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सिनौली उत्खनन: किस काल के कंकाल-BAGHPAT
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सिनौली उत्खनन - किस काल के हैं कंकाल, 13 साल बाद भी अनुत्तरित सवाल
बागपत। सिनौली में जिस तरह इतिहास की परतें खुल रही हैं, साफ हो रहा है कि यहां भी एक उन्नत सभ्यता के लोग रहते थे। साल 2006 में पहले चरण की खोदाई में मानव कंकाल, सोने के आभूषण, मृदभांड मिलने के बाद सिनौली सुर्खियों में आया था। तब खोदाई में 18 कब्रें मिलीं, इनमें कंकाल भी थे। पुरातत्व विभाग ने यहां मिले कंकाल के काल क्रम का पता लगाने की कोशिश की, लेकिन 13 साल बाद भी अभी तक जांच प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है। सिनौली में दूसरे और तीसरे चरण में भी कंकाल मिल रहे हैं। अनुमान के आधार इतिहासकार और पुरातत्वविद अलग अलग काल बता रहे हैं। बागपत ही बात करें तो हिंडन नदी के किनारे गुप्त कालीन, कुषाण कालीन और मुगल कालीन सभ्यता के अवशेष मिल चुके हैं। चंदायन और बरनावा में उत्खनन से यह साबित हुआ है कि यहां अलग-अलग संस्कृतियों का दौर गुजरा है। इसी तरह यमुना किनारे पर भी संकेत मिल रहे हैं, लेकिन इनकी खोज अभी अधूरी है। पश्चिम यूपी में गंगा, यमुना, हिंडन नदियों के किनारों पर भी सभ्यता आबाद थी। हिंडन किनारे बरनावा क्षेत्र में इसके प्रमाण भी मिले हैं। यमुना के नजदीक बसे सिनौली में मिले अवशेष प्राचीन संस्कृति की ओर इशारा कर रहे हैं, इन पर अभी शोध होना है।
सिनौली में आबाद थी हड़प्पा जैसी मानव संस्कृति
बागपत। सिनौली में तीसरी बार चल रहे उत्खनन में मानव कंकाल, तलवार और बड़ी मात्रा में मृदुभांड़ मिले हैं। अब तक के प्रमाणों से स्पष्ट है कि सिनौली में हड़प्पा काल जैसी संस्कृति के लोग रहते थे। तर्क यह भी दिया जाता है कि सिंधु और सरस्वती नदी के सूख जाने के कारण हड़प्पा संस्कृति के लोग पलायन कर सिनौली में आकर बस गए होंगे। अब तक सिनौली में चार हजार साल से अधिक पुराने प्रमाण नहीं मिले हैं। ऐसे में महाभारत काल की पुष्टि नहीं हो सकी है।
सिनौली में पहली बार उत्खनन में हड़प्पा कालीन कब्र गाह मिल, दूसरी बार योद्धा का कंकाल, ताबूत और प्राचीन रथ निकला। तीसरी बार चल रहे उत्खनन में मानव कंकाल, धनुष, तलवार और पशुओं के कंकाल यहां मिले हैं। तथ्य बताते हैं कि सिंधु और सरस्वती नदी का पानी सूख जाने के बाद वहां करीब नौ सौ साल तक सूखा पड़ा था। अनुमान लगाया जा रहा है कि नदी के सूख जाने के कारण हड़प्पा कालीन सभ्यता के लोगों ने पलायन किया और वह सिनौली व आसपास के क्षेत्र में आकर बस गए। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि हड़प्पा कालीन सभ्यता बेहद विकसित और शहरी रही, जबकि सिनौली में जो प्रमाण मिले हैं, वह ग्रामीण सभ्यता जैसे हैं। अनाज और दालें भी मिली हैं, जिससे पुष्टि हो रही है कि वह खेती करते थे। तर्क यह भी दिया जाता है कि हड़प्पा सभ्यता के समय हिंडन, गंगा और यमुना नदी के आसपास की सभ्यता भी विकसित हो चुकी थी। इतिहासकार महाभारत काल की संभावनाओं को खारिज करते हैं। भारतीय पुरातत्व संस्थान दिल्ली के निदेशक संजय मंजुल कहते हैं कि उत्खनन में महत्वपूर्ण चीजें मिली हैं, लेकिन इनके काल क्रम को लेकर शोध की जरूरत है। शोध के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा।
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घोड़े का रथ सिर्फ साढे़ तीन हजार साल पुराना : हबीब
बागपत। देश के जाने माने इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब कहते हैं कि बगैर शोध के काल क्रम निर्धारित नहीं किया जा सकता है। रथ की बात करें तो आर्य संस्कृति में घोड़े वाले रथ का प्रयोग शुरू हुआ। यह संस्कृति फली फूली। आर्य साढे़ तीन हजार साल पहले आए थे। इससे पहले बैल वाले रथ का प्रयोग किया जाता था। इसके तमाम प्रमाण हैं। सिनौली में किस काल का इतिहास है, इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। कई जगह मिलती जुलती सभ्यताएं भी विकसित हुई हैं। यह शोध का विषय है। लेकिन महाभारत काल के काल क्रम का तो अभी तक पता ही नहीं चला है।
