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रमजान का महीना रोजेदारो के आचरण की पवित्रता से आत्मिक शुद्घि का महीना।

Mon, 04 Jun 2018 02:32 AM IST
Updated Mon, 04 Jun 2018 02:32 AM IST
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रमजान का महीना रोजेदारो के आचरण की पवित्रता से आत्मिक शुद्घि का महीना।

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भूखा प्यासा रहना नहीं, अच्छाइयों को जगाने की प्रक्रिया है रोजा
माछरा। इस्लाम में रमजान के महीने को अत्यंत पवित्र माना जाता है। माह-ए-रमजान या रमजानुल मुबारक हमें अपने भीतर के गुणों और अच्छाइयों को परखने व उन्हें निखारने का अवसर देता है।
मौलाना हफीज शफीक अहमद ने बताया कि रोजे रखने का मतलब भूखा-प्यासा रहना ही नहीं है बल्कि मनुष्य के अंत अच्छाइयों और सद्भावनाओं को जगाने की प्रक्रिया है। रोजे के दौरान अपनी इंद्रियों को वश में रखना बहुत जरूरी है। इस दौरान वर्जित और बुरी बातों की तरफ जाना तो दूर, उनके बारे मे सोचना भी गुनाह माना जाता है। रोजे के दौरान बुरा कहने, बुरा देखने और बुरा करने की ही मनाही नहीं, बुरा सोचने, झूठ बोलने, किसी को तकलीफ पहुंचाने, पीठ पीछे बुराई करने की भी मनाही है। रोजेदार को मन, वचन, और कर्म से खुद को सात्विक और अनुशासिक रखना होता है। आचरण की शुचिता का ख्याल रखना होता है इस दृष्टि से यह आत्मिक शुद्घि का महीना है।
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शुरूआत फज्र की नमाज से होती है जो सुबह चार-पांच बजे के बीच होती है। रोजेदार सहरी के वक्त कुछ खा लेते है और पूरे दिन के रोजे के लिए तैयार हो जाते है वे मस्जिद में नमाज में व्यस्त हो जाते है, लेकिन उनके अंतस में रोजे की कैफियत बनी रहती है। पांचों वक्त की नमाज, रात में तरावीह की नमाज में कुरआन का चिंतन व श्रवण आदि। इस्लाम मे रोजे को फर्ज माना जाता है। रोजे बीमारी, लाचारी या दुख- तकलीफ में ही जोडे़ जा सकते है।
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