भी लोमड़ी के खत्म होने का कारण है।
छोटे जीव और फल भी पसंद करती है लोमड़ी
लोमड़ी छोटे जीवों जैसे चूहे, मेंढ़क, गिरगिट, खरगोश, गिलहरी, जंगली मुर्गी, तीतर, बटेर, फल, मछली, पक्षी, अंडे, छोटे पक्षी और कीड़े मकोड़े, केंचुए आदि खाती है। लोमड़ी की जरूरत एक दिन में आम तौर पर 1 किलोग्राम भोजन की है। यह किसी दूसरे बड़े जानवर द्वारा छोड़े गए शिकार को भी बहुत पसंद करती है। लोमड़ी रात को शिकार करती है। आमतौर पर शर्मीली होने के कारण लोमड़ी इंसान पर हमला नहीं करती। लेकिन जब रैबीज का असर हो जाता है तो हमला कर देती है। हालांकि ऐसा बहुत कम होता है।
मेरठ कॉलेज के जूलॉजी म्यूजियम में देख सकते हैं
मेरठ कॉलेज के जूलॉजी म्यूजियम में कई दशकों से एक मृत लोमड़ी को संरक्षित करके रखा गया है। यह लोमड़ी पश्चिम बंगाल के इलाकों में पाई जाती है।
लोमड़ी की संख्या - 2013 -2016
मेरठ - 00 - 00
बागपत -00 -00
गाजियाबाद - 10 -08
हापुड़ - 14 - 12
गौतमबुद्धनगर - 19 - 12
बुलंदशहर - 72 - 59
कुल - 115 - 91