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आवास विकास में फाइल गायब का खेल पहुंचा मुख्यमंत्री दरबार
Updated Sat, 11 Nov 2017 02:58 AM IST
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मेरठ। आवास विकास परिषद में फाइलों को गायब करने का खेल मुख्यमंत्री दरबार तक पहुंच गया है। सेंट्रल मार्केट के चर्चित प्रकरण लाभ संस शोरूम से जुड़ी फाइल गायब हुई थी। इसके अलावा फर्जी जाति प्रमाणपत्रों के जरिए आवंटित प्लॉटों की फाइलों का भी कुछ पता नहीं है।
आवास विकास परिषद ने 1985 में 659/6 संख्या का 288 वर्ग मीटर का प्लॉट दीप चंद सैनी के नाम 200 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से पट्टा किया था। यह प्लाट सितंबर 1986 में लाभ सिंह को दे दिया गया। आवासीय भूखंड होने के बावजूद प्लॉट पर व्यावसायिक निर्माण करा दिया गया। परिषद के अधिकारियों ने 2011 में इस प्लाट को सतीश विरमानी के नाम से फ्री होल्ड कर दिया। जबकि हापुड़ रोड से गढ़ रोड को जानी वाली सड़क समेत कई स्थानों पर प्लॉटों का आवंटन हुआ था। जांच में खुलासा हुआ कि जिन लोगों ने आरक्षित श्रेणी में ये प्लॉट लिए, वह आरक्षित श्रेणी के थे ही नहीं। फर्जी जाति प्रमाणपत्र बनवाकर प्लाटों का आवंटन कराया गया था। आवास विकास के अधिकारियों की मिलीभगत से सारा खेल हुआ। जबकि दोनों प्रकरण से जुड़ी मुख्य पत्रावली ही विभागीय कार्यालय से गायब हो गई। दोनों मामले पहले ही आवास आयुक्त के समक्ष पहुंच चुके हैं। एक आरटीआई कार्यकर्ता मामले को लेकर मुख्यमंत्री दरबार पहुंच गया है। इसमें कार्रवाई होने का भरोसा मिला है। इतना ही नहीं सेंट्रल मार्केट मामले में वो उच्च न्यायालय के आदेशों की अवमानना के खिलाफ लाभसंस मालिक पर परिवाद दायर करने की तैयारी कर चुका है। आरटीआई कार्यकर्ता के अनुसार सेंट्रल मार्केट पर आवास विकास अधिकारियों के भ्रष्टाचार ने ध्वस्तीकरण की तलवार लटकाई है। जिसका परिणाम दोनों को आवंटी सहित तत्कालीन अधिकारियों को भुगतना पड़ सकता है।
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आवास विकास परिषद ने 1985 में 659/6 संख्या का 288 वर्ग मीटर का प्लॉट दीप चंद सैनी के नाम 200 रुपये प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से पट्टा किया था। यह प्लाट सितंबर 1986 में लाभ सिंह को दे दिया गया। आवासीय भूखंड होने के बावजूद प्लॉट पर व्यावसायिक निर्माण करा दिया गया। परिषद के अधिकारियों ने 2011 में इस प्लाट को सतीश विरमानी के नाम से फ्री होल्ड कर दिया। जबकि हापुड़ रोड से गढ़ रोड को जानी वाली सड़क समेत कई स्थानों पर प्लॉटों का आवंटन हुआ था। जांच में खुलासा हुआ कि जिन लोगों ने आरक्षित श्रेणी में ये प्लॉट लिए, वह आरक्षित श्रेणी के थे ही नहीं। फर्जी जाति प्रमाणपत्र बनवाकर प्लाटों का आवंटन कराया गया था। आवास विकास के अधिकारियों की मिलीभगत से सारा खेल हुआ। जबकि दोनों प्रकरण से जुड़ी मुख्य पत्रावली ही विभागीय कार्यालय से गायब हो गई। दोनों मामले पहले ही आवास आयुक्त के समक्ष पहुंच चुके हैं। एक आरटीआई कार्यकर्ता मामले को लेकर मुख्यमंत्री दरबार पहुंच गया है। इसमें कार्रवाई होने का भरोसा मिला है। इतना ही नहीं सेंट्रल मार्केट मामले में वो उच्च न्यायालय के आदेशों की अवमानना के खिलाफ लाभसंस मालिक पर परिवाद दायर करने की तैयारी कर चुका है। आरटीआई कार्यकर्ता के अनुसार सेंट्रल मार्केट पर आवास विकास अधिकारियों के भ्रष्टाचार ने ध्वस्तीकरण की तलवार लटकाई है। जिसका परिणाम दोनों को आवंटी सहित तत्कालीन अधिकारियों को भुगतना पड़ सकता है।
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