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किताबों की दुकानें से लेकर रेट तक सब हैं तय
Updated Wed, 28 Mar 2018 01:25 AM IST
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किताबों के नाम पर कमीशन का खेल
मेरठ। पब्लिक स्कूलों में स्टेशनरी, यूनिफार्म और किताबों के नाम पर कमीशन का खेल चल रहा है। मंगलवार को शहर के कई स्कूलों में पीटीएम हुई तो अभिभावकों को किताबों की सूची के साथ दुकान का पता भी दे दिया गया। पर्चों पर दुकानों के नाम पते सब प्रिंट हैं। अगर स्कूल की बताई दुकान से किताबें नहीं खरीदीं तो आपको ये कहीं और नहीं मिलेंगी। ऐसे में दुकानदार स्कूलों के साथ मिलकर महंगी किताबें बेचने का खुला खेल खेल रहे हैं। शहर में कई दुकानदार तो ऐसे हैं जिन्होंने स्कूलों के भीतर ही दुकान खोल ली हैं।
तय दुकान से खरीदना मजबूरी
स्कूलों की मनमर्जी पर अभिभावक इस डर से कुछ नहीं बोल रहे हैं कि कहीं शिकायत करने पर उनके बच्चे को स्कूल से न निकाल दिया जाए। इस वजह से पैरेंट्स सब कुछ जानते हुए भी चुपचाप सहने को मजबूर हो गए हैं। कुछ अभिभावकों ने बताया कि अगर उन्होंने स्कूल की बताई दुकान से किताबें नहीं ली तो कहीं और वह मिलती नहीं हैं। ऐसे में स्कूल द्वारा बताई गई दुकान से किताबें लेना मजबूरी बन गया है। किताब के साथ ड्राइंग कॉपी, लिखने की कॉपी भी तय दुकान से ही लेनी पड़ रही हैं। दुकानदार भी हर स्कूल की किताब-कॉपी स्टेशनरी का सेट बना रख रहे हैं। बस दुकान पर जाकर पर्चा थमाओ और एक मिनट में पूरा गट्ठर बिल समेत मिल जाता है। इसमें कवर रोल से लेकर मैप, आर्ट कॉपी, रबर, पेंसिल, कंपास सब शामिल होता है। किताबों के रेट भी तय हैं।
हर साल बदलते हैं कोर्स
स्कूलों में बोर्ड भले ही सिलेबस न बदले लेकिन स्कूल हर विषय की किताब में हर बार कुछ न कुछ परिवर्तन कर नई किताब लागू कर देते हैं। इसलिए बच्चे को हर साल पूरी किताबें नई खरीदनी पड़ती हैं। यानी अगर किसी घर में बड़े बच्चे की किताब छोटे बच्चे को दे दी जाए तो वो हर बार बदल जाती है। ये भी तब है जबकि हर साल किताबों का खर्चा ढाई से लेकर चार हजार रुपये तक आ रहा है।
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वे दुकानें जिनका पता देते हैं स्कूल
राज बुक डिपो
आइडियल बुक डिपो
भगवान बुक स्टोर
महावीर बुक स्टोर
बढ़ रहा खर्च
स्कूलों का खर्चा बढ़ रहा है। स्कूल प्रबंधन किताबें लेने वाली एक दुकान पर ही पैरेंट्स को भेज रहे हैं। जिसके चलते कम कीमत की किताबों के मनचाही कीमत वसूली जा रही हैं। - सीमा गोस्वामी, मेडिकल कैंपस
सब सेटिंग का खेल
स्कूल प्रबंधन और दुकानदारों के बीच किताब बेचने की सेटिंग चल रही है। शिक्षक बच्चों को एक ही दुकान से किताबें खरीदने को कहते हैं। इस पर कंट्रोल होना चाहिए। मध्यम परिवार के लोगों को बच्चों को पढ़ाना मुसीबत बन गया है। - शाहिद अली, शास्त्रीनगर
कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए
स्कूल प्रबंधन मोटा पैसा कमाने के चक्कर में दुकानदारों से सेटिंग करते हैं। स्कूल वालों पर कानूनी कार्रवाई नहीं होती। इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। जिससे मध्यम परिवार के लोग अपने बच्चों के सुकून से पढ़ा सकें। - अतीक अहमद, रामबाग कॉलोनी
खास बातें:
पब्लिक स्कूलों में मंगलवार को पीटीएम में थमाएं अभिभावकों को पर्चे
