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अंगेजी शासन की निशानी है कचहरी की मस्जिद
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अंग्रेेजी शासन की निशानी कचहरी की मस्जिद
1933 में छोटी मस्जिद के रूप में हुआ था निर्माण, बाद में लगाया टीन शेड
यहां साथ नमाज पढ़ते हैं वादी-प्रतिवादी और वकील
3000 नमाजियों की क्षमता, मस्जिद के खादिम भी वरिष्ठ अधिवक्ता
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। अंग्रेजी शासन काल में हुआ था कचहरी कलक्ट्रेट कंपाउंड में मस्जिद का निर्माण। उस समय जनसंख्या के मुताबिक छोटी मस्जिद के रूप में इसकी तामीर हुई, जिसे बाद में बड़ा रूप दिया गया। यूं तो कचहरी के आसपास कोई मुस्लिम बहुल मोहल्ला नहीं है, लेकिन फिर भी इस मस्जिद में नमाजियों की संख्या अधिक रहती है। कचहरी में मुकदमों की पैरवी के लिये आने वाले मुस्लिम वादी, प्रतिवादी सहित सैकड़ों मुस्लिम अधिवक्ता एवं आसपास के मुस्लिम समाज के लोग यहां नमाज पढ़ने आते हैं।
मस्जिद के खादिम एवं वरिष्ठ अधिवक्ता उम्मीद हसन गाजी ने बताया कि 86 साल पहले 1933 में अंग्रेज कलेक्टर (जिला मजिस्ट्रेट) के आदेशानुसार हाजी मौ. अजीमुल्ला ने इस मस्जिद का निर्माण कराया था। उस समय बहुत यहां बहुत कम लोग नमाज पढ़ते थे। नमाजियों की संख्या बढ़ने पर दस वर्ष पूर्व जिला प्रशासन की अनुमति मिलने पर मस्जिद के ऊपरी भाग पर टीन शेड का निर्माण मस्जिद की प्रबंध कमेटी ने कराया था। यहां जुमे की नमाज भी अदा की जाती है। मस्जिद के आसपास मुस्लिम आबादी भले ही कम हो, लेकिन हर रमजान मुबारक महीने में यहां तरावीह की नमाज होती है। तरावीह की नमाज में मस्जिद के इमाम मौलाना कारी शेख मंजूर अहमद कुरान-ए-करीम सुना रहे हैं।
आखिरी अशरे में है एक अमल एतकाफ
माह रमजान के आखिरी अशरे (रमजान महीने के अंतिम दस दिन) के आमाल (कार्यों) में से एक अमल एतकाफ भी है। अल्लाह की इबादत और उसका जिक्र करने के लिए मस्जिद में एतकाफ में रहना सुन्नत है। नायब शहर काजी जैनुर राशिदीन बताते हैं कि एतकाफ करने वाला शख्स मस्जिद के अंदर खुदा की इबादत, उसके जिक्र व फिकर में लगा रहता है। अगर बड़े शहर के मुस्लिम मोहल्ले में कोई एतकाफ न करे तो पूरी बस्ती के लोग परेशानी में रहते हैं। यदि कोई भी एक व्यक्ति अपने मोहल्ले की मस्जिद में एकाफ में बैठे, तो उस बस्ती के सभी लोगों की तरफ से सुन्नत अदा हो जाएगी। रमजान के आखिरी अशरे में एतकाफ करने के लिए माह रमजान की 20 तारीख को गुरूब आफताब (सूर्य अस्त) से पहले मस्जिद में एतकाफ की नियत से चले जाना चाहिए। ईद का चांद नजर आने पर ही एतकाफ से बाहर आएं।
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1933 में छोटी मस्जिद के रूप में हुआ था निर्माण, बाद में लगाया टीन शेड
यहां साथ नमाज पढ़ते हैं वादी-प्रतिवादी और वकील
3000 नमाजियों की क्षमता, मस्जिद के खादिम भी वरिष्ठ अधिवक्ता
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। अंग्रेजी शासन काल में हुआ था कचहरी कलक्ट्रेट कंपाउंड में मस्जिद का निर्माण। उस समय जनसंख्या के मुताबिक छोटी मस्जिद के रूप में इसकी तामीर हुई, जिसे बाद में बड़ा रूप दिया गया। यूं तो कचहरी के आसपास कोई मुस्लिम बहुल मोहल्ला नहीं है, लेकिन फिर भी इस मस्जिद में नमाजियों की संख्या अधिक रहती है। कचहरी में मुकदमों की पैरवी के लिये आने वाले मुस्लिम वादी, प्रतिवादी सहित सैकड़ों मुस्लिम अधिवक्ता एवं आसपास के मुस्लिम समाज के लोग यहां नमाज पढ़ने आते हैं।
मस्जिद के खादिम एवं वरिष्ठ अधिवक्ता उम्मीद हसन गाजी ने बताया कि 86 साल पहले 1933 में अंग्रेज कलेक्टर (जिला मजिस्ट्रेट) के आदेशानुसार हाजी मौ. अजीमुल्ला ने इस मस्जिद का निर्माण कराया था। उस समय बहुत यहां बहुत कम लोग नमाज पढ़ते थे। नमाजियों की संख्या बढ़ने पर दस वर्ष पूर्व जिला प्रशासन की अनुमति मिलने पर मस्जिद के ऊपरी भाग पर टीन शेड का निर्माण मस्जिद की प्रबंध कमेटी ने कराया था। यहां जुमे की नमाज भी अदा की जाती है। मस्जिद के आसपास मुस्लिम आबादी भले ही कम हो, लेकिन हर रमजान मुबारक महीने में यहां तरावीह की नमाज होती है। तरावीह की नमाज में मस्जिद के इमाम मौलाना कारी शेख मंजूर अहमद कुरान-ए-करीम सुना रहे हैं।
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आखिरी अशरे में है एक अमल एतकाफ
माह रमजान के आखिरी अशरे (रमजान महीने के अंतिम दस दिन) के आमाल (कार्यों) में से एक अमल एतकाफ भी है। अल्लाह की इबादत और उसका जिक्र करने के लिए मस्जिद में एतकाफ में रहना सुन्नत है। नायब शहर काजी जैनुर राशिदीन बताते हैं कि एतकाफ करने वाला शख्स मस्जिद के अंदर खुदा की इबादत, उसके जिक्र व फिकर में लगा रहता है। अगर बड़े शहर के मुस्लिम मोहल्ले में कोई एतकाफ न करे तो पूरी बस्ती के लोग परेशानी में रहते हैं। यदि कोई भी एक व्यक्ति अपने मोहल्ले की मस्जिद में एकाफ में बैठे, तो उस बस्ती के सभी लोगों की तरफ से सुन्नत अदा हो जाएगी। रमजान के आखिरी अशरे में एतकाफ करने के लिए माह रमजान की 20 तारीख को गुरूब आफताब (सूर्य अस्त) से पहले मस्जिद में एतकाफ की नियत से चले जाना चाहिए। ईद का चांद नजर आने पर ही एतकाफ से बाहर आएं।
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