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टीसीआर के कैमरों से जाम का फोकस आउट
अश्वनी जौहरी
मेरठ। शहर को जाम से मुक्त करने और कानून व्यवस्था दुरुस्त बनाने के लिए पुलिस और ट्रैफिक अधिकारी संसाधन तो भरपूर जुटा रहे हैं। लेकिन उनका बेहतर प्रयोग नहीं हो पा रहा है। इसकी प्रत्यक्ष नमूना ट्रैफिक कंट्रोल रूम (टीसीआर) है। शहर के करीब 177 सीसीटीवी कैमरे इस कंट्रोल रूम से जुड़े हैं, जिनसे 35 से ज्यादा स्थानों की निगरानी होती है। लेकिन इनमें से तीन दर्जन से ज्यादा कैमरे ऐसे हैं, जिनका एंगल ही बिगड़ा हुआ है। यही नहीं, अधिकांश कैमरों से जाम का फोकस भी आउट है। कंट्रोल रूम में बैठे पुलिसकर्मियों को यह देखने की फुर्सत ही नहीं है कि उनके कैमरे ठीक से काम भी कर रहे हैं या नहीं।
14 लाख रुपये की लागत से बने इस टीसीआर से जनता को कोई राहत नहीं मिल रही है। दरअसल टीसीआर का सिस्टम बिगड़ा हुआ है। अधिकारी दावा करते हैं कि शहर में कहीं जाम लगेगा तो तुरंत ट्रैफिक मोबाइल वहां पहुंचकर जाम खुलवाएगी। लेकिन कई कैमरों का एंगल जाम के बजाय खाली सड़क, पेड़ या छतें दिखा रहा है, तो कहां से जाम से निजात मिलेगी। बुधवार को ‘अमर उजाला’ ने इसकी पड़ताल की तो सच सामने आ गया।
क्या कर रहा है स्टाफ
टीसीआर में तैनात पुलिसकर्मी यहां लगीं स्क्रीन से शहर को लाइव देखते हैं। जो 177 कैमरे लगे हैं, वे शहर के अतिसंवेदनशील, संवेदनशील, जाम से जूझने वाले, सार्वजनिक स्थलों और मुख्य बाजारों और चौराहों को कवर करते हैं। बता दें कि हर कैमरे का अपने आप में महत्व है। लेकिन सवाल यहां यह है कि जब करीब तीन दर्जन से ज्यादा कैमरों का एंगल बिगड़ा हुआ है या इनमें से कुछ बंद चले आ रहे हैं तो इनकी निगरानी रोजाना क्यों नहीं की जाती है। यदि किसी एक भी कैमरे का एंगल बिगड़ा हुआ है और उस जगह कोई वारदात हो जाती है तो पुलिस फुटेज कैसे जुटाएगी। या उस प्वाइंट पर रोजाना जाम लगता हो तो ट्रैफिक पुलिस कैसे खुलवाएगी।
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ये है कैमरों की स्थिति
ट्रैफिक कंट्रोल रूम से जुड़े सीसीटीवी कैमरे खुद व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। कंट्रोल रूम की पड़ताल के दौरान ऐसे कैमरों की भरमार रही, जिनका फोकस पूरी तरह आउट था। यह कैमरे शहर की सड़कों की निगरानी करने के बजाय या तो किसी चीज से ढके थे या फिर सड़क के बहुत ही छोटे एरिया को कवर कर रहे थे। काफी कैमरे तो ऐसे थे जो पेड़ों की टहनियों के पीछे छिप चुके थे। इनके अलावा करीब दो दर्जन कैमरे ऐसे भी रहे जो बिजली के अभाव में बंद चल रहे थे। हालांकि स्टाफ का इन कैमरों के बारे में कुछ और ही कहना था।
विभाग मुख्य सड़कों के जाम से अंजान
कंट्रोल रूम में लगी स्क्रीन शहर की सड़कों का बुधवार को रहा हाल खुद-ब-खुद बयां कर रही थी। शहर में हापुड़ अड्डा, भूमिया का पुल, बच्चा पार्क चौराहा, बेगमपुल चौराहा, फूलबाग चौराहा, जली कोठी से खैरनगर की ओर आने वाला रास्ता रोजाना ही जाम से जूझता है। लेकिन कई कैमरे ऐसे थे जिनका फोकस इन प्वाइंटों से भटका हुआ था। दिल्ली रोड पर तो कोई दिन ऐसा नहीं, जब जाम नहीं लगता हो। लेकिन हैरत की बात यह रही कि दिल्ली रोड की जाम व्यवस्था से भी कंट्रोल रूम अंजान था, क्योंकि यहीं के करीब आधा दर्जन से अधिक कैमरे बंद चल रहे थे। पूछने पर यहां तैनात ऑपरेटरों ने बताया कि लाइट न होने के चलते यह कैमरे बंद चल रहे हैं।
