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अस्पतालों में आग लगी तो होगा केजीएमयू जैसा हाल
Updated Mon, 17 Jul 2017 02:58 AM IST
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सरकारी अस्पतालों में आग लगी तो होगा बुरा हाल
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। लखनऊ केजीएमयू के ट्रामा सेंटर जैसी आग अगर मेरठ के सरकारी अस्पतालों में लग गई तो यहां के हालात और भी भयावह हो सकते हैं। दरअसल, मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल और महिला जिला चिकित्सालय में आग बुझाने के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। सिर्फ दीवारों पर लटके अग्निशमन यंत्र का सहारा है। इस अग्निशमन यंत्र को चलाने के लिए स्टाफ को ट्रेनिंग भी नहीं दी गई है। कई अग्निशमन यंत्र बेकार हो चुके हैं और कई की इस्तेमाल किए जाने की तारीख खत्म होने के नजदीक है। इसके अलावा इन अस्पतालों में न फायर अलार्म ठीक हैं और न ही आग बुझाने के लिए पानी की कोई खास व्यवस्था है।
अग्निशमन यंत्र से मामूली आग पर तो काबू पाया जा सकता है, लेकिन अगर आग बड़ी हो गई तो इनसे काबू पाना मुमकिन नहीं है। कई यंत्र तो ऐसे हैं, जिनकी रिफिलिंग भी कई साल पहले हुई है। आपातकाल की स्थिति में इस अग्निशमन यंत्र को चलाने वाला भी ढूंढना पडे़गा। पानी के अलावा आग बुझाने के लिए रेत की भी व्यवस्था होती है, वह भी तीनों जगह नहीं है। ऐसे में आग लगने पर जनहानि की आशंका बनी हुई है। तीनों अस्पतालों के पास आपातकाल में मरीजों को बाहर निकालने के लिए कोई एक्शन प्लान नहीं है। गौरतलब है कि लखनऊ किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के ट्रामा सेंटर में शनिवार को आग लगने से पांच लोगों की मौत हो गई थी। उपकरणों की जांच कब हुई, यह अस्पताल के कर्मचारियों को पता नहीं है।
मेडिकल कॉलेज
मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी और ट्रामा सेंटर में फायर फाइटिंग सिस्टम हैं और अग्निशमन यंत्र हैं, लेकिन अस्पताल और कॉलेज की चार मंजिला पुरानी बिल्डिंग में सिर्फ अग्निशमन यंत्र ही हैं। अस्पताल में करीब 500 से 600 मरीज हर रोज भर्ती रहते हैं, जबकि 2500 से 3000 की ओपीडी रहती है। सैकड़ों तीमारदार भी रहते हैं। मेडिकल कॉलेज के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सचिन कुमार ने बताया कि मेडिकल में फायर फाइटिंग सिस्टम के जरिए आग बुझाने के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं। इसके लिए बोरिंग कर पूरी बिल्डिंग में पाइप लाइन बिछाई जा रही है, जिससे आग लगने पर काबू पाया जा सके। तीन महीने से काम चल रहा है। जल्द ही इसे पूरा कर लिया जाएगा। उन्होंने बताया कि मेडिकल में करीब 400 अग्निशमन यंत्र हैं।
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जिला अस्पताल
जिला अस्पताल में 150 से 200 मरीज भर्ती रहते हैं, जबकि 1500 से 2000 तक ओपीडी रहती है। यहां भी तीमारदार सैकड़ों की संख्या में रहते हैं। लेकिन यहां महज 50 ही अग्निशमन यंत्र हैं। जिला अस्पताल के प्रमुख अधीक्षक (एसआईसी) डॉ. पीके बंसल ने बताया कि पहले यहां फायर फाइटिंग सिस्टम था, मगर पाइप लाइन में लगे पीतल के क्लिप चोरी कर लिए गए थे। फायर फाइटिंग सिस्टम के लिए एक प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया है, जिसमें आग बुझाने केलिए ट्रेंड कर्मचारियों की भी मांग की गई है। शासन की अनुमति का इंतजार है।
महिला जिला अस्पताल
महिला जिला अस्पताल में एक हजार से ज्यादा महिलाएं और तीमारदार हर रोज आते हैं। यहां भी आग बुझाने के लिए सिर्फ अग्निशमन यंत्र हैं। महिला जिला अस्पताल की प्रमुख अधीक्षक (एसआईसी) डॉ. मंजू ने बताया कि कुछ दिन पहले अग्निशमन विभाग की टीम आई थी, जो यहां का निरीक्षण करके गई थी। उन्होंने अग्निशमन यंत्र रखने के लिए कहा था, जो मंगा लिए गए हैं। अब यहां 20 अग्निशमन यंत्र हैं।
अधिकांश निजी अस्पतालों का भी बुरा हाल
जिले के अधिकांश निजी अस्पतालों का भी बुरा हाल है। अधिकारियों की लापरवाही के कारण आग बुझाने के पुख्ता इंतजाम नहीं होने के बावजूद ये चल रहे हैं, जबकि वर्ष 2013 में ही सरकार ने नर्सिंग होम और निजी अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन लेने में भी आग बुझाने के पुख्ता इंतजाम होना अनिवार्य कर दिया गया था।
खास बातें