बोले इतिहासकार, जो भी सभ्यता थी, बेहद विकसित थी
शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन कहते हैं कि सिनौली से देश का इतिहास बदलेगा। यहां महाभारतकाल के प्रमाण मिलने शुरू हो गए हैं। सिनौली और इसके आसपास की सभ्यता बेहद विकसित थी। इसकी विस्तृत छानबीन किए जाने की जरूरत है।
एमएम कॉलेज मोदीनगर के एसोसिएट प्रोफेसर केके शर्मा कहते हैं कि सिनौली के उत्खनन से इतिहास की कड़ी जुड़ेंगी। काल क्रम का पता लगाने के लिए पुरातत्व विभाग जांच करेगा, यह शोध का लंबा विषय है। लेकिन इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि यमुना किनारे जो भी सभ्यता रही होगी, वह बेहद विकसित थी।
मेरठ कॉलेज में इतिहास विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अर्चना कहती है कि पिछले वर्ष रथ मिलने से ही स्पष्ट हो गया था कि सिनौली एतिहासिक साइट है। शोध के बाद ही काल क्रम के विषय में कुछ कहा जा सकेगा।
दिगबंर जैन डिग्री कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. प्रज्ञान चौधरी का कहना है कि उत्खनन कार्य के दौरान महत्वपूर्ण पुरावेशष मिलने की सूचना प्राप्त हो रही है, लेकिन जब तक पुरातत्व विभाग से रिपोर्ट नहीं आती, तब तक यह किसी सभ्यता से जुड़ा हुआ है, यह सब कुछ कहना संभव नहीं है।
जमीन में छिपा शाही धनुष या कोई और शस्त्र
बागपत। तीसरे चरण के उत्खनन में अभी तक कई महत्वपूर्ण पुरावशेष मिल चुके हैं। शवाधान केंद्र की दीवार के निकट उत्खनन में धनुषनुमा चीज दिखाई दिए जाने की बात कही जा रही है, जिसकी पुष्टि एएसआई ने नहीं की है। बताया जा रहा है कि रथ की तरह इसे निकालकर दिल्ली ले जाया जाएगा।
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बागपत। सिनौली में जिस तरह इतिहास की परतें खुल रही हैं, साफ हो रहा है कि यहां भी एक उन्नत सभ्यता के लोग रहते थे। साल 2006 में पहले चरण की खोदाई में मानव कंकाल, सोने के आभूषण, मृदभांड मिलने के बाद सिनौली सुर्खियों में आया था। तब खोदाई में 18 कब्रें मिलीं, इनमें कंकाल भी थे। पुरातत्व विभाग ने यहां मिले कंकाल के काल क्रम का पता लगाने की कोशिश की, लेकिन 13 साल बाद भी अभी तक जांच प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है। सिनौली में दूसरे और तीसरे चरण में भी कंकाल मिल रहे हैं। अनुमान के आधार इतिहासकार और पुरातत्वविद अलग अलग काल बता रहे हैं। बागपत ही बात करें तो हिंडन नदी के किनारे गुप्त कालीन, कुषाण कालीन और मुगल कालीन सभ्यता के अवशेष मिल चुके हैं। चंदायन और बरनावा में उत्खनन से यह साबित हुआ है कि यहां अलग-अलग संस्कृतियों का दौर गुजरा है। इसी तरह यमुना किनारे पर भी संकेत मिल रहे हैं, लेकिन इनकी खोज अभी अधूरी है। पश्चिम यूपी में गंगा, यमुना, हिंडन नदियों के किनारों पर भी सभ्यता आबाद थी। हिंडन किनारे बरनावा क्षेत्र में इसके प्रमाण भी मिले हैं। यमुना के नजदीक बसे सिनौली में मिले अवशेष प्राचीन संस्कृति की ओर इशारा कर रहे हैं, इन पर अभी शोध होना है।
सिनौली में आबाद थी हड़प्पा जैसी मानव संस्कृति
बागपत। सिनौली में तीसरी बार चल रहे उत्खनन में मानव कंकाल, तलवार और बड़ी मात्रा में मृदुभांड़ मिले हैं। अब तक के प्रमाणों से स्पष्ट है कि सिनौली में हड़प्पा काल जैसी संस्कृति के लोग रहते थे। तर्क यह भी दिया जाता है कि सिंधु और सरस्वती नदी के सूख जाने के कारण हड़प्पा संस्कृति के लोग पलायन कर सिनौली में आकर बस गए होंगे। अब तक सिनौली में चार हजार साल से अधिक पुराने प्रमाण नहीं मिले हैं। ऐसे में महाभारत काल की पुष्टि नहीं हो सकी है।
