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Mau News: नैतिक और चारित्रिक बल सब पर भारी
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रतनपुरा। श्री ठाकुर ठकुराइन मंदिर परिसर में 11 दिवसीय श्री लक्ष्मी नारायण महायज्ञ चल रहा है। आठवें दिन मानस कोकिला विजयलक्ष्मी शुक्ला ने कहा कि नैतिक बल एवं चारित्रिक बल सभी बलों पर भारी होता है।
उन्होंने कहा कि किसी भी परिस्थिति में नैतिक और चारित्रिक बल मजबूत रखें। दुनिया की कोई भी शक्ति परास्त नहीं कर सकती है। धनबल, बाहुबल एवं जन बल नैतिक एवं चारित्रिक बल के आगे पराजित होते देखा गया है।
उन्होंने कहा कि जब लंका में राम और रावण के बीच युद्ध चल रहा था तो भगवान शंकर देखने के लिए रण क्षेत्र में पहुंचे। बताया कि रणभूमि में भगवान श्रीराम के बाण से रावण मूर्छित हो गया। इस पर भगवान श्री राम ने रावण के सारथी से कहा कि रथ वापस लंका ले जाओ। मैं निहत्थे पर कभी वार नहीं करता। रावण को महल में ले जाकर इसका उपचार करो और स्वस्थ हो जाने पर उसे रणभूमि में ले आना। सारथी रावण का रथ लेकर लंका पहुंचा। अपने पति की हालत देखकर मंदोदरी व्याकुल हो गईं। तब तक रावण को होश आया।
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रावण ने कहा मैं कहां हूं, तो मंदोदरी ने बताया कि लंका के महल में हैं। अपनी हालत देखकर रावण को आत्मग्लानि हुई। वह सोच रहा था कि राम चाहते तो उसका वध कर सकते थे परंतु नहीं किया। यह राम की उदारता है, महानता है कि उन्होंने युद्ध के नियम का पालन किया। हकीकत जानकर मंदोदरी आश्चर्यचकित हुई। उसने पति की आज्ञा लेकर भगवान राम को दूत के माध्यम से पत्र भेजा। इसमें लिखा था कि मैं पूर्णतया सोलह शृंगार से सुसज्जित होकर सखियों के साथ आपसे मिलना चाहती हूं। भगवान श्रीराम को जब पत्र मिला उन्होंने मिलने की इजाजत दे दी। इसके बाद मंदोदरी श्रीराम के पास पहुंची। भगवान राम ने उसे माता कहकर दंडवत किया। राम का व्यवहार देखकर मंदोदरी आश्चर्यचकित रह गई। वापस जब महल में गई तो रावण ने पूछा कि तुम राम के दरबार में गई थी वहां क्या हुआ तो मंदोदरी ने बताया कि श्रीराम ने माता कहकर संबोधित किया है। इसलिए मैंने उन्हें विजय का आशीर्वाद दे दिया। क्योंकि राम के पास जो नैतिक बल व चरित्र बल है वह सब पर भारी है। मानस कोकिला ने कहा कि व्यक्ति को कभी भी नैतिक बल और चारित्रिक बल नहीं खोना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि किसी भी परिस्थिति में नैतिक और चारित्रिक बल मजबूत रखें। दुनिया की कोई भी शक्ति परास्त नहीं कर सकती है। धनबल, बाहुबल एवं जन बल नैतिक एवं चारित्रिक बल के आगे पराजित होते देखा गया है।
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उन्होंने कहा कि जब लंका में राम और रावण के बीच युद्ध चल रहा था तो भगवान शंकर देखने के लिए रण क्षेत्र में पहुंचे। बताया कि रणभूमि में भगवान श्रीराम के बाण से रावण मूर्छित हो गया। इस पर भगवान श्री राम ने रावण के सारथी से कहा कि रथ वापस लंका ले जाओ। मैं निहत्थे पर कभी वार नहीं करता। रावण को महल में ले जाकर इसका उपचार करो और स्वस्थ हो जाने पर उसे रणभूमि में ले आना। सारथी रावण का रथ लेकर लंका पहुंचा। अपने पति की हालत देखकर मंदोदरी व्याकुल हो गईं। तब तक रावण को होश आया।
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रावण ने कहा मैं कहां हूं, तो मंदोदरी ने बताया कि लंका के महल में हैं। अपनी हालत देखकर रावण को आत्मग्लानि हुई। वह सोच रहा था कि राम चाहते तो उसका वध कर सकते थे परंतु नहीं किया। यह राम की उदारता है, महानता है कि उन्होंने युद्ध के नियम का पालन किया। हकीकत जानकर मंदोदरी आश्चर्यचकित हुई। उसने पति की आज्ञा लेकर भगवान राम को दूत के माध्यम से पत्र भेजा। इसमें लिखा था कि मैं पूर्णतया सोलह शृंगार से सुसज्जित होकर सखियों के साथ आपसे मिलना चाहती हूं। भगवान श्रीराम को जब पत्र मिला उन्होंने मिलने की इजाजत दे दी। इसके बाद मंदोदरी श्रीराम के पास पहुंची। भगवान राम ने उसे माता कहकर दंडवत किया। राम का व्यवहार देखकर मंदोदरी आश्चर्यचकित रह गई। वापस जब महल में गई तो रावण ने पूछा कि तुम राम के दरबार में गई थी वहां क्या हुआ तो मंदोदरी ने बताया कि श्रीराम ने माता कहकर संबोधित किया है। इसलिए मैंने उन्हें विजय का आशीर्वाद दे दिया। क्योंकि राम के पास जो नैतिक बल व चरित्र बल है वह सब पर भारी है। मानस कोकिला ने कहा कि व्यक्ति को कभी भी नैतिक बल और चारित्रिक बल नहीं खोना चाहिए।