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इस बार जनता ने पार्टियों के मुकाबले निर्दलीय वार्ड सदस्यों पर अपना विश्वास जताया है।
Updated Sun, 03 Dec 2017 08:21 PM IST
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मवाना।
कभी मवाना बोर्ड में भाजपा का वर्चस्व रहा करता था। इस बार पार्टी सिमटकर सात सदस्यों पर ही रह गई है। बोर्ड में सर्वाधिक निर्दलीय जीतकर आए हैं। जिससे स्पष्ट है कि इस बार जनता ने राजनीतिक दलों के बजाय निर्दलीयों पर अधिक भरोसा जताया है।
मवाना नगर पालिका पर अध्यक्ष पद से लेकर वार्ड सदस्य तक भाजपा का बहुमत रहा करता था। इस बार प्रदेश में भाजपा की सरकार है। सांसद एवं विधायक भाजपा के हैं। इसके बावजूद नगर पालिका में भाजपा हाशिए पर आ गई है। इस बार अध्यक्ष पद पर तो भाजपा को शिकस्त मिली ही है। वार्ड सदस्यों में भी भाजपा का आंकड़ा घटा है। भाजपा ने 22 सदस्यों को चुनाव मैदान में उतारा था, लेकिन महज सात सदस्यों को ही सफलता मिली है। वहीं, सपा, बसपा और कांग्रेस का हाल इससे भी बुरा है। कांग्रेस ने अध्यक्ष पद पर सफलता पाई है। वहीं, वार्डों में धराशायी दिखाई दी। उसे महज तीन सदस्यों पर ही संतोष करना पड़ा। प्रदेश में कभी सबसे बड़ी पार्टियां मानी जाने वाली बसपा और सपा को केवल एक-एक सदस्य से ही संतोष करना पड़ा है।
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कभी मवाना बोर्ड में भाजपा का वर्चस्व रहा करता था। इस बार पार्टी सिमटकर सात सदस्यों पर ही रह गई है। बोर्ड में सर्वाधिक निर्दलीय जीतकर आए हैं। जिससे स्पष्ट है कि इस बार जनता ने राजनीतिक दलों के बजाय निर्दलीयों पर अधिक भरोसा जताया है।
मवाना नगर पालिका पर अध्यक्ष पद से लेकर वार्ड सदस्य तक भाजपा का बहुमत रहा करता था। इस बार प्रदेश में भाजपा की सरकार है। सांसद एवं विधायक भाजपा के हैं। इसके बावजूद नगर पालिका में भाजपा हाशिए पर आ गई है। इस बार अध्यक्ष पद पर तो भाजपा को शिकस्त मिली ही है। वार्ड सदस्यों में भी भाजपा का आंकड़ा घटा है। भाजपा ने 22 सदस्यों को चुनाव मैदान में उतारा था, लेकिन महज सात सदस्यों को ही सफलता मिली है। वहीं, सपा, बसपा और कांग्रेस का हाल इससे भी बुरा है। कांग्रेस ने अध्यक्ष पद पर सफलता पाई है। वहीं, वार्डों में धराशायी दिखाई दी। उसे महज तीन सदस्यों पर ही संतोष करना पड़ा। प्रदेश में कभी सबसे बड़ी पार्टियां मानी जाने वाली बसपा और सपा को केवल एक-एक सदस्य से ही संतोष करना पड़ा है।
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