मेडिकल और जिला अस्पताल में नहीं हैं फायर फाइटिंग सिस्टम
आग बुझाने के लिए सिर्फ अग्निशमन यंत्र का सहारा, स्टाफ को नहीं दी गई ट्रेनिंग
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अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। लखनऊ केजीएमयू के ट्रामा सेंटर जैसी आग अगर मेरठ के सरकारी अस्पतालों में लग गई तो यहां के हालात और भी भयावह हो सकते हैं। दरअसल, मेडिकल कॉलेज, जिला अस्पताल और महिला जिला चिकित्सालय में आग बुझाने के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। सिर्फ दीवारों पर लटके अग्निशमन यंत्र का सहारा है। इस अग्निशमन यंत्र को चलाने के लिए स्टाफ को ट्रेनिंग भी नहीं दी गई है। कई अग्निशमन यंत्र बेकार हो चुके हैं और कई की इस्तेमाल किए जाने की तारीख खत्म होने के नजदीक है। इसके अलावा इन अस्पतालों में न फायर अलार्म ठीक हैं और न ही आग बुझाने के लिए पानी की कोई खास व्यवस्था है।
अग्निशमन यंत्र से मामूली आग पर तो काबू पाया जा सकता है, लेकिन अगर आग बड़ी हो गई तो इनसे काबू पाना मुमकिन नहीं है। कई यंत्र तो ऐसे हैं, जिनकी रिफिलिंग भी कई साल पहले हुई है। आपातकाल की स्थिति में इस अग्निशमन यंत्र को चलाने वाला भी ढूंढना पडे़गा। पानी के अलावा आग बुझाने के लिए रेत की भी व्यवस्था होती है, वह भी तीनों जगह नहीं है। ऐसे में आग लगने पर जनहानि की आशंका बनी हुई है। तीनों अस्पतालों के पास आपातकाल में मरीजों को बाहर निकालने के लिए कोई एक्शन प्लान नहीं है। गौरतलब है कि लखनऊ किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के ट्रामा सेंटर में शनिवार को आग लगने से पांच लोगों की मौत हो गई थी। उपकरणों की जांच कब हुई, यह अस्पताल के कर्मचारियों को पता नहीं है।
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मेडिकल कॉलेज
मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी और ट्रामा सेंटर में फायर फाइटिंग सिस्टम हैं और अग्निशमन यंत्र हैं, लेकिन अस्पताल और कॉलेज की चार मंजिला पुरानी बिल्डिंग में सिर्फ अग्निशमन यंत्र ही हैं। अस्पताल में करीब 500 से 600 मरीज हर रोज भर्ती रहते हैं, जबकि 2500 से 3000 की ओपीडी रहती है। सैकड़ों तीमारदार भी रहते हैं। मेडिकल कॉलेज के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. सचिन कुमार ने बताया कि मेडिकल में फायर फाइटिंग सिस्टम के जरिए आग बुझाने के पुख्ता इंतजाम किए जा रहे हैं। इसके लिए बोरिंग कर पूरी बिल्डिंग में पाइप लाइन बिछाई जा रही है, जिससे आग लगने पर काबू पाया जा सके। तीन महीने से काम चल रहा है। जल्द ही इसे पूरा कर लिया जाएगा। उन्होंने बताया कि मेडिकल में करीब 400 अग्निशमन यंत्र हैं।
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जिला अस्पताल
जिला अस्पताल में 150 से 200 मरीज भर्ती रहते हैं, जबकि 1500 से 2000 तक ओपीडी रहती है। यहां भी तीमारदार सैकड़ों की संख्या में रहते हैं। लेकिन यहां महज 50 ही अग्निशमन यंत्र हैं। जिला अस्पताल के प्रमुख अधीक्षक (एसआईसी) डॉ. पीके बंसल ने बताया कि पहले यहां फायर फाइटिंग सिस्टम था, मगर पाइप लाइन में लगे पीतल के क्लिप चोरी कर लिए गए थे। फायर फाइटिंग सिस्टम के लिए एक प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा गया है, जिसमें आग बुझाने केलिए ट्रेंड कर्मचारियों की भी मांग की गई है। शासन की अनुमति का इंतजार है।
महिला जिला अस्पताल
महिला जिला अस्पताल में एक हजार से ज्यादा महिलाएं और तीमारदार हर रोज आते हैं। यहां भी आग बुझाने के लिए सिर्फ अग्निशमन यंत्र हैं। महिला जिला अस्पताल की प्रमुख अधीक्षक (एसआईसी) डॉ. मंजू ने बताया कि कुछ दिन पहले अग्निशमन विभाग की टीम आई थी, जो यहां का निरीक्षण करके गई थी। उन्होंने अग्निशमन यंत्र रखने के लिए कहा था, जो मंगा लिए गए हैं। अब यहां 20 अग्निशमन यंत्र हैं।
अधिकांश निजी अस्पतालों का भी बुरा हाल
जिले के अधिकांश निजी अस्पतालों का भी बुरा हाल है। अधिकारियों की लापरवाही के कारण आग बुझाने के पुख्ता इंतजाम नहीं होने के बावजूद ये चल रहे हैं, जबकि वर्ष 2013 में ही सरकार ने नर्सिंग होम और निजी अस्पतालों का रजिस्ट्रेशन लेने में भी आग बुझाने के पुख्ता इंतजाम होना अनिवार्य कर दिया गया था।
खास बातें
मेडिकल और जिला अस्पताल में नहीं हैं फायर फाइटिंग सिस्टम
आग बुझाने के लिए सिर्फ अग्निशमन यंत्र का सहारा, स्टाफ को नहीं दी गई ट्रेनिंग