मनमाने रेटों पर किताबें बेच रहे हैं दुकानदार, अभिभावक मजबूर
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मेरठ। पब्लिक स्कूलों में स्टेशनरी, यूनिफार्म और किताबों के नाम पर कमीशन का खेल चल रहा है। मंगलवार को शहर के कई स्कूलों में पीटीएम हुई तो अभिभावकों को किताबों की सूची के साथ दुकान का पता भी दे दिया गया। पर्चों पर दुकानों के नाम पते सब प्रिंट हैं। अगर स्कूल की बताई दुकान से किताबें नहीं खरीदीं तो आपको ये कहीं और नहीं मिलेंगी। ऐसे में दुकानदार स्कूलों के साथ मिलकर महंगी किताबें बेचने का खुला खेल खेल रहे हैं। शहर में कई दुकानदार तो ऐसे हैं जिन्होंने स्कूलों के भीतर ही दुकान खोल ली हैं।
तय दुकान से खरीदना मजबूरी
स्कूलों की मनमर्जी पर अभिभावक इस डर से कुछ नहीं बोल रहे हैं कि कहीं शिकायत करने पर उनके बच्चे को स्कूल से न निकाल दिया जाए। इस वजह से पैरेंट्स सब कुछ जानते हुए भी चुपचाप सहने को मजबूर हो गए हैं। कुछ अभिभावकों ने बताया कि अगर उन्होंने स्कूल की बताई दुकान से किताबें नहीं ली तो कहीं और वह मिलती नहीं हैं। ऐसे में स्कूल द्वारा बताई गई दुकान से किताबें लेना मजबूरी बन गया है। किताब के साथ ड्राइंग कॉपी, लिखने की कॉपी भी तय दुकान से ही लेनी पड़ रही हैं। दुकानदार भी हर स्कूल की किताब-कॉपी स्टेशनरी का सेट बना रख रहे हैं। बस दुकान पर जाकर पर्चा थमाओ और एक मिनट में पूरा गट्ठर बिल समेत मिल जाता है। इसमें कवर रोल से लेकर मैप, आर्ट कॉपी, रबर, पेंसिल, कंपास सब शामिल होता है। किताबों के रेट भी तय हैं।
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हर साल बदलते हैं कोर्स
स्कूलों में बोर्ड भले ही सिलेबस न बदले लेकिन स्कूल हर विषय की किताब में हर बार कुछ न कुछ परिवर्तन कर नई किताब लागू कर देते हैं। इसलिए बच्चे को हर साल पूरी किताबें नई खरीदनी पड़ती हैं। यानी अगर किसी घर में बड़े बच्चे की किताब छोटे बच्चे को दे दी जाए तो वो हर बार बदल जाती है। ये भी तब है जबकि हर साल किताबों का खर्चा ढाई से लेकर चार हजार रुपये तक आ रहा है।
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वे दुकानें जिनका पता देते हैं स्कूल
राज बुक डिपो
आइडियल बुक डिपो
भगवान बुक स्टोर
महावीर बुक स्टोर
बढ़ रहा खर्च
स्कूलों का खर्चा बढ़ रहा है। स्कूल प्रबंधन किताबें लेने वाली एक दुकान पर ही पैरेंट्स को भेज रहे हैं। जिसके चलते कम कीमत की किताबों के मनचाही कीमत वसूली जा रही हैं। - सीमा गोस्वामी, मेडिकल कैंपस
सब सेटिंग का खेल
स्कूल प्रबंधन और दुकानदारों के बीच किताब बेचने की सेटिंग चल रही है। शिक्षक बच्चों को एक ही दुकान से किताबें खरीदने को कहते हैं। इस पर कंट्रोल होना चाहिए। मध्यम परिवार के लोगों को बच्चों को पढ़ाना मुसीबत बन गया है। - शाहिद अली, शास्त्रीनगर
कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए
स्कूल प्रबंधन मोटा पैसा कमाने के चक्कर में दुकानदारों से सेटिंग करते हैं। स्कूल वालों पर कानूनी कार्रवाई नहीं होती। इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। जिससे मध्यम परिवार के लोग अपने बच्चों के सुकून से पढ़ा सकें। - अतीक अहमद, रामबाग कॉलोनी
खास बातें:
पब्लिक स्कूलों में मंगलवार को पीटीएम में थमाएं अभिभावकों को पर्चे
मनमाने रेटों पर किताबें बेच रहे हैं दुकानदार, अभिभावक मजबूर