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जनपद के रंगकर्मी पड़े शिथिल
BEARU, AMAR UJALA, MAU
Updated Mon, 28 Mar 2016 11:55 PM IST
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नगर क्षेत्र के निजामुद्दीनपुरा में राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ के तत्वावधान में विश्वरंगमंच दिवस पर आयोजित गोष्ठी को संबोधित करते राघवेन्द्र प्रताप सिंह।
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रंगकर्मी का जीवन एक साधक जैसा होता है। पूरी दुनिया में सभी साहित्यिक विधाओं में नाट्य कर्म और उसकी प्रस्तुति समाज में सर्वाधिक प्रभावी कला के रूप में जानी जाती है। प्रेक्षागृह के अभाव में इस समय मऊ का रंगकर्मी शिथिल पड़ गया है। यह चिंता राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ मऊ के सभागार में हुर्ठ गोष्ठी में व्यक्त की गई। यह बातें विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर गोष्ठी का प्रारंभ करते हुए इप्टा के अध्यक्ष रामअवतार सिंह ने कही।
गोष्ठी में काव्य पाठ की शुरूआत करते हुए इम्तियाज साकिब ने कहा कि ‘मैं भारत मां का बेटा देश का सच्चा सिपाही हूँ, मेरे माथे पर लिखा सिर्फ हिंदुस्तान रहने दो’। घनश्याम पांडेय ने बसंत के आगमन और जीवन के उल्लास को स्वर दिया। सत्यप्रकाश सिंह एडवोकेट ने ‘मेरे शहर से होकर एक नदी गुजरती है, सूखी-गंधाती चुपचाप तनहाई में रहती है, सुनाकर तमसा का हाल बया किया। शायर सईदुल्ला शाद और इस्माइल शादान ने गजल प्रस्तुत किया।
नागेंद्र सिंह ‘बागी’ ने प्रेम और वियोग के द्वंद्व को आकार देते हुूए ‘क्या विधिता संयोग के योग में, वियोग के रोग लगावत बांटे, सुनाया। असलम एडवोकेट ने ‘जरा एक घर बना कर भी तो देखो, जलाने को तो काशाने बहुत हैं’ सुनाया। डॉ. गिरीश मासूम ने भी अपनी गजल को स्वर दिए। डॉ. वसीमुद्दीन जमाली को उनकी रचना पर खूब दाद मिली। इसी तरह से डॉ. इकबाल अहमद, राघवेंद्र प्रताप सिंह, जयप्रकाश धूमकेतु ने अपनी रचनाओं को सुनाया।
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गोष्ठी में काव्य पाठ की शुरूआत करते हुए इम्तियाज साकिब ने कहा कि ‘मैं भारत मां का बेटा देश का सच्चा सिपाही हूँ, मेरे माथे पर लिखा सिर्फ हिंदुस्तान रहने दो’। घनश्याम पांडेय ने बसंत के आगमन और जीवन के उल्लास को स्वर दिया। सत्यप्रकाश सिंह एडवोकेट ने ‘मेरे शहर से होकर एक नदी गुजरती है, सूखी-गंधाती चुपचाप तनहाई में रहती है, सुनाकर तमसा का हाल बया किया। शायर सईदुल्ला शाद और इस्माइल शादान ने गजल प्रस्तुत किया।
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नागेंद्र सिंह ‘बागी’ ने प्रेम और वियोग के द्वंद्व को आकार देते हुूए ‘क्या विधिता संयोग के योग में, वियोग के रोग लगावत बांटे, सुनाया। असलम एडवोकेट ने ‘जरा एक घर बना कर भी तो देखो, जलाने को तो काशाने बहुत हैं’ सुनाया। डॉ. गिरीश मासूम ने भी अपनी गजल को स्वर दिए। डॉ. वसीमुद्दीन जमाली को उनकी रचना पर खूब दाद मिली। इसी तरह से डॉ. इकबाल अहमद, राघवेंद्र प्रताप सिंह, जयप्रकाश धूमकेतु ने अपनी रचनाओं को सुनाया।
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