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13 साल की उम्र में जगा जुनून, आज मिली मंजिल   

Mon, 27 Aug 2018 02:23 AM IST
amarujala
amarujala Updated Mon, 27 Aug 2018 02:23 AM IST
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13 saal ki umar me jga junoon, aaj mili manjil
meerut - फोटो : meerut
। बुलंदशहर के बीबीनगर खरकाली गांव में जश्न का माहौल है। दुनियाभर में घुड़सवारी में सिल्वर मेडल लाकर नाम रोशन करने वाले सवार राकेश कुमार के पिता बिजेंद्र सिंह चौधरी का सीना फख्र से चौड़ा हो रहा है। 
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वे बताते हैं कि 13 साल की उम्र में ही तय हो गया था कि राकेश को सेना में भेजना है। इसके बाद उसने आठवीं पास की तो उसका चयन आरवीसी मेरठ ब्वॉयज स्पोर्ट्स कंपनी में हो गया। वहां पर राकेश की घुड़सवारी की ट्रेनिंग शुरू हो गई। किसान बिजेंद्र सिंह बताते हैं कि सेना ने ही सारी ट्रेनिंग कराई। 12वीं पास कराने के बाद वह सेना में भर्ती हो गया। बेटे की इस सफलता पर वो कहते हैं कि छोटी सी उम्र में जुनून जगा था। आज उसके उस्तादों की मेहनत के बूते विदेश में मंजिल मिल गई। पूरे गांव में इसका जश्न मनाया जा रहा है। राकेश के बड़े भाई मुकेश भी सेना में हैं। बिजेंद्र सिंह ने बताया कि जो कुछ राकेश आज है वो सेना की देन है। राकेश के साथ दूसरे सवार जितेंद्र सिंह के गांव बाड़मेर के मागरा में भी ऐसा ही जश्न का माहौल है। जितेंद्र भी आठवीं पास करने के बाद आरवीसी मेरठ ब्वॉयज स्पोर्ट्स कंपनी में आ गए थे। जितेंद्र की भी सारी ट्रेनिंग यहीं पर हुई। जितेंद्र भी 14 साल की उम्र से घुड़सवारी के गुर सीखने लगे थे। बता दें कि आठवीं पास करने वाले 14 साल की उम्र के बच्चों को सेना की तरफ से भर्ती किया जाता है। अपनी निगरानी में सेना इन बच्चों को पढ़ाई के साथ खेलकूद प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करती है। इसका सारा खर्च सेना उठाती है। इन बच्चों को ब्वॉयज स्पोर्ट्स कंपनी में रखा जाता है। 
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बहुत कम समय में फ्रांस के घोड़ों से बिठा लिया तालमेल 
एशियन गेम्स में मेडल पाने को आरवीसी के सवार राकेश कुमार अपने घोड़े विक्टरी लैप, सवार जितेंद्र सिंह अपने घोड़े गैबरियल और मेजर आशीष मलिक अपने घोड़े विरासत के साथ पसीना बहा रहे थे। तीनों ने फ्रांस में स्पेशल ट्रेनिंग ली तो उसके बाद उनको ट्रेनिंग वाले घोड़ों से ही प्रतियोगिता में भाग लेना था। इसके बाद राकेश कुमार ने घोड़े कैनीजेडी, जितेंद्र ने बालाखामी और आशीष मलिक ने पिरीमर के साथ इवेंटिंग में हिस्सा लिया। बहुत कम समय में ही तीनों घुड़सवारों ने फ्रांसीसी घोड़ों के साथ बेहतर तालमेल बिठा लिया।
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कड़े मानकों ने दिलाई सफलता  
भारतीय घुड़सवारी संघ (ईएसआई) के रीजनल मेंबर सेंट्रल डॉ. संजय गुप्ता का कहना है कि हमने जो टीम चुनने के लिए मानक रखे थे, वे बेहद कड़े थे। कुछ लोगों ने इसका विरोध भी किया, लेकिन उनको समझा दिया गया। इसके चलते रिजल्ट बेहतर आया है। गोल्ड का लक्ष्य था लेकिन दो सिल्वर मेडल मिलना बड़ी उपलब्धि है।
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