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कोरोना संकट काल में दिहाड़ी मजदूरों को काम के लाले
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मऊ। कोरोना काल में दिहाड़ी मजदूरों के सामने गंभीर आर्थिक संकट पैदा हो गया है। कोरोना काल में भवन निर्माण समेत अन्य काम ठप है। दिहाड़ी मजदूर प्रतिदिन काम के लिए शहर में आते हैं लेकिन काम नहीं मिलने से उन्हेें बैरंग लौटना पड़ रहा है।
जिला मुख्यालय पर भीटी चौराहा, मुंशीपुरा और मिर्जाहादीपुरा चौराहा के पास लेबर मंडियां हैं। काम की तलाश में इन मंडियों में रोजाना सैकड़ों दिहाड़ी मजदूर गांवों से आते हैं। इन मंडियों में मऊ जिले से लेकर बलिया और गाजीपुर के निकटवर्ती गांवों से मजदूर काम मिलने की उम्मीद में आते हैं। सुबह आठ बजे से ही मजदूर इन मंडियों में आ जाते हैं लेकिन काम मिलने के इंतजार में इन्हें 11 बज जाते हैं। इक्का दुक्का ग्राहक ही मजदूरों को काम देने के लिए आते हैं। मजदूरों का कहना है कि गांवों में मनरेगा के तहत काम नहीं मिल रहा है तो शहर में आएा हैं लेकिन कोरोना ने उनकी गरीबी का पीछा यहां भी नहीं छोड़ा है। काम न मिलने से भारी परेशानी है। इन मजदूरों का कहना है कि दिहाड़ी मजदूरी से मिलने वाली रकम से राशन खरीद कर उनके घरों में आता है तो चूल्हा जलने की स्थिति बनती है। जगदीपुर गांव निवासी अशोक कुमार काम की तलाश में भीटी चौराहे आए थे। घंटों की प्रतीक्षा के बाद काम नहीं मिला, उनका कहना था कोरोना के चलते काम नहीं मिल रहा है। पहसा निवासी संजय राजभर ने कहा कि एक महीने से यही स्थिति है , घंटों की काम मिलने की प्रतीक्षा करके घर वापस लौटना पड़ता है। अली नगर निवासी सिकंदर प्रसाद कहते हैं कि गांव में मनरेगा के तहत काम मिलता नहीं है, गांव से काम की तलाश में शहर आए हैं लेकिन यहां कोरोना का डर काम मिलने में बाधा डाल रहा है। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। गालिबपुर निवासी डब्लू माली की पीड़ा कुछ ऐसी ही थी कि कोरोना संकट से दिहाड़ी मजदूरों के समक्ष गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
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जिला मुख्यालय पर भीटी चौराहा, मुंशीपुरा और मिर्जाहादीपुरा चौराहा के पास लेबर मंडियां हैं। काम की तलाश में इन मंडियों में रोजाना सैकड़ों दिहाड़ी मजदूर गांवों से आते हैं। इन मंडियों में मऊ जिले से लेकर बलिया और गाजीपुर के निकटवर्ती गांवों से मजदूर काम मिलने की उम्मीद में आते हैं। सुबह आठ बजे से ही मजदूर इन मंडियों में आ जाते हैं लेकिन काम मिलने के इंतजार में इन्हें 11 बज जाते हैं। इक्का दुक्का ग्राहक ही मजदूरों को काम देने के लिए आते हैं। मजदूरों का कहना है कि गांवों में मनरेगा के तहत काम नहीं मिल रहा है तो शहर में आएा हैं लेकिन कोरोना ने उनकी गरीबी का पीछा यहां भी नहीं छोड़ा है। काम न मिलने से भारी परेशानी है। इन मजदूरों का कहना है कि दिहाड़ी मजदूरी से मिलने वाली रकम से राशन खरीद कर उनके घरों में आता है तो चूल्हा जलने की स्थिति बनती है। जगदीपुर गांव निवासी अशोक कुमार काम की तलाश में भीटी चौराहे आए थे। घंटों की प्रतीक्षा के बाद काम नहीं मिला, उनका कहना था कोरोना के चलते काम नहीं मिल रहा है। पहसा निवासी संजय राजभर ने कहा कि एक महीने से यही स्थिति है , घंटों की काम मिलने की प्रतीक्षा करके घर वापस लौटना पड़ता है। अली नगर निवासी सिकंदर प्रसाद कहते हैं कि गांव में मनरेगा के तहत काम मिलता नहीं है, गांव से काम की तलाश में शहर आए हैं लेकिन यहां कोरोना का डर काम मिलने में बाधा डाल रहा है। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। गालिबपुर निवासी डब्लू माली की पीड़ा कुछ ऐसी ही थी कि कोरोना संकट से दिहाड़ी मजदूरों के समक्ष गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
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