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अश्वनी जौहरी
मेरठ। शहर को जाम से मुक्त करने और कानून व्यवस्था दुरुस्त बनाने के लिए पुलिस और ट्रैफिक अधिकारी संसाधन तो भरपूर जुटा रहे हैं। लेकिन उनका बेहतर प्रयोग नहीं हो पा रहा है। इसकी प्रत्यक्ष नमूना ट्रैफिक कंट्रोल रूम (टीसीआर) है। शहर के करीब 177 सीसीटीवी कैमरे इस कंट्रोल रूम से जुड़े हैं, जिनसे 35 से ज्यादा स्थानों की निगरानी होती है। लेकिन इनमें से तीन दर्जन से ज्यादा कैमरे ऐसे हैं, जिनका एंगल ही बिगड़ा हुआ है। यही नहीं, अधिकांश कैमरों से जाम का फोकस भी आउट है। कंट्रोल रूम में बैठे पुलिसकर्मियों को यह देखने की फुर्सत ही नहीं है कि उनके कैमरे ठीक से काम भी कर रहे हैं या नहीं।
14 लाख रुपये की लागत से बने इस टीसीआर से जनता को कोई राहत नहीं मिल रही है। दरअसल टीसीआर का सिस्टम बिगड़ा हुआ है। अधिकारी दावा करते हैं कि शहर में कहीं जाम लगेगा तो तुरंत ट्रैफिक मोबाइल वहां पहुंचकर जाम खुलवाएगी। लेकिन कई कैमरों का एंगल जाम के बजाय खाली सड़क, पेड़ या छतें दिखा रहा है, तो कहां से जाम से निजात मिलेगी। बुधवार को ‘अमर उजाला’ ने इसकी पड़ताल की तो सच सामने आ गया।
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क्या कर रहा है स्टाफ
टीसीआर में तैनात पुलिसकर्मी यहां लगीं स्क्रीन से शहर को लाइव देखते हैं। जो 177 कैमरे लगे हैं, वे शहर के अतिसंवेदनशील, संवेदनशील, जाम से जूझने वाले, सार्वजनिक स्थलों और मुख्य बाजारों और चौराहों को कवर करते हैं। बता दें कि हर कैमरे का अपने आप में महत्व है। लेकिन सवाल यहां यह है कि जब करीब तीन दर्जन से ज्यादा कैमरों का एंगल बिगड़ा हुआ है या इनमें से कुछ बंद चले आ रहे हैं तो इनकी निगरानी रोजाना क्यों नहीं की जाती है। यदि किसी एक भी कैमरे का एंगल बिगड़ा हुआ है और उस जगह कोई वारदात हो जाती है तो पुलिस फुटेज कैसे जुटाएगी। या उस प्वाइंट पर रोजाना जाम लगता हो तो ट्रैफिक पुलिस कैसे खुलवाएगी।
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ये है कैमरों की स्थिति
ट्रैफिक कंट्रोल रूम से जुड़े सीसीटीवी कैमरे खुद व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं। कंट्रोल रूम की पड़ताल के दौरान ऐसे कैमरों की भरमार रही, जिनका फोकस पूरी तरह आउट था। यह कैमरे शहर की सड़कों की निगरानी करने के बजाय या तो किसी चीज से ढके थे या फिर सड़क के बहुत ही छोटे एरिया को कवर कर रहे थे। काफी कैमरे तो ऐसे थे जो पेड़ों की टहनियों के पीछे छिप चुके थे। इनके अलावा करीब दो दर्जन कैमरे ऐसे भी रहे जो बिजली के अभाव में बंद चल रहे थे। हालांकि स्टाफ का इन कैमरों के बारे में कुछ और ही कहना था।
विभाग मुख्य सड़कों के जाम से अंजान
कंट्रोल रूम में लगी स्क्रीन शहर की सड़कों का बुधवार को रहा हाल खुद-ब-खुद बयां कर रही थी। शहर में हापुड़ अड्डा, भूमिया का पुल, बच्चा पार्क चौराहा, बेगमपुल चौराहा, फूलबाग चौराहा, जली कोठी से खैरनगर की ओर आने वाला रास्ता रोजाना ही जाम से जूझता है। लेकिन कई कैमरे ऐसे थे जिनका फोकस इन प्वाइंटों से भटका हुआ था। दिल्ली रोड पर तो कोई दिन ऐसा नहीं, जब जाम नहीं लगता हो। लेकिन हैरत की बात यह रही कि दिल्ली रोड की जाम व्यवस्था से भी कंट्रोल रूम अंजान था, क्योंकि यहीं के करीब आधा दर्जन से अधिक कैमरे बंद चल रहे थे। पूछने पर यहां तैनात ऑपरेटरों ने बताया कि लाइट न होने के चलते यह कैमरे बंद चल रहे हैं।