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महंगा हुआ स्कूलों का सफर
Updated Sat, 31 Mar 2018 02:16 AM IST
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महंगा हुआ स्कूलों का सफर
मेरठ। स्कूलों ने नए सत्र से वार्षिक शुल्क, ट्यूशन फीस और मेंटीनेंस शुल्क के साथ ट्रांसपोर्टेशन फीस भी बढ़ा दी है। नए सत्र से बच्चों को घर से स्कूल भेजना भी महंगा होगा। पेट्रोल, डीजल के दामों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई, लेकिन स्कूलों ने ट्रांसपोर्टेशन फीस 10 प्रतिशत तक बढ़ा दी है। इसका सीधा असर अभिभावकों की जेब पर पड़ेगा। पेरेंट्स परेशान हैं कि इतनी सारी बढ़ी हुई फीस का भुगतान कैसे करेेंगे। अभी तो एग्जाम फीस से ही फुर्सत मिली थी, अब स्कूलों में नए सेशन के लिए फीस सबमिट करनी है। फिलहाल पैरेंट्स बच्चों को बस की बजाय खुद ही स्कूल छोड़ने का विचार कर रहे हैं।
बसें हैं खटारा, किराया पूरा
शहर के अधिकांश स्कूलों में खटारा बसें चल रही हैं। कई स्कूलों के पास तो अपनी यातायात व्यवस्था भी नहीं है। ठेके दार को बसों का ठेका दिया है। लेकिन छात्रों से किराया पूरा वसूला जा रहा है। बसें टूटी हैं, सीटें खराब, टायरों पर रबड़ चढ़ी है। खिड़कियां भी टूटी हैं। ड्राइवर, कंडक्टर नियमानुसार नहीं रखे गए, लेकिन फीस पूरी वसूली जा रही है। सुविधाएं जीरो हैं मगर यातायात फीस वसूलने में कोई कमी नहीं है।
दुर्घटना पर नहीं कोई जिम्मेदारी
कई स्कूलों में ठेकेदार की निजी बसें संचालित हैं। जो बच्चों को घर से स्कूल लाने-ले जाने का काम करती हैं। कई ऐसी बसें हैं, जो रिटायर हो चुकी हैं। लेकिन उन्हें स्कूलों में खपा दिया गया है। ऐसे में बस दुर्घटनाग्रस्त हो जाए तो स्कूल जिम्मेदारी नहीं लेते। उनका कहना होता है कि हमारी बस नहीं हैं, बस का मालिक जिम्मेदार है। मेरठ में शामली, पंजाब, देहरादून, हरिद्वार और आसपास के जिलों की पुरानी बसों को स्कूल बसों के रूप में खपाया गया है।
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मेरठ। स्कूलों ने नए सत्र से वार्षिक शुल्क, ट्यूशन फीस और मेंटीनेंस शुल्क के साथ ट्रांसपोर्टेशन फीस भी बढ़ा दी है। नए सत्र से बच्चों को घर से स्कूल भेजना भी महंगा होगा। पेट्रोल, डीजल के दामों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई, लेकिन स्कूलों ने ट्रांसपोर्टेशन फीस 10 प्रतिशत तक बढ़ा दी है। इसका सीधा असर अभिभावकों की जेब पर पड़ेगा। पेरेंट्स परेशान हैं कि इतनी सारी बढ़ी हुई फीस का भुगतान कैसे करेेंगे। अभी तो एग्जाम फीस से ही फुर्सत मिली थी, अब स्कूलों में नए सेशन के लिए फीस सबमिट करनी है। फिलहाल पैरेंट्स बच्चों को बस की बजाय खुद ही स्कूल छोड़ने का विचार कर रहे हैं।
बसें हैं खटारा, किराया पूरा
शहर के अधिकांश स्कूलों में खटारा बसें चल रही हैं। कई स्कूलों के पास तो अपनी यातायात व्यवस्था भी नहीं है। ठेके दार को बसों का ठेका दिया है। लेकिन छात्रों से किराया पूरा वसूला जा रहा है। बसें टूटी हैं, सीटें खराब, टायरों पर रबड़ चढ़ी है। खिड़कियां भी टूटी हैं। ड्राइवर, कंडक्टर नियमानुसार नहीं रखे गए, लेकिन फीस पूरी वसूली जा रही है। सुविधाएं जीरो हैं मगर यातायात फीस वसूलने में कोई कमी नहीं है।
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दुर्घटना पर नहीं कोई जिम्मेदारी
कई स्कूलों में ठेकेदार की निजी बसें संचालित हैं। जो बच्चों को घर से स्कूल लाने-ले जाने का काम करती हैं। कई ऐसी बसें हैं, जो रिटायर हो चुकी हैं। लेकिन उन्हें स्कूलों में खपा दिया गया है। ऐसे में बस दुर्घटनाग्रस्त हो जाए तो स्कूल जिम्मेदारी नहीं लेते। उनका कहना होता है कि हमारी बस नहीं हैं, बस का मालिक जिम्मेदार है। मेरठ में शामली, पंजाब, देहरादून, हरिद्वार और आसपास के जिलों की पुरानी बसों को स्कूल बसों के रूप में खपाया गया है।
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