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सिनौली में पहली बार उत्खनन में हड़प्पा कालीन कब्र गाह मिल, दूसरी बार योद्धा का कंकाल, ताबूत और प्राचीन रथ निकला। तीसरी बार चल रहे उत्खनन में मानव कंकाल, धनुष, तलवार और पशुओं के कंकाल यहां मिले हैं। तथ्य बताते हैं कि सिंधु और सरस्वती नदी का पानी सूख जाने के बाद वहां करीब नौ सौ साल तक सूखा पड़ा था। अनुमान लगाया जा रहा है कि नदी के सूख जाने के कारण हड़प्पा कालीन सभ्यता के लोगों ने पलायन किया और वह सिनौली व आसपास के क्षेत्र में आकर बस गए। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि हड़प्पा कालीन सभ्यता बेहद विकसित और शहरी रही, जबकि सिनौली में जो प्रमाण मिले हैं, वह ग्रामीण सभ्यता जैसे हैं। अनाज और दालें भी मिली हैं, जिससे पुष्टि हो रही है कि वह खेती करते थे। तर्क यह भी दिया जाता है कि हड़प्पा सभ्यता के समय हिंडन, गंगा और यमुना नदी के आसपास की सभ्यता भी विकसित हो चुकी थी। इतिहासकार महाभारत काल की संभावनाओं को खारिज करते हैं। भारतीय पुरातत्व संस्थान दिल्ली के निदेशक संजय मंजुल कहते हैं कि उत्खनन में महत्वपूर्ण चीजें मिली हैं, लेकिन इनके काल क्रम को लेकर शोध की जरूरत है। शोध के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा।
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घोड़े का रथ सिर्फ साढे़ तीन हजार साल पुराना : हबीब
बागपत। देश के जाने माने इतिहासकार प्रोफेसर इरफान हबीब कहते हैं कि बगैर शोध के काल क्रम निर्धारित नहीं किया जा सकता है। रथ की बात करें तो आर्य संस्कृति में घोड़े वाले रथ का प्रयोग शुरू हुआ। यह संस्कृति फली फूली। आर्य साढे़ तीन हजार साल पहले आए थे। इससे पहले बैल वाले रथ का प्रयोग किया जाता था। इसके तमाम प्रमाण हैं। सिनौली में किस काल का इतिहास है, इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। कई जगह मिलती जुलती सभ्यताएं भी विकसित हुई हैं। यह शोध का विषय है। लेकिन महाभारत काल के काल क्रम का तो अभी तक पता ही नहीं चला है।
बोले इतिहासकार, जो भी सभ्यता थी, बेहद विकसित थी
शहजाद राय शोध संस्थान के निदेशक अमित राय जैन कहते हैं कि सिनौली से देश का इतिहास बदलेगा। यहां महाभारतकाल के प्रमाण मिलने शुरू हो गए हैं। सिनौली और इसके आसपास की सभ्यता बेहद विकसित थी। इसकी विस्तृत छानबीन किए जाने की जरूरत है।
एमएम कॉलेज मोदीनगर के एसोसिएट प्रोफेसर केके शर्मा कहते हैं कि सिनौली के उत्खनन से इतिहास की कड़ी जुड़ेंगी। काल क्रम का पता लगाने के लिए पुरातत्व विभाग जांच करेगा, यह शोध का लंबा विषय है। लेकिन इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि यमुना किनारे जो भी सभ्यता रही होगी, वह बेहद विकसित थी।
मेरठ कॉलेज में इतिहास विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अर्चना कहती है कि पिछले वर्ष रथ मिलने से ही स्पष्ट हो गया था कि सिनौली एतिहासिक साइट है। शोध के बाद ही काल क्रम के विषय में कुछ कहा जा सकेगा।
दिगबंर जैन डिग्री कॉलेज के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. प्रज्ञान चौधरी का कहना है कि उत्खनन कार्य के दौरान महत्वपूर्ण पुरावेशष मिलने की सूचना प्राप्त हो रही है, लेकिन जब तक पुरातत्व विभाग से रिपोर्ट नहीं आती, तब तक यह किसी सभ्यता से जुड़ा हुआ है, यह सब कुछ कहना संभव नहीं है।
जमीन में छिपा शाही धनुष या कोई और शस्त्र
बागपत। तीसरे चरण के उत्खनन में अभी तक कई महत्वपूर्ण पुरावशेष मिल चुके हैं। शवाधान केंद्र की दीवार के निकट उत्खनन में धनुषनुमा चीज दिखाई दिए जाने की बात कही जा रही है, जिसकी पुष्टि एएसआई ने नहीं की है। बताया जा रहा है कि रथ की तरह इसे निकालकर दिल्ली ले जाया जाएगा।