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खून की कमी

Wed, 26 Dec 2018 11:50 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Wed, 26 Dec 2018 11:50 PM IST
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खून की कमी
खून की कमी से जूझ रहा देश की भविष्य
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अमर उजाला ब्यूरो
मुजफ्फरनगर। एक साल की आलिया का वजन उसकी आयु के अनुपात में बेहद कम था। उसने ठीक से खाना भी शुरू नहीं किया था। चिकित्सक को दिखाया तो अतिकुपोषित पाई गई। खून की बेहद कमी थी। इसलिए पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराया। दो यूनिट खून चढ़ाने के बाद उपचार किया गया। अब वह स्वस्थ है। उसकी तरह खतौली के आलिम, गदनपुरा की आकांक्षा और मिमलाना रोड के साइब की स्थिति भी ऐसी ही थी। सभी खून की कमी से जूझ रहे थे।
स्वामी कल्याणदेव जिला चिकित्सालय में स्थित एनआरसी में आने वाले ज्यादातर बच्चों में खून की कमी है। केंद्र की न्यूट्रीशियन नेहा त्यागी बताती हैं कि यहां आने वाले 70 प्रतिशत बच्चे एनीमिया के शिकार होते हैं। कई बार तो स्टाफ नर्स अर्चना और रेनू ने बच्चों के लिए अपना खून दिया। मिमलाना रोड के आठ माह के जैद, महमूदपुर के एक साल के शैफ को भी ब्लड चढ़ाना पड़ा था। इस समय भर्ती दो साल के अयान को भी खून चढ़ाया गया। नगर निवासी तीन साल के साद और तीन माह की उसकी बहन खुशी की हालत भी खराब है। दोनों एनआरसी में भर्ती हैं। केंद्र की चिकित्सा अधिकारी डॉ. आरती नंदनवार का कहना है कि इस वर्ष जनवरी से नवंबर तक 218 बच्चे एनआरसी में भर्ती हुए। इनमें से लगभग 70 प्रतिशत एनीमिया के शिकार थे। उनको खून चढ़ाना पड़ा।
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कुपोषण ज्यादा, कम पहुंच रहे बच्चे
जिले में बच्चों में कुपोषण का स्तर ज्यादा है, लेकिन एनआरसी में उतने बच्चे नहीं पहुंच रहे। अक्तूबर 2017 में हुए सर्वे में 8372 अतिकुपोषित तथा 34604 अतिकुपोषित बच्चे पाए गए थे। अति कुपोषित बच्चों का एनआरसी में भर्ती कराकर उपचार कराया जाना था, लेकिन बीते एक वर्ष में 218 बच्चे ही भर्ती हुए।
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मिलता है भत्ता, खाने की भी व्यवस्था
पोषण पुनर्वास केंद्र में कुपोषित बच्चे को 14 दिन के लिए भर्ती किया जाता है। इस दौरान मां को 50 रुपये रोज मिलता तथा भोजन मिलता है। न्यूट्रीशियन की देखरेख में खाना दिया जाता है। डिस्चार्ज होने के प्रत्येक 15 दिन बाद चार बार आना पड़ता है। इसके लिए प्रत्येक बार एक सौ रुपये दिए जाते हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, आशाओं के अलावा ओपीडी के माध्यम से बच्चों को एनआरसी लाया जाता है।

बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर रहे सतर्क
न्यूट्रीशियन नेहा त्यागी बताती हैं कि कुपोषण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार बच्चों में अंतर न होना तथा मां का दूध नहीं पिलाना है। इसके अलावा स्वच्छता नहीं रखना भी बड़ा कारण है। कुपोषण को दूर करने के लिए गर्भकाल में माता को अपने स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखना चाहिए। बच्चों को संतुलित भोजन खिलाएं, सही समय पर टीका लगवाएं, बच्चों के स्वास्थ्य पोषण व स्वच्छता का पूरा ध्यान रखें। ज्यादा कुपोषित होने पर पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराएं।
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