यूपी चुनाव: मऊ की सदर सीट पर कभी नहीं खिला कमल, सुभासपा से गठबंधन के बाद भी भाजपा नहीं भेद सकी मुख्तार का किला
सदर विधानसभा पहले कम्युनिस्ट का गढ़ माना जाता रहा है। 2002 से लगातार सदर सीट पर मुख्तार अंसारी का कब्जा है। 2017 में जिले की चार विधानसभा सीट में तीन पर कमल खिला था तब भी यहां सदर सीट पर बसपा उम्मीदवार मुख्तार अंसारी जीत दर्ज कर चौथी बार विधायक निर्वाचित हुए।
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मऊ की सदर विधानसभा सीट भाजपा के लिए अजेय बनी हुई है। कई प्रयोगों के बावजूद अब तक यहां एक बार भी कमल नहीं खिल सका। हां, 1967 में जनसंघ से दीया बाती चुनाव चिह्न पर लल्लू बाबू विधायक निर्वाचित हुए थे। इसके बाद तो सदर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा जीत को तरसती रही।
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने गठबंधन कर यह सीट सुभासपा को दी थी। गठबंधन प्रत्याशी ने भाजपा लहर में मुख्तार अंसारी को कड़ी टक्कर तो दी, लेकिन जीत नहीं सके। सदर विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं ने कम्युनिस्ट पार्टी, कांग्रेस, जनता पार्टी, बसपा और निर्दल को भी मौका दिया है, लेकिन भाजपा को हमेशा ही निराशा हाथ लगी है।
सदर विधानसभा पहले कम्युनिस्ट का गढ़ माना जाता रहा है। 2002 से लगातार सदर सीट पर मुख्तार अंसारी का कब्जा है। वर्ष 2017 में भाजपा लहर में जिले की चार विधानसभा सीट में तीन पर कमल खिला था तब भी यहां सदर सीट पर बसपा उम्मीदवार मुख्तार अंसारी जीत दर्ज कर चौथी बार विधायक निर्वाचित हुए।
मऊ जिले के सदर विधानसभा सीट पर 1952 के पहले चुनाव में यहां से कांग्रेस के प्रत्याशी पद्मनाथ सिंह ने जीत हासिल की थी इसके बाद इस सीट पर कम्युनिस्ट पार्टी से चार बार अलग-अलग लोग विधायक निर्वाचित हुए, जबकि कांग्रेस ने भी चार बार अपना परचम लहराया।
वहीं 1967 में जनसंघ के लल्लू बाबू विधायक निर्वाचित हुए और 1977 में जनता पार्टी से प्रो. रामजी सिंह चुने गए। 1980 में भाजपा के अस्तित्व में आने के बाद आज तक सदर विधानसभा सीट पर एक बार भी कमल नहीं खिला है। हालांकि भाजपा कई चुनाव में दूसरे नंबर की पार्टी रही है।